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मेरी नीरवता के बीच घुसता चला आता है समुद्र

कविताएँ :: पाब्लो नेरूदा अनुवाद एवं लेख : रामकृष्ण पाण्डेय नेरूदा का अनुवाद अनुवाद कर्म को कुछ लोग हेय दृष्टि से देखते हैं. और कुछ लोग प्रशंसा के भाव से. मुझे लगता है कि अनुवाद करना एक सामाजिक कृत्य है. ठीक उसी तरह जैसे कविता-कहानी लिखना. जैसे असामाजिक आदमी रचनाकार नहीं हो सकता, वैसे ही जो लोग अनुवाद को हेय दृष्टि से देखते हैं, उनमें मुझे सामाजिकता का अभाव नज़र आता है. अनुवाद को लेकर एक और समस्या...

स्त्री पुरुष से अलग है

न से नारी :: उद्धरण : जूलिया क्रिस्तेवा अनुवाद एवं प्रस्तुति : सृष्टि जूलिया क्रिस्तेवा प्रसिद्ध दार्शनिक, विचारक, आलोचक और मनोविश्लेषक हैं. हाल के दिनों में उन्होंने एक उपन्यास भी लिखा है. उन्होंने बार्थ जैसे बड़े भाषा विज्ञानी-चिंतकों के साथ काम किया है और उनके विचार फूको, लकां आदि चिंतकों के विचार पर आधारित हैं.  उनकी ख्याति स्त्रीवादी के रूप में भी है और वे बूवुआ, सिक्षु और इरिग्रे के साथ...

सत्रह की उम्र में कौन गम्भीर होता है. 

कविता :: आर्थर रिम्बौ अनुवाद एवं प्रस्तुति : अंचित आर्थर रिम्बौ विश्व कविता का जाना पहचाना नाम हैं. फ़्रेंच में लिखने वाले रिम्बौ ने पच्चीस की उम्र के बाद कविता नहीं लिखी और ग़ुलामों के व्यापार में लग गए. उनके बाद आने वाले कई यूरोपियन कवियों पर उनका प्रभाव साफ देखा जा सकता है. मेरे लिए रिम्बौ प्रथम अनुभवों और सहज जुनूनी प्रेम के कवि हैं. उनकी कविता का कैरेक्टर वही है जिसमें देह अपनी सम्पूर्णता...

मेरा ख़त तो लौट आया है

कविताएँ :: शक्ति चट्टोपाध्याय अनुवाद : अंचित ख़त तुमने घर छोड़ दिया है क्योंकि मेरा ख़त तो लौट आया है. तुम वहाँ नहीं हो और एक जंग लगे ताले के साथ घर खड़ा है. संदेशवाहक ख़त वापस ले आया – क्योंकि तुम चली गयी. तुमने ज़रूर कोई दूसरा घर खोज लिया होगा सही क़ीमत पर. पता भेजो, कितने कमरे हैं? रौशनी ठीक आती है? क्या तुमने बरामदे में पौधे रखे हैं? क्या वे बढ़ रहे हैं? मुझे सब बताओ, एक ख़त लिखो सब...