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कहना निर्मित करता है आत्मीयता का आकाश

कविताएँ:: आलोक रंजन मलबा मकान बना, इश्तिहार  हुआ। घर ढहा, इश्तिहार हुआ। सादे अखबार या रंगीन स्क्रीन पर नहीं उस रद्दी पर जिसके चीथड़ों पर लिखा जा सकता है सब कुछ, फट जाने पर उनकी सटाई भी। नागरिक ढांचा है मलबों का, एक कीमती इमारत जिसके पुर्ज़े गिरवी हैं। आवासों का बनना, उनका ढहना, ईंटों का बँटवारा है कि मलबों के लोग न बन जाएं घर। कहना निचोड़े जा चुके शब्दों के अंतहीन दुहराव से बनते हैं स्वादहीन...

सबके दरवाज़े देखता हुआ

नए पत्ते:: कविताएँ : रौशन पाठक ढूँढती हूँ तुम में, तुमको। जब भी तुमसे मिलता हूँ, तुम मेरी कमीज़ पर कुछ ढूँढती हो। कुछ रेशे, कुछ धागे, उलझे सवाल और कुछ रौशनी के दाग़। दूर बैठकर निहारती हो मेरा चेहरा और पास बैठे ढूँढती हो मेरे स्वेटर में अधबुने, टूटे, काटे गए धागे। जैसे ढूँढती है एक बंजारिन बारिश में सूखी लकड़ियाँ। जैसे कुम्हारिन चुनती है माटी से कंकर, और बाशिंदे पौधों से कपास। चुनती हुई तुम, भर...

इस दुनिया का चेहरा सियाह हुआ पड़ा था

कविताएँ :: पीयूष तिवारी ब्लैकबोर्ड उसकी स्मृतियों में अमिट पंक्तियाँ थीं लिखी जा चुकी पंक्तियों पर लिखी जा रही पंक्तियों का दुहराव था पुरातत्वविदों ने पहचानी थी उसपर उग आई काई की वज़ह से उसकी प्राचीनतम इच्छा काई, प्राचीनतम नहीं थी मगर उनका उगना एक प्राचीनतम घटना थी अमूमन उसे पानी होना था लोटे से छलके तो ज़मीन पी ले उसे तो सिर्फ़ बुझानी थी सबकी प्यास यह स्पष्ट भी कितना अस्पष्ट था कि जो ख़ुद घिरा...

हसरतों के शहर देखेंगे हमारी ओर

कविताएँ :: सारुल बागला शहर और तुम 1. हसरतों के शहर देखेंगे हमारी ओर अपनी प्यासी आँखों से एक प्यास हमारे जिस्म की बेचैनी नहीं देख सकती। 2. तुम आ सको तो शहर के इस कोने तक आना इस शहर के इस तरफ मैं रहता हूँ गहरी गली में तुम आओगी तो थोड़ा बाहर निकल कर आऊँगा। 3. हमारी आदत छूट गयी जादू देखने की मदारी और बंदर दोनों बैठते हैं साथ साथ मुझे तुम्हारी आँखों में अब कुछ नहीं दिखाई देता। 4. शहर भीगा है तो...

इनका यही डर हमारी जीत है

कविताएँ :: सूर्यस्नात त्रिपाठी 1. मेरे शरीर को पिघलाकर तुम बनाना चाहते हो एक मौन और निस्प्रभ आकाश— स्मारक उस सुबह का जो मैंने देखा ही नहीं। परंतु मैं चाहता हूँ, मेरे अवर्त्तमान में मेरे अवयव किसी नादान बच्चे का खिलौना बन जाएं, मेरी आँखें किसी के लिए दर्पण बनें, मेरी अस्थियाँ वंशी बन जाएं, और मेरी छाती पर लेट कर तितलियाँ थकान मिटाएं। अपनी संकीर्णता में बंदी तुम क्या जानो, मैं जब पिघलूंगा शीतल...

एक बार और न लौटने की इच्छा में भी

कविताएँ :: अमर दलपुरा रास्ते में मिल गया था हमने नहीं कहा था अलविदा हम अलग हो चुके थे एक-दूसरे के जीवन से हम खो चुके थे धूल कणों की तरह हम नहीं बता पाए समाज और पिताओं को एक-दूसरे के साथ रहने का एक भी कारण कितने रास्ते अलग किए हमने कितनी बार सोचा कि हम नहीं मिलेंगे एक दिन मिल गए जीवन में तुमने कहा कि ये घर है खाट पर बैठाया खाना खिलाया और उसे भी बताया कि मेरे गाँव का लड़का है रास्ते में मिल गया था।...

तुम बहुत वर्षों की मेरी पृथ्वी

कविता :: अमन त्रिपाठी तुम बहुत वर्षों की मेरी पृथ्वी वह— प्रकृति का सारा ‌अदृश्य और सारा दृश्य— प्रकृति-स्वरूपा! उसकी ‌कोशिकाओं का‌ बनना-टूटना फूलों का खिलना-मुरझाना उससे ‌गुजरना महाअरण्य से गुजरना उसने यानी प्रकृति ने एक बार सोचा, कि इस धरती ‌के एक करोड़ ‌मनुष्य मर क्यों नहीं जाते और हिसाब ‌लगाकर निराश हो गई फिर भी बचे रह जाएँगे इतने अरब और इतने करोड़ फिर वह निराश रहने लगी या उदास या बीमार अपनी...

लगभग समाप्त सफ़ेद रातों के बीच

कविताएँ :: तनुज ज्योति के लिए वसंत आँखों को चुभता हुआ पार हो रहा है, एक भारी दरार आ चुकी थी मेरे माथे के ऊपर तुमने फेरी थी जिस दिन दुनिया की सबसे मुलायम उंगलियाँ बहुत कम उम्र में बहुत अधिक कमरा है बहुत अधिक कमरे में बहुत अधिक अंधेरा हैं एक चिड़िया भून रहा हूँ तवे पर, जो मेरी परछाईं है, उसके गोश्त का स्वाद कैसा होगा? त्रासदी को, और कौन दे सकता है सकल पदार्थ? ख़राब कवियों से सीख कवि खड़ा है! कहाँ खड़ा...

यह समय हँसने का तो नहीं है

कविताएँ :: कैलाश मनहर धतूरे का फूल धतूरे के फूल को निहार रहा हूँ बहुत देर से छोटी-सी सफेद दुंदुभि खुल-खिल रही है पँखुड़ियाँ दमक रही हैं पूरी श्वेताभा के साथ मैं स्वयं को रोक पाने में असमर्थ हूँ अभी छू लिया है मैंने लरजती अंगुलियों से वह फूल मैं अपनी तर्जनी और अँगूठे को सूंघता हूँ अहा!कैसी तो मादक गंध भर गई है नथुनों में अभिसारोपरांत थकी किसी स्त्री की काँख में छलछलाते पसीने की मृदु-तिक्त महक...

बाजार से कविता बचा लेने भर

कविताएँ :: सत्यम तिवारी डंडी तराजू-बटखारे में उलझे हुए हैं तुम्हारे हाथ किसी के हाथ में पतंग है कोई एम्बुलेंस से हाथ हिलाता है किसी का हाथ कट चुका है तुम्हारे जीवन में से ये किसने डंडी मार ली? नौसिखिया मेरा संघर्ष आम से लदे वृक्ष का तूफान में अपनी फूल-पत्ती बचा लेने भर का है या एक बच्चे का असबाब से एक खिलौना एक युवक का हड़ताल में अपनी नौकरी या एक वृद्ध का परिवार में एक बच्चा एक हाशिए में सिमटे...