कथेतर ::
गोविंद निषाद

हजारी प्रसाद द्विवेदी के इस कथन से सहमत हुआ जा सकता है कि इतना बहुविध और स्तरों में विभाजित समाज आखिर कैसे एक रहा? वह इसका उत्तर देते हैं कि यह तीर्थों और मेलों के कारण संभव हुआ (हजारी प्रसाद द्विवेदी रचनावली, खंड चार; “भारतीय मेले”; राजकमल प्रकाशन)। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में आज भी ऐसे कई मेले लगते हैं जो महीनों तक चलते हैं और जिनमें समाज के विभिन्न हिस्से भाग लेते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में लगने वाले मेलों में अक्सर सिर्फ बलिया के ददरी मेले की चर्चा होती है, लेकिन उसी तरह लगने वाला अंबेडकर नगर और आजमगढ़ की सीमा पर स्थित गोविंद साहेब के मेले की चर्चा आम तौर पर बहुत कम ही होती है, जबकि आकार-प्रकार और समयावधि में यह मेला ददरी मेले से कम नहीं है। यह मेला मैं बचपन से देखता रहा हूँ। दरअसल इस मेले में स्थानीय जिलों के लोग तो आते ही हैं, लेकिन गाजीपुर और बलिया के श्रद्धालुओं की गाड़ियों की कतारें मैं अपने घर के पास लगी सड़क पर देखता रहा हूँ। आज से करीब बारह साल पहले अपनी क्रश को देखने गया था, जब उसकी शादी होने वाली थी। वह पता नहीं जानती भी थी कि नहीं कि वह मेरी क्रश है, लेकिन मैं उससे एकतरफा जबरदस्त मोहब्बत करने लगा था। जब मुझे अपने खास सूत्रों से पता चला कि वह गोविंद साहेब के मेले में आ रही है, तो मैं उसे देखने का यह मौका गंवाना गवारा नहीं समझा। मैं पहुँचा तो मेरे सूत्र ने बताया कि वह मंदिर के पास पोखर के किनारे खड़ी है, वह आ जाए। मैं पहुँचा तो वह लाल सूट-सलवार में बला की खूबसूरत लग रही थी। जैसे-जैसे मैं क़रीब होता गया, वैसे-वैसे मेरे दिल की धड़कनें फटने को हो गईं। जैसे ही उसने मेरी ओर देखा, लगा कि धड़कनें बंद हो गई हैं। हवाएँ बहना छोड़ चुकी हैं। लोग जहाँ हैं—वहीं खड़े हैं। सिर्फ मैं और वह एक-दूसरे को देख रहे हैं। मैं बहुत हिम्मत करके उसके पास जाकर बोलने ही जा रहा था कि उसका होने वाला पति आ गया। मैं खिसिया कर रह गया और एक भद्दी-सी गाली उसे देकर वहीं सीढ़ियों पर बैठकर रोने लगा।

मुझे याद है कि मैं उस दिन घंटों तक रोया था। शाम गहराने लगी थी। अब घर लौटना था, तभी मेरी नज़र शोभा सम्राट के बैनर पर गई। मात्र पचास रुपए में तीन घंटे तक आर्केस्ट्रा देखा जा सकता था। मैंने टिकट लिया और घुस गया। डांस देखते हुए मुझे बार-बार उसकी याद आती रही। कुछ भी मज़ा नहीं आ रहा था, जबकि लोग नृत्यांगनाओं पर फिदा होकर चिल्ला रहे थे। रात नौ बजे रोते हुए घर लौटा था। अब शोभा सम्राट बंद हो गया है, क्योंकि आर्केस्ट्रा बहुत सस्ता हो गया है, लेकिन सूत्रों से पता चला कि यह राजनीतिक और सामाजिक कारणों से बंद हुआ है। इसका ज़िक्र करना बेवजह इसे लंबा कर देगा और संपादक इसे छापने से भी मना कर देंगे। इसलिए इसे छोड़ते हैं। पिछले हफ्ते हैदराबाद से लौटने के बाद इलाहाबाद तो गया, लेकिन रात में ही भतीजे का कॉल आया कि चाचा कहाँ हो? मैंने बताया कि इलाहाबाद हूँ, तो वह भड़क गया। लगा कहने कि आपको बोला था कि चौदह को बरक्षा है, आ जाइएगा। मैंने कहा कि मुझे लगा कि तेरह को है, तुम्हें मैसेज करना चाहिए था न। उसने मुझे ही खरी-खोटी सुनाते हुए कहा कि मैसेज किया था और आपने “ठीक है” भी कहा था। फिर कैसे भूल गए? मैंने मोबाइल देखा तो देखा कि मैंने सचमुच ही कहा था कि ठीक है। फिर मैंने उसे सुबह ही उठकर आने की बात कही। और सुबह ठंड में ही बस से आजमगढ़ घर आ गया। भतीजे के बरक्षा के अगले दिन सागर चाचा का बरक्षा था, लेकिन मैंने तय किया कि उसी में से दो घंटे का समय निकालकर गोविंद साहेब के मेला जाऊँगा। तो चल पड़ा मैं भाई जयहिंद के साथ।

