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नयी रचनाशीलता के साथ

लेख :: संजय कुंदन नामवर सिंह ( 28 जुलाई, 1926- 19 फ़रवरी 2019 ) हिंदी साहित्य के लब्धप्रतिष्ठ हस्ताक्षर थें, जिन्होंने आलोचना को रूढ़िवादिता के आवरण से निकालते हुए उसे आधुनिकता की समानांतर रेखा में लाकर खड़ा किया. उनका जीवन हिंदी की विस्तृत सेवा में लगा रहा, जिसमें देश के सम्मानित विश्वविद्यालयों में अध्यापन कार्य तो शामिल रहा ही, साथ ही आलोचना पर लिखी उनकी पुस्तकें और उनके व्याख्यान भाषा की पौध को...

कवि और अकवि

कविता : संजय कुन्दन  एक था कवि एक था अकवि दोनों एक ही शरीर में रहते थे कवि कविताएं लिखता और बिखरा देता अकवि उन्हें सहेजता और भेज देता पत्रिकाओं में कवि दिन भर भटकता शहर की गलियों में रात भर जागता एक तारे के साथ और डूब जाता उसी के साथ अपने ही भीतर के बियाबान में अकवि सज-धज कर गोष्ठियों में जाता संपादकों से मिलता उन्हें शराब पिलाता आलोचकों, वरिष्ठ कवियों की परिक्रमा करता उन पर अपने शब्द फूल और...

नाटक की समझ से मुक्तिबोध का संसार खुला

संस्मरण : संजय कुन्दन मुक्तिबोध की कविताओं से पहली बार सामना होने पर झटका लगा, बिल्कुल बिजली के करंट जैसा. उन दिनों मैंने मैट्रिक (दसवीं) की परीक्षा पास की थी और इंटर में मेरा दाखिला पटना कॉलेज में हुआ था. तब इंटर की पढ़ाई कॉलेज में होती थी. तब मेरी बड़ी बहन बीए में हिंदी साहित्य पढ़ रही थी. मुक्तिबोध उसके कोर्स में थे. मैं उसकी सारी किताबें पढ़ता था, सो मुक्तिबोध को भी पढ़ा. आश्चर्य हुआ कि क्या...