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कहानियाँ /
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  • स्वप्न बुक - गद्य:: सौरभ पांडेय स्वप्न बुक "एक पक्षी के मरने पर कितने आसमान समाप्त हो जाते हैं" - नवारुण भट्टाचार्य सारी…
  • एक पुरानी पाण्डुलिपि - कहानी :: फ्रांज़ काफ़्का हिंदी अनुवाद : श्रीविलास सिंह  ऐसा लगता है कि हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था में बहुत…
  • उदासी एक मंजर है - कहानी :: अविनाश पीड़ा का एक शाश्वत सिद्धांत है कि उसकी तय समय-सीमा होती है, जिसके बाद वह निर्जीव हो…
  • स्केच - कहानी :: सौरभ पाण्डेय 1 मैं पेंसिल की लकीरों में छुपा हुआ पापा का पुराना चेहरा देख रहा था. अब…
  • घृणा - कहानी :: परवीन फैज़ जादा मलाल अनुवाद और प्रस्तुति : श्रीविलास सिंह "यह पूरे चार किलो है।" जब उसने ये…

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इस दुनिया का चेहरा सियाह हुआ पड़ा था

कविताएँ :: पीयूष तिवारी ब्लैकबोर्ड उसकी स्मृतियों में अमिट पंक्तियाँ थीं लिखी जा चुकी पंक्तियों पर लिखी जा रही पंक्तियों का दुहराव था पुरातत्वविदों ने पहचानी थी उसपर उग आई काई की वज़ह से उसकी प्राचीनतम इच्छा काई, प्राचीनतम नहीं थी मगर उनका उगना एक प्राचीनतम घटना थी अमूमन उसे पानी होना था लोटे से छलके तो ज़मीन पी ले उसे तो सिर्फ़ बुझानी थी सबकी प्यास यह स्पष्ट भी कितना अस्पष्ट था कि जो ख़ुद घिरा...

हसरतों के शहर देखेंगे हमारी ओर

कविताएँ :: सारुल बागला शहर और तुम 1. हसरतों के शहर देखेंगे हमारी ओर अपनी प्यासी आँखों से एक प्यास हमारे जिस्म की बेचैनी नहीं देख सकती। 2. तुम आ सको तो शहर के इस कोने तक आना इस शहर के इस तरफ मैं रहता हूँ गहरी गली में तुम आओगी तो थोड़ा बाहर निकल कर आऊँगा। 3. हमारी आदत छूट गयी जादू देखने की मदारी और बंदर दोनों बैठते हैं साथ साथ मुझे तुम्हारी आँखों में अब कुछ नहीं दिखाई देता। 4. शहर भीगा है तो...

इनका यही डर हमारी जीत है

कविताएँ :: सूर्यस्नात त्रिपाठी 1. मेरे शरीर को पिघलाकर तुम बनाना चाहते हो एक मौन और निस्प्रभ आकाश— स्मारक उस सुबह का जो मैंने देखा ही नहीं। परंतु मैं चाहता हूँ, मेरे अवर्त्तमान में मेरे अवयव किसी नादान बच्चे का खिलौना बन जाएं, मेरी आँखें किसी के लिए दर्पण बनें, मेरी अस्थियाँ वंशी बन जाएं, और मेरी छाती पर लेट कर तितलियाँ थकान मिटाएं। अपनी संकीर्णता में बंदी तुम क्या जानो, मैं जब पिघलूंगा शीतल...

एक बार और न लौटने की इच्छा में भी

कविताएँ :: अमर दलपुरा रास्ते में मिल गया था हमने नहीं कहा था अलविदा हम अलग हो चुके थे एक-दूसरे के जीवन से हम खो चुके थे धूल कणों की तरह हम नहीं बता पाए समाज और पिताओं को एक-दूसरे के साथ रहने का एक भी कारण कितने रास्ते अलग किए हमने कितनी बार सोचा कि हम नहीं मिलेंगे एक दिन मिल गए जीवन में तुमने कहा कि ये घर है खाट पर बैठाया खाना खिलाया और उसे भी बताया कि मेरे गाँव का लड़का है रास्ते में मिल गया था।...

तुम बहुत वर्षों की मेरी पृथ्वी

कविता :: अमन त्रिपाठी तुम बहुत वर्षों की मेरी पृथ्वी वह— प्रकृति का सारा ‌अदृश्य और सारा दृश्य— प्रकृति-स्वरूपा! उसकी ‌कोशिकाओं का‌ बनना-टूटना फूलों का खिलना-मुरझाना उससे ‌गुजरना महाअरण्य से गुजरना उसने यानी प्रकृति ने एक बार सोचा, कि इस धरती ‌के एक करोड़ ‌मनुष्य मर क्यों नहीं जाते और हिसाब ‌लगाकर निराश हो गई फिर भी बचे रह जाएँगे इतने अरब और इतने करोड़ फिर वह निराश रहने लगी या उदास या बीमार अपनी...