यहाँ प्रतिदिन औसतन दस हजार से ज़्यादा श्रद्धालु गोविंद साहेब को खिचड़ी चढ़ाने प्रतिदिन आते हैं। ऐसा क्यों है? इसके पीछे कई कहानियाँ हैं, जिनमें से एक कहानी जो वहाँ मौजूद रामदास ने मुझे सुनाई, वही मैं आपके सामने रखने जा रहा हूँ— कहते हैं कि 1726 ई. में जलालपुर, अंबेडकर नगर स्थित एक गाँव में गोविंद साहेब का जन्म हुआ। बचपन से जिज्ञासु प्रवृत्ति के गोविंद साहेब जीवन के मर्म को समझने के लिए व्यग्र हो गए। फिर ज्ञान-प्राप्ति की तलाश में वह पूर्व दिशा की ओर निकले। चलते-चलते वह गाजीपुर में गंगा के किनारे स्थित एक गाँव ‘घुरसुंड’ पहुँचे। वहाँ भीखा बाबा नामक एक संत रहा करते थे, जिनकी ख्याति चारों ओर फैली हुई थी। वह एक सूफ़ी और भक्ति की कबीर परंपरा के संत थे। आस-पास के लोगों को रूढ़ियों और कुरीतियों के ख़िलाफ़ जागरूक करते थे। गोविंद साहेब वहाँ पहुँचे और उन्होंने भीखा बाबा से अपना शिष्य बनाने की प्रार्थना की। उनकी निष्ठा से प्रभावित होकर भीमा बाबा ने उन्हें अपना शिष्यत्व प्रदान किया। धीरे-धीरे वह अपने ज्ञान को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर होते गए। एक दिन की बात है। एक चरवाहा भीखा बाबा को ढूँढते हुए आया। भीखा बाबा को न देखकर उसने गोविंद साहेब से पूछा कि भीखा बाबा कहाँ हैं? गोविंद साहेब ने जवाब दिया कि जाइए, वहाँ देखिए—गोरू-बछरू बाँध रहे होंगे। यह जवाब सुनकर चरवाहा आश्चर्य में पड़ गया कि यह आदमी बाबा के बारे में क्या कह रहा है—इतना गुस्ताख! फिर वह उलाहना देने के लिए भीखा बाबा के पास जाने लगा। उन्हें खोजते-खोजते जब वह उनके पास पहुँचा तो देखता है कि भीखा बाबा सचमुच बछड़े को बाँध रहे हैं। वह आश्चर्यचकित रह गया कि यह बात उसने घंटों पहले कैसे जान ली कि भीखा बाबा सही में बछड़े बाँध रहे हैं। वह ईर्ष्यावश भीखा बाबा के पास पहुँचा और बोला कि उस आदमी ने आपके लिए ऐसा-ऐसा बुरा कहा था। फिर उन्होंने कहा कि जाओ, उस आदमी को बुला लाओ। जब वह गोविंद साहेब को बुलाने गया तो गोविंद साहेब ने उससे कहा कि तुम हमारी चुगली कर आ रहे हो और अब बुलाने आए हो। इतना सुनते ही चरवाहा सकते में आ गया कि इसे कैसे पता चल गया। इसके बाद भीखा बाबा ने गोविंद साहेब से कहा कि शिष्य, अब तुम ज्ञान को प्राप्त हो चुके हो। अब तुम जिस दिशा और जगह से आए थे, उसी दिशा में वापस जाओ और लोगों के बीच ज्ञान का प्रकाश फैलाओ। इसके बाद गोविंद साहेब वापस लौटे और बूढ़ी गंडक नदी के किनारे एक आश्रम बनाया, जिसे रामदास बिना किसी झिझक के गंगा नदी कह रहे थे। उत्तर भारत में जो भी नदी हो, लोग उसमें गंगा को ही देखते हैं। ऐसा ही रामदास जी के साथ भी हो रहा था। वह बताते हैं कि फिर गोविंद साहेब इसी नदी के किनारे अपनी गायों और भैंसों को चराते हुए लोगों के बीच ज्ञान देते थे। ठीक उससे कुछ किलोमीटर दूर एक और सूफ़ी संत ख़्वाजा मकदूम बाबा रहा करते थे। जब उन्हें पता चला कि कोई संत-फकीर वहाँ आया है, तो उन्होंने गोविंद साहेब की परीक्षा लेनी चाही। उन्होंने भैंस का मांस मटके में भरकर कहारों से भिजवाया। जब कहारों ने मटके को गोविंद साहेब के सामने रखा, तो उन्होंने खिचड़ी बनाने के बाद बची हुई राख को उसके ऊपर छिड़ककर उसे वापस भिजवा दिया। जब मकदूम बाबा ने मटके को खोला तो उसमें छिन्नी (मिठाई का एक प्रकार) और चावल थे। तब मकदूम बाबा भी समझ गए कि कोई बड़ा संत वहाँ रहने आया है। इसके बाद वह उनसे मिले और विचारों का आदान-प्रदान होने लगा।

