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आगे ही आगे भाग रहा है समय

कविताएँ:: रामकृष्ण पांडेय रामकृष्ण पांडेय (1949-2009) सबसे पहले हिंदी के कवि थे। उन्होंने अनगिनत अनुवाद किए- बांग्ला से, फ़िलिस्तीनी से और दुनिया की कई भाषाओं के साहित्यकारों को हिंदी समाज के लिए सुलभ बनाया। वे बढ़िया  पत्रकार भी थे, उस तरह के जो शायद उनके जाने के साथ विलुप्त हो गए। उनकी कविताओं तक तकनीक की सरलता और वैचारिक शुचिता के लिए जाना चाहिए। उनका एकमात्र प्रकाशित कविता संग्रह...

यह मृत्युपूजकों का देश है प्यारे

कविताएँ :: सुधीर सुमन मृत्यु और जीवन के बीच मृत्यु फेरे लगा रही दूर भाग रहे वे जिंदगी की छटपटाहट लिए जो बड़े फिक्रमंद थे दामन छुड़ाकर जा रहे न जाने किस जीवन की ओर॰ कोई संग मरने का खतरा नहीं उठाना चाहता यह देख-देख ताक में खड़ी मौत बेतहाशा किलकती है। अशांत बेहद भयानक कोई समुद्र है जिसमें डूबता उतराता देखता हूं दूर खड़े समानधर्मा साथियों को जो बताते हैं इस भंवरजाल से मुक्ति के तरीके। पर अभी दूर हैं वे...

ढूंढ लाओ एक बूंद कहीं से

कविताएँ :: सत्यम तिवारी 1. आँसू जितनी रात है जलने पर ही ख़त्म होगी जितनी बात है कहने पर ही खत्म होगी दीया जलेगा बातों का कुँआ चुक जाएगा नमी ही जन्म देगी नमी को भागीरथ ढूंढ लाओ एक बूंद कहीं से। 2. इति यहाँ पहुँचकर भी तो पूरा होता है यात्रा का एक पड़ाव खुलता है तिलिस्म का प्रवेशद्वार पहुँचते ही पकड़ता है कोई अप्रत्याशित अशक्त खिंचता है बहुप्रतीक्षित भवित्यक्त यहीं जकड़ती है हमें अधीरता स्पर्श चिंगारी...

सारे उत्सव स्थगित

कविता :: अरुण श्री सारे उत्सव स्थगित मैं प्रेम में हूँ कि मछली है कोई नदी के बाहर और जिन्दा है। तुम साथ हो मेरे कि मैं साथ के स्वप्न में हूँ। बारिश की कोई बूँद नहीं टपकी हमारे होठों पर आधी-आधी। किसी दूब ने हमारे पाँव नहीं चूमे साथ-साथ। मेरी आँखों में पड़ी रेत कभी तो न किरकिराई आँखें तुम्हारी। हम निकले ही नहीं घरों से अपने-अपने, और लिखते रहे— किसी साझा गंतव्य के लिए कितनी ही कविताएँ। तुमने...

कला भी अश्लील हो सकती है

कविताएँ :: कपिल भारद्वाज 1. मेरे देश एक निर्णय करना ही होगा तुम्हें कि चाँद सिर के ऊपर से जब गुजरे तो उसके दोनों सींग पकड़कर अपने कमरे में घसीट लाओ और तब तक बंदी बनाकर रखो जबतक पक्षियों का कलरव न सुनाई दे। मेरे देश एक निर्णय करना ही होगा तुम्हें कि जब कोई मसखरा/ मंच पर कबीर को ढूंढने का दावा करे और मंच के नीचे/ आदमियत की टांट पर थूके तो उसे आकाश से टूटते तारे की सीध में फेंक दिया जाए। मेरे देश एक...

कहना निर्मित करता है आत्मीयता का आकाश

कविताएँ:: आलोक रंजन मलबा मकान बना, इश्तिहार  हुआ। घर ढहा, इश्तिहार हुआ। सादे अखबार या रंगीन स्क्रीन पर नहीं उस रद्दी पर जिसके चीथड़ों पर लिखा जा सकता है सब कुछ, फट जाने पर उनकी सटाई भी। नागरिक ढांचा है मलबों का, एक कीमती इमारत जिसके पुर्ज़े गिरवी हैं। आवासों का बनना, उनका ढहना, ईंटों का बँटवारा है कि मलबों के लोग न बन जाएं घर। कहना निचोड़े जा चुके शब्दों के अंतहीन दुहराव से बनते हैं स्वादहीन...

सबके दरवाज़े देखता हुआ

नए पत्ते:: कविताएँ : रौशन पाठक ढूँढती हूँ तुम में, तुमको। जब भी तुमसे मिलता हूँ, तुम मेरी कमीज़ पर कुछ ढूँढती हो। कुछ रेशे, कुछ धागे, उलझे सवाल और कुछ रौशनी के दाग़। दूर बैठकर निहारती हो मेरा चेहरा और पास बैठे ढूँढती हो मेरे स्वेटर में अधबुने, टूटे, काटे गए धागे। जैसे ढूँढती है एक बंजारिन बारिश में सूखी लकड़ियाँ। जैसे कुम्हारिन चुनती है माटी से कंकर, और बाशिंदे पौधों से कपास। चुनती हुई तुम, भर...

इस दुनिया का चेहरा सियाह हुआ पड़ा था

कविताएँ :: पीयूष तिवारी ब्लैकबोर्ड उसकी स्मृतियों में अमिट पंक्तियाँ थीं लिखी जा चुकी पंक्तियों पर लिखी जा रही पंक्तियों का दुहराव था पुरातत्वविदों ने पहचानी थी उसपर उग आई काई की वज़ह से उसकी प्राचीनतम इच्छा काई, प्राचीनतम नहीं थी मगर उनका उगना एक प्राचीनतम घटना थी अमूमन उसे पानी होना था लोटे से छलके तो ज़मीन पी ले उसे तो सिर्फ़ बुझानी थी सबकी प्यास यह स्पष्ट भी कितना अस्पष्ट था कि जो ख़ुद घिरा...

हसरतों के शहर देखेंगे हमारी ओर

कविताएँ :: सारुल बागला शहर और तुम 1. हसरतों के शहर देखेंगे हमारी ओर अपनी प्यासी आँखों से एक प्यास हमारे जिस्म की बेचैनी नहीं देख सकती। 2. तुम आ सको तो शहर के इस कोने तक आना इस शहर के इस तरफ मैं रहता हूँ गहरी गली में तुम आओगी तो थोड़ा बाहर निकल कर आऊँगा। 3. हमारी आदत छूट गयी जादू देखने की मदारी और बंदर दोनों बैठते हैं साथ साथ मुझे तुम्हारी आँखों में अब कुछ नहीं दिखाई देता। 4. शहर भीगा है तो...

इनका यही डर हमारी जीत है

कविताएँ :: सूर्यस्नात त्रिपाठी 1. मेरे शरीर को पिघलाकर तुम बनाना चाहते हो एक मौन और निस्प्रभ आकाश— स्मारक उस सुबह का जो मैंने देखा ही नहीं। परंतु मैं चाहता हूँ, मेरे अवर्त्तमान में मेरे अवयव किसी नादान बच्चे का खिलौना बन जाएं, मेरी आँखें किसी के लिए दर्पण बनें, मेरी अस्थियाँ वंशी बन जाएं, और मेरी छाती पर लेट कर तितलियाँ थकान मिटाएं। अपनी संकीर्णता में बंदी तुम क्या जानो, मैं जब पिघलूंगा शीतल...