Taganchit

Of a city’s few poets – about some poems I read recently

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NEW trails : Anchit That Hegel came to the conclusion that poetry is superior to other forms of art like architecture, sculpting, music, and painting – in terms of poetry being independent of any external medium(language) – is a far-fetched alien notion in Patna presently. It, being independent of any external medium(language), is something I rely upon a lot. The city struggles with...

आते हुए साल की पूर्व संध्या पर

ख़त :: प्रिय पाठक मुख्य विमर्श यह है कि देश में फ़ासीवाद है. यह बात खुल कर 2018 में स्थापित हो गयी, जो ढँका छिपा था वह बार-बार सुनियोजित घटनाओं से ज़ाहिर होता रहा है. फ़ासीवाद क्यों है, यह भी सोचा जाना चाहिए, सोचा जा रहा है. कई बार मुझको लगता है कि देश में जो घट रहा है और जो षड्यंत्र राजनीतिक दल, बड़े व्यापारी और नीति निर्धारक कर रहे हैं, सब सीधा-सीधा थ्योरी की क्लास से निकल बाहर आ रहा है और इतनी...

हैशटैग कलकत्ता

 यायावरी : अंचित कलकत्ता जाने की तैयारी मैं जाने कब से कर रहा था.  मेरी पहली प्रेयसी के गिटार की आवाज़ सन बारह से मुझे पुकार रही थी, उसका भेजा एक-एक गीत थोड़ा और रवीन्द्र को पास लाता. मुझे बेलूर के घाट, तस्वीरों से खींचते थे. स्मृति में गंध बहुत सालों बाद भौतिक एहसासों के बाद ही बस पाती है, उसके बाद भी उसे बार-बार रिकॉल करना असम्भव सा होता है. सन बारह में कलकत्ता जीतने और जीने के ख़्वाब देखने...

On a hot afternoon : some fragments

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For T.S. eliot who keeps popping up here and there in my thoughts Each afternoon I trudge through hot heavy metal afternoons through heaps of people and clusters of auto-rickshaws- Looking at pictures of homely dogs on Advertisement boards, ignoring a reporter with a microphone, Forgetful of love And fearful of traffic on weekdays. There is sun And there is shadow And none is isolated And I am...