गोविंद साहेब एक किसान परिवार से आते थे। धीरे-धीरे भैंसों के साथ उन्होंने जंगल के आसपास खेती करनी शुरू की और गन्ना उगाना शुरू कर दिया। यह गन्ना लाल किस्म का होता है, जो केवल रस पीने के लिए होता है। इससे किसी तरह का गुड़ नहीं बनाया जा सकता। धीरे-धीरे लोगों ने आश्रम के आसपास बसावटों का निर्माण करना शुरू किया। फिर बाबा गोविंद साहेब ने आसपास के दियारे में अपनी ख्याति प्राप्त की। धीरे-धीरे वह आसपास के जिलों में विख्यात हो गए। धीरे-धीरे यह बात गाजीपुर और बलिया में पहुँची। बलिया और गाजीपुर से लोग उनके दर्शन के लिए आने लगे। आने का यह सिलसिला शुरू हुआ तो यह एक तीर्थयात्रा में बदलता गया। कहते हैं कि गोविंद साहेब भी दोहा के रूप में अपनी वाणी को रखते थे। उन्होंने कई दोहों और चौपाइयों की रचना की। मुझे नहीं पता कि उनका लिखा हुआ कुछ भी वर्तमान में मौजूद है या नहीं। हाँ, यह ज़रूर है कि उनके समाधि स्थल पर कुछ दोहे उनके नाम से वर्णित हैं, जो उन्हीं के लिखे हुए बताए जाते हैं। उनके लिखित दोहों की खोज एक नए शोध को दिशा दे सकती है। यह काम कोई शोध अध्येता करना चाहे तो दिलचस्प होगा। मैं उन दोहों को यहां रख देता हूँ—

पलटू चाहें राम को, करें सन्त से प्रीति।
अगम निगम हम खोजिया यही मिलन की रीति॥
भीसा भूखा कोई नहीं, सबकी गाँठी लाल।
सोलन की गति जाने नहीं, ताते भया कंगाल॥
जिन ढूँढा तिन तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा रहा किनारे बैठि॥
साँचा सदगुरु पाइके, जय गोविन्द हर्षांन।
धन्य धन्य पुनि धन्य है, सदगुरु कृपा निधान॥
राम नाम बिन दाम की बेटी।
पलटू दास ब्यापि सब छूटी॥
सुख के सागर राम हैं, दुख के भंजनिहार।
राम चरण तजिये नही, भजिये बारम्बार॥

