अच्छा दिन केने बा ?

कुछ भोजपुरी कविता ::

संतोष पटेल

अच्छा दिन केने बा ?

अच्छा दिन केने बा ?
केहू देस में खोज के निकालत बा
केहू विदेस में खोजत बा
इहे का कम बा ?
जे सभे अच्छा दिने के सपना में भुलाइल बा
बउराइल बा
बाकिर ‘उ’ पेट्रोल पम्प में
लुकाइल बा
कि तरकारी के टोकरी में
मुरकीआइल बा
कि दाल के बोरा से
दबाइल बा
त मिलो कहाँ से
आम लोगन के अंगना में
हिलो कहाँ से ?
अच्छा दिन !
इ त आइले बा
नेता जी के परिधान में
नेताइन के कंगना में
सोना के हार में
हीरा के झुमका में
प्लैटिनम के ठुमका में
अच्छा दिन के सपना सस्ता बा का ?
जे सभे अंकवारी में भर ली ?
पकड़ ली
मुट्ठी में
जकड़ ली

अच्छा दिन त!
पाच सितारा राजनीति के गुलाम ह
राजदरबार के दलाल ह
संसद भवन के चमचा ह
ओकरा गरीब से का मतलब ?
का मतलब किसान से ?
अब जे नइखे बुझत
अच्छा दिन, अच्छा दिन
करत रहो
झूठ आ लबरई के सपना के
आँखि में भरत रहो
आ अच्छा दिन ना आइल
एही हूके मरत रहो

हमार डोमा काका अब डोमा मियाँ काहे ?

आजुओ हमार गाँव
जाति धरम के जंजाल में हेराइल नइखे
शहरी ताम-झाम से घेराइल नइखे
अपनापन के फुल-पात
मउराइल नइखे .
काहे कि इ
ढेर पढ़ला लिखला के बेमारी

धरम-करम के ढकोसला से बचल बा
काहे कि
आजुओ हमरा गाँव में जाति-धरम से हटके भाव
रचल-बसल बा

आजुओ डोमा काका
केहू के फूफा
केहू के मामा
केहू के भइया
त केहू के सार लागेलें
हमरा त उ अकेले
कूल्ह नाता रिश्ता के
संसार लागेलें
कहे के त उ हउएँ मुसलमान
बाकिर वाह रे हमार गाँव के ईमान
आजहूँ हिन्दू के कूल्ह पूजा पाठ
अठजाम
शादी बिआह के उहे निभावेलें
चउका पुरे लें
आम के पुलई बान्हेले
आसनी लगावेलें
दूल्हा-दुल्हिन के
गाँठ बान्हेलें
डोमा काका त हवन मुसलमान
बाकिर वाह रे हमार गाँव
केहू कुछुओ
ना कहल, ना सोचल
कहियो
भगवान ना छूअइलें , ना रिसीअइलें
अचके

फिर जानी जे
कवन नया हवा बहल
कि नेह-छोह आ अपनापन के
डेहरी ढहल
अब कुछु लोग उनका के
नया विशेषण देत बा
‘डोमा मियाँ’!

हम सुननी त
बुझाइल कि मेल-जोल
अउर मोहब्बत के धोती फाटल जाता का ?
आदमियत के जाति धरम के आरी से
काटल जाता का ?

एक दिन आँखि में लोर कइले
मुड़ी पर
पेटी मोटरी धइले
अनमुहाए
काकी के संगे
गाँव से निकसत जात रहले
डोमा काका
उनकर मन रोअत रहे
डहकत रहे
फिकिर इहे कि ‘डोमा’ काका से डोमा मियां कब से
आ काहे हो गइलें ?
सात पुस्त इहें जियल
मेल-मोहब्बत के पुआ पूरी खइलस
सेवई पियल
फिर ई का हो गइल?

माथ ठेठावत रहलें
बाकिर केहू से किछऊ ना बतावत रहलें
एतने में केहू के टोके के आवाज सुनले
-“के ह हो ? रुक…
अन्हारे अनमुहाए कहवाँ के चढ़ाई बा”
टोकवइया आउर केहू ना सरपंच जी रहले
हमार बाबा
सज्जी गांव के बाबा

दादा पुछ्लें , “का हो ? कहवां जात बाड़?”
डोमा काका रोलइले
कहलें –
“का रहिए गइल
जब हम डोमा काका से डोमा मियाँ हो गइनी”
सरपंच बाबा कहलें
“ना भाई / तू कतहीं ना जइब
ना तूं , ना भाउजाई
संगे संगे
जीयल जाई
एके कटोरा में पारा-पारी सनेह
के पानी पियल जाई
जबले हम जीयब
नेह के लुगरी सियब
लउट”


इ सुनत /ऊपर अल्लाह भा भगवान
लेत रहे लोग मुस्कान
साइत/ एही में नू जिएला
आपन
हिंदुस्तान
हिंदुस्तान
हिंदुस्तान

