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यह मृत्युपूजकों का देश है प्यारे

कविताएँ :: सुधीर सुमन मृत्यु और जीवन के बीच मृत्यु फेरे लगा रही दूर भाग रहे वे जिंदगी की छटपटाहट लिए जो बड़े फिक्रमंद थे दामन छुड़ाकर जा रहे न जाने किस जीवन की ओर॰ कोई संग मरने का खतरा नहीं उठाना चाहता यह देख-देख ताक में खड़ी मौत बेतहाशा किलकती है। अशांत बेहद भयानक कोई समुद्र है जिसमें डूबता उतराता देखता हूं दूर खड़े समानधर्मा साथियों को जो बताते हैं इस भंवरजाल से मुक्ति के तरीके। पर अभी दूर हैं वे...

सारे उत्सव स्थगित

कविता :: अरुण श्री सारे उत्सव स्थगित मैं प्रेम में हूँ कि मछली है कोई नदी के बाहर और जिन्दा है। तुम साथ हो मेरे कि मैं साथ के स्वप्न में हूँ। बारिश की कोई बूँद नहीं टपकी हमारे होठों पर आधी-आधी। किसी दूब ने हमारे पाँव नहीं चूमे साथ-साथ। मेरी आँखों में पड़ी रेत कभी तो न किरकिराई आँखें तुम्हारी। हम निकले ही नहीं घरों से अपने-अपने, और लिखते रहे— किसी साझा गंतव्य के लिए कितनी ही कविताएँ। तुमने...

कला भी अश्लील हो सकती है

कविताएँ :: कपिल भारद्वाज 1. मेरे देश एक निर्णय करना ही होगा तुम्हें कि चाँद सिर के ऊपर से जब गुजरे तो उसके दोनों सींग पकड़कर अपने कमरे में घसीट लाओ और तब तक बंदी बनाकर रखो जबतक पक्षियों का कलरव न सुनाई दे। मेरे देश एक निर्णय करना ही होगा तुम्हें कि जब कोई मसखरा/ मंच पर कबीर को ढूंढने का दावा करे और मंच के नीचे/ आदमियत की टांट पर थूके तो उसे आकाश से टूटते तारे की सीध में फेंक दिया जाए। मेरे देश एक...

सबके दरवाज़े देखता हुआ

नए पत्ते:: कविताएँ : रौशन पाठक ढूँढती हूँ तुम में, तुमको। जब भी तुमसे मिलता हूँ, तुम मेरी कमीज़ पर कुछ ढूँढती हो। कुछ रेशे, कुछ धागे, उलझे सवाल और कुछ रौशनी के दाग़। दूर बैठकर निहारती हो मेरा चेहरा और पास बैठे ढूँढती हो मेरे स्वेटर में अधबुने, टूटे, काटे गए धागे। जैसे ढूँढती है एक बंजारिन बारिश में सूखी लकड़ियाँ। जैसे कुम्हारिन चुनती है माटी से कंकर, और बाशिंदे पौधों से कपास। चुनती हुई तुम, भर...

इस दुनिया का चेहरा सियाह हुआ पड़ा था

कविताएँ :: पीयूष तिवारी ब्लैकबोर्ड उसकी स्मृतियों में अमिट पंक्तियाँ थीं लिखी जा चुकी पंक्तियों पर लिखी जा रही पंक्तियों का दुहराव था पुरातत्वविदों ने पहचानी थी उसपर उग आई काई की वज़ह से उसकी प्राचीनतम इच्छा काई, प्राचीनतम नहीं थी मगर उनका उगना एक प्राचीनतम घटना थी अमूमन उसे पानी होना था लोटे से छलके तो ज़मीन पी ले उसे तो सिर्फ़ बुझानी थी सबकी प्यास यह स्पष्ट भी कितना अस्पष्ट था कि जो ख़ुद घिरा...

हसरतों के शहर देखेंगे हमारी ओर

कविताएँ :: सारुल बागला शहर और तुम 1. हसरतों के शहर देखेंगे हमारी ओर अपनी प्यासी आँखों से एक प्यास हमारे जिस्म की बेचैनी नहीं देख सकती। 2. तुम आ सको तो शहर के इस कोने तक आना इस शहर के इस तरफ मैं रहता हूँ गहरी गली में तुम आओगी तो थोड़ा बाहर निकल कर आऊँगा। 3. हमारी आदत छूट गयी जादू देखने की मदारी और बंदर दोनों बैठते हैं साथ साथ मुझे तुम्हारी आँखों में अब कुछ नहीं दिखाई देता। 4. शहर भीगा है तो...

इस बीते साल में सारे रिश्ते निभाने थे

कविताएँ :: अशोक कुमार आठवां रंग अभी-अभी एक तितली उड़ी है वह दूर दिख रहे उस इंद्रधनुष में- आठवां रंग भरना चाहती है. उसकी इस मासूम चाहना में शामिल हो गया है सूरज बादलों ने और भी बारीक कर दिये हैं पानी के वे नन्हे प्रिज्म. हवाओं ने हौले उसके पंख सहलाकर उसको नई उड़ान दे दी है और नन्हे बच्चे तालियां बजाकर बढ़ा रहे हैं उसका हौसला. तूफान दूर खड़ा मुस्कुरा रहा है नदियां शांत हो गयीं हैं इस दृश्य में शामिल हो...

Where did we fail

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Poems :: Alok Dhanwa Translation : Anchit Alok Dhanwa is one of the major living poets. Known for his unique style of writing and reciting poetry, Alok Dhanwa has majorly impacted the younger Hindi poets who have tirelessly tried to copy him and have failed miserably. “Duniya Roz Banti hai” (“The World is Created Every day”) is his only collection of poetry that he has published to...

तुमसे दूर जाकर भी कितना दूर जा सकूँगा

कविताएँ :: सुमित झा तुम्हारे शहर में   1. लौट कर आने के बाद चीजें वैसी नहीं मिलती पटना घूमते हुए पाया कि यहाँ की भागती दौड़ती सड़कों पर लोगों की भीड़ में मैं अब अकेला हूँ. मेरी हथेलियाँ ढूंढती हैं तुम्हारी हथेलियाँ गाँधी मैदान के पास सीसीडी में बैठे हुए पाया कि मेरे टेबल की एक कुर्सी खाली है. कभी बोरिंग रोड में घंटों तुम्हारे कोचिंग के बाहर खड़ा होता था आज यहाँ घंटों खड़े होने के बाद याद आया कि...

मरा हुआ विद्रोही मसीहाओं से और ऊँचा हुआ जाता है

कविताएँ :: देवेश पथ सारिया विद्रोही तगड़ा कवि था (रमाशंकर यादव विद्रोही के लिए) ओ आदिवासी, मेरे वनवासी ओ नर-वानर जेएनयू के बीहड़ में घूमते पेड़ों के नीचे सोते खांसते, बलगम थूकते थकती रही देह तुम्हारी तुम्हारे दम तोड़ने के बाद घुलमिल गए निस्सीम के साथ तुम्हारी कमीज़ की जेब में बैठे दोनों बाघ बीड़ी के धुएं का छल्ला बनाते हुए तुम्हारे प्रस्थान के बाद गुजरे वर्षों में बुलंद हुई है औरतों की आवाज़ वे...