गोविंद साहेब का जुड़ाव सूफ़ी और भक्ति परंपरा से रहा। वह जीवन भर विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के बीच सांप्रदायिक सौहार्द के पक्षधर रहे। जब उनकी मृत्यु हुई, तब उनकी समाधि बनाने का निर्णय लिया गया। जहाँ उनका आश्रम हुआ करता था—वहीं पर उनकी समाधि का निर्माण किया गया। उनके सूफ़ी परंपरा से जुड़ाव का सबसे बड़ा गवाह उनकी समाधि के ऊपर बना मक़बरा है। हाँ, मक़बरा है! आपको आश्चर्य हो रहा होगा कि एक मक़बरा है तो अभी कैसे सुरक्षित है। जी, वह भली-भाँति सुरक्षित है और लोग आज भी उस मक़बरे पर उनकी समाधि के दर्शन हेतु आते हैं।

मक़बरे का गुंबद विशुद्ध इस्लामिक शैली में बना है, जैसा ताजमहल या अन्य मक़बरों में दिखाई देता है। उसका प्रांगण भी एक ऐसी स्थापत्य शैली में निर्मित है, जो दोनों शैलियों—नागर और इस्लामिक—से मिलती-जुलती है। इसका निर्माण कब और किसने किया? यह भी एक शोध का विषय है। अगर कोई इस पर शोध करे तो इतिहास की कई दिलचस्प बातें हमें पता चल सकती हैं। लेकिन किसको इतनी फ़ुरसत है कि स्थानीय इतिहास में शोध करे, जिसमें फ़ील्डवर्क के साथ गहन अध्ययन की आवश्यकता हो। हाल में जब मैंने अहमदाबाद यूनिवर्सिटी में हेरिटेज पर आयोजित संगोष्ठी में भाग लिया, तो मुझे मूर्त और अमूर्त—दोनों विरासतों का सैद्धांतिक आधार समझने में मदद मिली। फिर इतिहास का छात्र होने और एक सामाजिक विज्ञान संस्थान में शोध छात्र होने ने मेरी दिलचस्पी दोनों तरह की विरासतों में और बढ़ा दी। वहीं दूसरी तरफ सेंटर फ़ॉर दलित स्टडीज़ और रोज़ा लक्ज़मबर्ग स्टिफ़टंग द्वारा आयोजित “डेमोक्रेसी स्कूल” में वक्ता के तौर पर आईं विख्यात इतिहासकार शैलजा पाइक से जब मैंने यह सवाल किया कि अगर कहीं इतिहास- लेखन में लिखित स्रोतों की कमी हो, तो क्या उस समय किसी कहानी, उपन्यास या किसी साहित्यिक कृति को स्रोत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है? उनका जवाब इतिहास-लेखन की रूढ़ पद्धति को तोड़ने वाला था। उन्होंने कहा कि हाँ, हो सकता है, लेकिन उसकी वैधता को किसी अन्य स्रोत से पुष्ट करना होगा। उनका कहना था कि इसका एक ही उत्तर हो सकता है—आप उस क्षेत्र में गहन फ़ील्डवर्क या एथनोग्राफ़िक वर्क कीजिए। मुझे लगा कि फिर तो मेरा शोध सही दिशा में है। मेरे अपने शोध निर्देशक बद्रीनारायण भी इस पद्धति को अपनाने की बात करते हैं। मैं कहना यह चाहता हूँ कि अगर कोई शोधार्थी इस तरीके से गोविंद साहेब, उनके साहित्य और लोकप्रियता पर शोध करे, तो दिलचस्प इतिहास हमें पढ़ने को मिल सकता है। अब आते हैं एक परंपरा पर, जो यहाँ प्रचलित है। परंपरा है कि कार्तिक मास के खत्म होने के साथ यहाँ एक बड़ा मेला लगता है, जिसमें आसपास के जिलों के साथ गाजीपुर और बलिया के तीर्थयात्री बहुतायत में आते हैं। परंपरा है कि खेत का नया धान गोविंद साहेब को चढ़ाया जाता है। एक छोटी-सी पोटली में धान बाँधकर उसे समाधि स्थल और मक़बरे के ऊपर श्रद्धालु चढ़ाते हैं। साथ में वह गोविंद साहेब द्वारा बनाए जाने वाले भोजन—खिचड़ी और भौरी (लिट्टी)—का प्रसाद भी उन्हें चढ़ाते हैं। जब मैं वहाँ पहुँचा तो दूर से ही गुंबद पर छोटी-छोटी पोटलियाँ नज़र आईं। तो भाई जयहिंद से पूछा कि क्या है वह? उसने बताया कि लोग धान की पोटलियाँ यहाँ चढ़ाते हैं। लोगों ने वहीं पोटलियाँ गुंबद पर चढ़ा दी हैं। मुझे एक वाक़या याद आया। मैं अपने भैंस चराने वाली पार्टनर—मेरी काकी—अक्सर कहती थीं कि, “भैरों बाबा के हम दोई बोरा इलाइची चढ़ाइब।” मैं सोचने लगता कि दो बोरा इलाइची कोई कहाँ से लाएगा। मैं इस पर बहुत दिनों तक सोचता रहा। फिर एक दिन मैंने उनसे ही पूछा कि, “काकी, इ दो बोरा इलाइची कहाँ से लावत ह सब?” वह हँसने लगीं और बोलीं, “अरे, बोरा मतलब उ बोरा न होला। बोरा मतलब दो छोटी-छोटी पोटलियाँ।” मैं हँसने लगा। फिर मैं यह सोचकर बार-बार हँसता। उस दिन वहीं धान से भरी पोटलियाँ जब गुंबद पर देखीं तो मुझे वह वाक़या याद हो आया। मैं मन ही मन हँसने लगा। इसकी शुरुआत इससे हुई थी कि लोग गोविंद साहेब को चावल की नई फसल का धान देने आते थे। उनके मृत्योपरांत लोग धान को धीरे-धीरे उनकी समाधि पर चढ़ाने लगे। फिर यह परंपरा बन गई। यहीं से नया चावल चढ़ाने की परंपरा का सूत्रपात हुआ।