किसान के पिसान

आजू भारत के राजनीति में
एक्के गो चरित्र रह गइल बा
किसान
किसान न हो के
उ हो गइल बा
एगो सीढ़ी सत्ता के सिंहासन पर चन्हुपावे ला
सभे ओकरे कान्हि पर बाटे सवार
भले किसान होखे
लाचार, बेकार, बेमार
जंग लागल टीन नियर

टीनही हो गइल बा किसान
इ ओकर दुरभाग बा
सौभाग्य त नेता लोगन के बा
जे किसान चालीसा पढ़ि पढ़ि के
अपना दिन सुधारत बा
कहियो कहियो किसान के दूअरा पर
आपन रात गुजारत बा
कबो भूइयाँ
त कबो खटिया पर ओठंग के
अजबे बा लोकतंत्र

एकर सूत्रधार लोग
देश के कुल धेयान
किसाने पर खिंचाइले बा
अख़बार के खबर भा टीवी के
टी आर पी हो गइल बा आजू किसान
ओही से ओकरा देखा के
ओकरा कमाई से
अपना आप के सींचले बा

किसान त पिसान भइल जात बाड़ें
भूखमरी के चकरी में पिसा के
महाजन के करजा में दबा के
गरीबी के ढेंकी में कूटा के
सूखा आ बाढ़, आ बेमौसम बरसात से
कबो मौसम के ससरी से
कबो जंतर मंतर पर फंसरी से
बाकिर नेता लोग एही में
खोज लेत बा राजनीति
आ पाछे रह जात बा
किसान , किसान

शहर

लमहर शहरिया के
ऊँची अटारी
जवना के ईटा-ईटा बेमार बा
झूठ के बेमारी से
पथ्थल के मकान में
धोखा के दोकान
बेचवईया/ कठकरेज
लूटे में ना तनिको परहेज
एही में कहीं लुकाईल बाड़े
कलुवा/ ललुवा
चोकट/ धरिछन /संकटा
जेकर हियाव रहे दरियाव नियर
आधा बाँट के खाय लोग
दुःख सुख में
धधा के परे लोग
एक दोसरा के खातिर
कंकरीट के जंगल में
ना जाने कहवां दबाईल बा सभे
भुलाईल बा सभे आकि
शहरुवा चाल के जाल में
फंस गइल लोग
ना जानी
केतना धंस गइल लोग
ईहवाँ आके

 पलायन

बाढ़, सुखाढ़ आ रोटी
अजीब रिश्ता बा इनके
जवन खरका देलस
खरई खरई
जीये के विश्वास
साथे रहे के आस
धकेल देलस दउरत रेल के डिब्बा में
जहवां न बइठे क जगहे
न साँस लेवे के साँस
ऊँघतध जागत / दू दू रात के
आँखि में काटत
जहवां कोई नइखे आपन
बा त एगो टूटल सपना
सहारा बा
उहो बालू के भीत नियन
गरीबी के तराजू में
एक ओरी भूख
दुसर ओरी निराशा
बीच में दू गो लइकन के
सुसकत आँख
दूध क तरसत ओठ
बुढ़ माई-बाबू
अ अदद बीबी
उहो टीबी  के शिकार
बीमार
लाचार
जियल दुश्वार

इ जिनिगी के भीरी
पलायन के अलावा
कवन चारा बा

[संतोष पटेल  बेतिया, पश्चिम चंपारण रहेलें. हिंदी अउर भोजपुरी में लेखेलीं.  भोजपुरी पंचायत, पुर्वांकुर आदि पत्रिका में संपादन कार्य. ‘भोर भिनुसार’ नाम से भोजपुरी काव्य संग्रह प्रकाशित अउर एगो हिंदी काव्य संग्रह ‘शब्दों के छाँह में’ भी प्रकाशित बा. ई कवि के कविता में ग्राम्य-जीवन के मर्म, सामाजिक चित्र आ सत्य के पड़ताल देखल जा सकेला. इंहा से bhojpurijinigi@gmail.com पर  संपर्क कइल जा सकेला.]

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

2 comments

  • जो मानसिक कुरूपता और पिछड़ापन समाज में आज मौजूद है वो परेशान करने के लिए काफ़ी हैं। ऐसे में कवि ने जिस स्पष्टता के साथ समाज को आइना दिखाने का काम किया है वह बहुत सराहनीय है। शिक्षा और विज्ञान के दौर में हमारा देश जिस तेज़ी से पीछे जा रहा है उसे देख कर आश्चर्य होता है कि हम कैसे समाज में रह रहे हैं। कवि को मेरी तरफ़ से ढेरों बधाई और शुभकामनायें।

  • कवनो दूसर भाषा में दम नइखे जे भोजपुरिया भाषा क लेखवा आ कवितावां के चैलेंज कर सके यदि कलम चलावे वाला हमरा संतोष बबुआ नियर होखे।
    जय भोजपुरी