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Like a tree breathing through its spectacles

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Poem:: Frank O’Hara Frank O’Hara lived in New York for a long time and composed many poems.  A fine pianist and a major poet of his time, he was amused by the temporality and the musicality of poetry. This particular poem found the editor in a bookstore when he was casually flipping through a volume of Collected Poems of Frank O’Hara. The editor was both happy and sad that day...

मेरी कविता वस्तुतः लाठी ही है

कविताएँ :: रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ कविता और लाठी तुम मुझसे हाले-दिल न पूछो ऐ दोस्त! तुम मुझसे सीधे-सीधे तबियत की बात कहो. और तबियत तो इस समय ये कह रही है कि मौत के मुंह में लाठी ढकेल दूं, या चींटी के मुंह में आटा गेर दूं. और आप- आपका मुंह, क्या चाहता है आली जनाब! जाहिर है कि आप भूखे नहीं हैं, आपको लाठी ही चाहिए, तो क्या आप मेरी कविता को सोंटा समझते है? मेरी कविता वस्तुतः लाठी ही है...

एकांत में मैं एक असंगत सैलाब में डूब जाती हूँ

न से नारी :: कविताएँ : मीना कंदासामी अनुवाद एवं प्रस्तुति : स्मृति चौधरी मीना कंदासामी की कविताएं हमारे समाज में अंतर्निहित जाति–व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध हैं. जातिवाद और पितृसत्ता से पीड़ित, कंदासामी अपनी कविताओं में एक दलित महिला होने के अनुभव के बारे में लिखती हैं.  उनकी हर किताब हमारे समाज के लिए एक आइने की तरह है. ‘मिस मिलिटेंसी‘ और ‘टच‘ उनके सबसे लोकप्रिय कविता...

बड़ी देर लगा दी पर अच्छा हुआ आ गए

कविताएँ:: भगवत रावत भगवत रावत  हिन्दी के प्रसिद्ध कवि हैं. उनके कई कविता संग्रह प्रकाशित हैं और इनकी कविताएँ रूसी भाषा में अनूदित हैं. इनके ‘समुद्र के बारे में’, ‘दी हुई दुनिया’ , ‘हुआ किस तरह’ आदि कविता संग्रह प्रकाशित हैं. निम्न कविताएँ ‘आधुनिक हिन्दी कविता संचयन से  आभार सहित ली गईं हैं.  सच पूछो तो एक ऐसी जगह खोजता रहा जीवन भर जहाँ बैठकर बेफिक्री से...

हम एक ही दृश्य के दो बिम्ब हैं

कविताएँ:: सौरभ राय थोड़ा आसमान में हवाई जहाज देखकर बचपन की उमंग याद करूँगा और डरूंगा भी थोड़ा कहीं बम तो नहीं बरसा देंगे बादल गरजेंगे उन्हें सुनूंगा पानी बरसेगा उसमें अधनंगा होकर नाचूंगा जहाँ लगी होगी चोट वहीं बार बार ठुकवाऊंगा इसी से दर्द की बनी रहेगी याद जिन्होंने सबसे अधिक अवहेलना की टिकट खरीदकर मिलने जाऊंगा उनसे देखता रहूँगा दरवाज़े पर खड़ा किसी लम्बी ट्रेन को गुज़रते जिन लोगों ने मुझे धकियाया था...

मुझमें अभी दुःख की बहुत संभावनाएं हैं

कविताएँ:: अमित तिवारी परिचय मैं बहुत थोड़े से लोगों को जानता था लेकिन बहुत सारे लोग मुझे जानते थे यह असंतुलित दिखने वाली एक प्रचलित व्यवस्था थी बाम की डिबिया की तरह प्रेम समय पर ढूंढे नहीं मिलता था प्रत्यक्ष औपचारिक सम्मान ने बहुत अधिक जगह घेर ली थी यह ज़्यादा से ज़्यादा एक घाटे का अर्थशास्त्र था मेरी बंधी हुई तनख़्वाह में बढ़ोत्तरी नाखून की तरह होती थी जिसकी खरोंच अंततः मुझ पर ही लगी मैं लगातार...