भाई को जूते की रक्षा करने के उद्देश्य से उसे वहीं खड़ा करके मैं मंदिर के अंदर गया। मैंने उसे बताया कि यार, कुंभ मेले में भंडारा खाने के चक्कर में मेरा अच्छा जूता चला गया था, इसलिए मुझे भरोसा नहीं हो रहा‌ है। मैं सीढ़ियों से होता हुआ अंदर पहुँचा। समाधि स्थल का कमरा पोटलियों से भरा हुआ था। मैंने श्रद्धा से उन्हें नमन किया और चारों ओर अपनी नज़र दौड़ाई। हर तरफ श्रद्धालु फ़ोटो लेते और उन्हें नमन करते हुए दिखाई दे रहे थे। मैं कुछ फ़ोटो लेने के बाद मंदिर के दूसरी ओर निकल गया। जैसे ही बाहर निकला कि एक बाबा टीका लगाने के लिए आ गए। मैंने उन्हें मना किया, लेकिन जब उन्होंने दूसरी बार कहा तो मैं रोक नहीं पाया। लेकिन मैंने उन्हें बता दिया कि देखिए, मेरे पास एक रुपया भी नहीं है। तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं। मैंने कहा कि फिर लगा दीजिए। मैंने उनसे पूछा कि क्या आप यूपीआई से पैसा ले लेंगे? उन्होंने कहा कि हाँ, ले लेंगे। मैंने सिर्फ़ क्यूआर कोड का फ़ोटो लिया और बताया कि यह मोबाइल मेरे भाई का है। मैं इसका पासवर्ड नहीं जानता, लेकिन आपको मैं ज़रूर भुगतान कर दूँगा।
वहाँ से पोखर के पास गया। तीन बच्चे पैसे ढूँढ रहे थे। मैंने कहा कि कुछ मिला? उन्होंने कहा कि नहीं, अभी तो कुछ नहीं मिला। मैंने कहा कि प्रयास करो, मिल जाएगा। मैंने अपने पाँव पोखर में डाले, फिर हाथ। यह वही जगह थी जहाँ मैंने अपनी क्रश को अंतिम बार देखा था। ऐसा लग रहा था कि शायद वह इसी मेले में दिख जाए, जैसे अन्य जोड़े दिख रहे थे। यह मेला इस मायने में भी खास है कि दूर-दराज़ के गाँवों के प्रेमी-प्रेमिकाएँ यहाँ खूब आते हैं। नवविवाहित जोड़े तो आशीर्वाद लेने आते ही आते हैं। मेला सिर्फ़ सामाजिक दूरियाँ ही नहीं मिटाता, बल्कि प्रेम की दूरियाँ भी मिटाता है। मैंने कई ऐसे प्रेमी जोड़े देखे जो स्वतंत्र होकर नीले गगन के तले अपने प्यार को पाल रहे थे। इस पोखर के बारे में मिथक है कि यह पोखर किसी गुप्त स्रोत से जुड़ा हुआ है, जिसके कारण यह कभी सूखता नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि यह बगल की गंगा नदी से जुड़ा हुआ है, इसलिए नहीं सूखता। मिथक कोई भी हो, लेकिन एक बात सत्य है कि इस पोखर का पानी कभी सूखता नहीं है। हाँ, तो मैंने इस पोखर में पाँव पखारे। फिर सीढ़ियों से होता हुआ ऊपर आया। बगल में दो बुज़ुर्ग मिट्टी की हंडिया में खिचड़ी और आग में भौरी (लिट्टी) बना रहे थे। मैंने उनसे पूछा कि दादा, इसका क्या करेंगे? उन्होंने बताया कि हम इसे पहले गोविंद साहेब को चढ़ाएँगे और फिर प्रसाद के रूप में घर ले जाएँगे। वहाँ से होता हुआ मैं एक छोटे द्वार से एक बड़े बरामदे में प्रवेश किया, जहाँ रामदास जी खड़े थे, जिन्होंने मुझे कथा सुनाई थी। उनके पास पहुँचकर मैंने प्रणाम किया और पूछा कि बाबा, वह जो नाम लिखा है, वह कौन थे? दरअसल वहाँ तीन अन्य लोगों की भी समाधियाँ थीं, जहाँ लोग दर्शन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि यह गोविंद साहेब के उत्तराधिकारी रहे हैं। फिर मैंने दूसरा सवाल किया कि आप गोविंद साहेब के बारे में कुछ बताएँगे?

फिर उन्होंने मुझसे पूछा—
बाबू, आप करते क्या हैं?
मैं—मैं पढ़ाई करता हूँ।
बाबा—कहाँ के रहने वाले हैं?
मैं—मेरा घर भैरों बाबा के पास है।
बाबा—भैरों बाबा में कहाँ?
मैं—बाबा, मैं देउरपुर से महाराजगंज वाले मार्ग पर स्थित एक गाँव का रहने वाला हूँ।
बाबा—अच्छा, वह सरैया।

मैं—हाँ-हाँ, बाबा।
बाबा—बेटा, कभी इत्मीनान से आओ तो बताऊँ कि गोविंद साहेब कौन थे।
मैं—बाबा, मैं फिर आऊँगा, लेकिन मुझे मुख्य कथा बता दीजिए।
बाबा—ठीक है, बताता हूँ।

फिर उन्होंने वह कथा सुनाई, जिसका मैंने ऊपर ज़िक्र किया है। वह दिव्यांग हैं। उन्हें आँखों से दिखाई नहीं देता। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और कथा सुनाने लगे। उनके हाथ के कोमल स्पर्श से मुझे लगा कि कोई मुलायम-सी चीज़ हाथ में समा गई हो। फिर वह श्रद्धालुओं को पुड़िया में बँधी भभूत आने वाले श्रद्धालुओं को देते रहे।

जब सब श्रद्धालु चले गए, तब उन्होंने मुझसे कहा कि बाबू, अंदर देख लीजिए कि किसी ने पैसे चढ़ाए हों तो उन्हें दान-पेटी में लाकर रख दीजिए और समाधि भी देख लीजिए। मैं अंदर गया। समाधियाँ देखीं। कुछ सेल्फ़ी लीं। फिर मेरी नज़र अचानक एक खड़ाऊँ पर गई, जो एक समाधि पर रखी हुई थी। मैंने उसका फ़ोटो लिया। फिर पैसे ढूँढने लगा। कहीं कुछ नहीं था, केवल पाँच रुपए का एक सिक्का था। मैं बाहर आया तो उन्होंने पूछा कि कुछ था? मैंने कहा कि नहीं, सिर्फ़ पाँच रुपए थे। फिर उन्होंने कहा कि बेटा, कभी और आइएगा, और भभूत की एक पुड़िया मुझे थमा दी। मेरे पास धान नहीं था, इसलिए मैंने वहाँ चढ़ाए गए धान से ही एक मुट्ठी उठा ली और उन्हें चढ़ा दिया। बाहर निकला तो भाई जूते का इंतज़ार कर रहा था। हम आगे ही बढ़े थे कि एक बुज़ुर्ग पैसे माँग रहे थे। वह एक मुस्लिम थे। आगे ढोल बेच रहे नौजवान से जब मैंने नाम पूछा, तो उसने अपना नाम इमरान बताया। ऐसे ही न जाने कितने लोग थे, जो अलग-अलग विक्रय के कार्यों में लगे हुए थे। इस तरह से यह मेला उस नैरेटिव से अभी भी अछूता है कि एक ख़ास पहचान के व्यक्ति से सामान नहीं खरीदना है। यह गोविंद साहेब की विचारधारा की परंपरा है, जो जीवित है। यहाँ का सबसे प्रिय बिकने वाला सामान ‘खजला’ है, जो मेले से शुरू होकर बीस किलोमीटर दूर तक बिकता है। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आए व्यापारी बेचते हैं। मेले में तरह-तरह के प्रयोग लोग करते हैं, जो बिना किसी भारी निवेश के ज़्यादा पैसा कमा सकें। कई जगह मैंने देखा कि एक आदमी यह शर्त लगा रहा था कि अगर कोई डंडे पर एक सौ बीस सेकेंड तक लटका रह सकता है, तो उसे एक हज़ार रुपए मिलेंगे। एक बार लटकने के लिए बीस रुपए देने होंगे। जिन लोगों को मैंने देखा, उनमें से कोई भी चालीस सेकेंड से ज़्यादा नहीं लटक पाया। आगे लोहे के सामान बेच रही एक गड़िया लड़की दिखी, जो देखने में बहुत खूबसूरत थी। वह आवाज़ लगा-लगा कर अपना सामान बेच रही थी। अब अगर मैं सोलह साल का होता तो वह मेरी क्रश होती और उसे मैं अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करता। हो सके तो प्यार भी करता लेकिन जब समझ आई तो उम्र चली गई। मैंने निजता का उल्लंघन करते हुए उसकी एक तस्वीर खींच ही ली। आगे सपेरा अपने बच्चे के साथ दो साँपों के साथ बैठा था और पैसे माँग रहा था। उसका तीन साल का बच्चा साँपों के साथ ऐसे खेल रहा था, जैसे कोई बच्चा खिलौनों के साथ खेलता है। एक आदमी ने साँप को पकड़ने की कोशिश की तो बच्चा रोते हुए डरकर दूर भागने लगा। मैंने सोचा—वाह, क्या बात है! सामाजिककरण कितना मायने रखता है। बच्चे का सामाजिककरण ही ऐसा हुआ है कि वह मनुष्य को ख़तरनाक समझता है, बनिस्बत साँपों के। मैंने फिर निजता का उल्लंघन करते हुए उस बच्चे का एक फ़ोटो क्लिक कर लिया। फिर वापसी वाले रास्ते भर सिर्फ़ लाल गन्ना बेचने वाले किसान और उनके बच्चे खड़े थे, जो आवाज़ देकर ग्राहकों को बुला रहे थे। लाल गन्ना केवल चूसने या उसका रस पीने के काम आता है। वह ईंखों के मुक़ाबले काफ़ी मुलायम होता है। वह और किस क्षेत्र में उगाया जाता है, मुझे नहीं पता। आपको पता हो तो बताइएगा। यह प्रसाद के रूप में लोग घर ले जाते हैं। मेला हमें आज भी जोड़ता है। अक्सर कुंभ जैसे मेलों की छत्रछाया में गोविंद साहेब जैसे महीनों तक चलने वाले मेले छिप जाते हैं, जबकि इनकी महत्ता किसी भी मायने में—सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से—कम नहीं है। अगर कोई हजारी प्रसाद द्विवेदी के “गूँगा पीर के मेले” की भाँति इस तरह के मेलों का सर्वेक्षण करे, तो दिलचस्प रिपोर्ट पढ़ने को मिल सकती है। नया साहित्य मिल सकता है और इतिहास भी। अंत में मैं कहना चाहता हूँ कि—हे साहित्यिक और अकादमिक दुनिया के विद्वानों, लोकतंत्र यहाँ है। इसे बचाओ, संविधान अपने आप बच जाएगा।

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गोविंद निषाद हिंदी की नई पीढ़ी से संबद्ध कवि-लेखक हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ, संस्मरण, रिपोर्ताज, लेख और शोध आलेख प्रकाशित। वर्तमान में जी. बी. पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में शोध छात्र भी हैं। उनसे writerstory2001@gmail.com पर बात हो सकती है 

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