महमूद दरवेश की कविताएँ :
अनुवाद एवं प्रस्तुति : अंचित

महमूद दरवेश प्रसिद्ध फ़िलिस्तीनी कवि हैं जो जीवनपर्यंत वतनबदर रहे और वतन की याद और चाहत में जीते रहे। फ़िलिस्तीन उनके सपनों और कल्पना में जीता रहा। इज़रायली हिंसा ने जिस तरह से फ़िलिस्तीनी जनता को निरंतर क़ैद और निर्वासन में रखा है, उसका दूसरा कोई उदाहरण सभ्यता के इतिहास में खोजना मुश्किल है। अभी भी इज़रायली ताक़तों द्वारा वहाँ जो सामूहिक हत्याएँ की जा रही हैं और लगातार हिंसा को जायज़ ठहराया जा रहा है, उसकी सामूहिक भर्त्सना की आवश्यकता है और साथ ही उन्हें लगातार अपनी स्मृतियों में बनाये रखने की, जो हिंसा का शिकार हो रहे हैं। जिस तरह, एडोर्नों ने यह कहा था कि औश्वित्ज़ के बाद कविता संभव नहीं, अभी के समय में भी कविता की प्रासंगिकता यही है कि वह इस बर्बरता का सामना करे। सभ्यता को शर्म से अपना चेहरा झुकाए रखना चाहिए।

बिना निर्वासन के मैं कौन हूँ?

नदी किनारे के अजनबी, नदी की तरह पानी मुझे तुम्हारे नाम से बाँधता है।
मेरे निर्वासन से कुछ भी मुझे मेरे ताड़ के पेड़ तक वापस नहीं लाता: न शांति न जंग।
कुछ भी मुझे धर्म सिद्धांतों तक वापस नहीं लाता। एक चीज़ भी नहीं। आते और जाते हुए बार-बार
यूफ्रेट्स से नील के किनारों तक कुछ नहीं चमकता। फ़ैरो की नावों से उतरने को मुझे कुछ भी तैयार नहीं करता।
मुझे किसी ने नहीं उठाया हुआ है और मैंने नहीं उठाया हुआ है एक भी विचार: न बिछोह न कोई वादा।
मैं क्या करूँगा निर्वासन के बिना
और एक लंबी रात के बिना जो पानी देखती है?

पानी मुझे
तुम्हारे नाम से
बाँधता है
मेरे सपनों की तितलियों से कोई मुझे मेरी वास्तविकता तक नहीं लाता: न धूल न आग।
मैं समरकंद के गुलाबों के बिना क्या करूँगा? मैं ऐसे थियेटरों में क्या करूँगा जो गायकों को
अपने उल्का पत्थरों से मारते हैं? हमारा वजन दूर बहती हवाओं में तैर रहे हमारे घरों सा हल्का हो गया है।
हम दोनों बादलों में रह रहे अनोखे जीवों के दो दोस्त बन गये हैं
अब अलग हो चुके अपनी पहचान की ज़मीन के गुरुत्वाकर्षण से। हम क्या करेंगे?
हम क्या करेंगे निर्वासन के बिना
और एक लंबी रात के बिना जो पानी देखती है?

पानी मुझे
तुम्हारे नाम से
बाँधता है
मेरा कुछ नहीं बचा तुम्हारे सिवा और तुम्हारा कुछ नहीं बचा मेरे सिवा,
एक अजनबी जो अपने अजनबी की जाँघ सहला रहा है:
ओ अजनबी! हम उस नीरवता का क्या करेंगे जो हमारे बीच बची है और एक झपकी जो है दो मिथकों के बीच?
और हमें किसी ने नहीं उठाया हुआ है: न सड़क ने और न घर ने।
क्या सड़क हमेशा ऐसी ही थी, शुरुआत से,
या हमारे सपनों ने पहाड़ी पर मंगोल घोड़ों के पास एक घोड़ा देखा और हमें उनसे बदल लिया?

और हम क्या करेंगे?
हम क्या करेंगे निर्वासन के बिना?

अपने वतन के नाम

अपने वतन के नाम
जो ख़ुदा के शब्द के नज़दीक है कहीं
बादलों की एक छत

अपने वतन के नाम
जो संज्ञाओं के विशेषणों से दूर है कहीं
अनुपस्थियों का नक़्शा

अपने वतन के नाम
जो तिल के बीज की तरह छोटा है
एक स्वर्ग सरीखा क्षितिज और एक छिपी हुई खाई

अपने वतन के नाम
जो रोयेंदार मुर्ग़ पक्षी के पंखों की तरह गरीब है,
खुदाई की किताबों और एक पहचान से बना घाव

अपने वतन के नाम
जो क्षत विक्षत पहाड़ियों से घिरा हुआ है
जिस पर एक नया इतिहास हमला करता रहता है

अपने वतन के नाम
जो जंग का इनाम है,
चाहतों से और जलने से मरने की आज़ादी लिए

और हमारा वतन, अपनी खूनी रात में
एक गहना है जो दूर दूर तक अपनी चमक बिखेरता
वह सब रौशन करता है जो उसके बाहर है

जहाँ तक हम अंदर के लोगों की बात है,
हम और घुटते हैं।

जेरुसलम

जेरुसलम में और मेरा मतलब है उसकी प्राचीन दीवारों के बीच
मैं एक शताब्दी से दूसरी शताब्दी तक बिना किसी याद के सहारे घूमता हूँ।
वहाँ मसीहे धर्म का इतिहास बाँट रहे हैं, जन्नत की ओर जाते और फिर लौटते,
थोड़े कम हताश और निराशा से भरे क्योंकि प्रेम और शांति दोनों पवित्र हैं
और शहर में आने वाले हैं।

मैं एक ढलान पर चल रहा था और ख़ुद में सोच रहा था:
क़िस्सागो कैसे इस बात पर असहमत हैं कि रौशनी ने एक पत्थर के बारे में क्या कहा?
क्या एक धीमे सुलग रहे पत्थर से ही जंगें शुरू होती हैं?

मैं नींद में चलता हूँ। मैं नींद में देखता हूँ। मेरे पीछे कोई नहीं है। मेरे आगे कोई नहीं है।
ये सारी रौशनी मेरे लिये है। मैं चलता हूँ। मैं हल्का हो गया हूँ। मैं उड़ता हूँ और किसी और में बदल जाता हूँ। परिवर्तित।
ईसा के दूत के शब्द घास की तरह मेरी ज़बान से उगते हैं: “अगर तुम भरोसा नहीं करोगे तो तुम सुरक्षित नहीं रहोगे”।
मैं ऐसे चलता हूँ जैसे कोई दूसरा हूँ। मेरा घाव बाइबिल में आने वाला एक सफ़ेद गुलाब है।
और मेरे हाथ सलीब पर दो कबूतरों की तरह हैं, हवा में और धरती उठाये।

मैं चलता नहीं, उड़ता हूँ, किसी और में बदल जाता हूँ। परिवर्तित। कोई जगह नहीं, कोई समय नहीं। तो कौन हूँ मैं?
मैं, मैं, नहीं हूँ स्वर्गीय उठान की उपस्थिति में। लेकिन मैं ख़ुद में सोचता हूँ: अकेले पैग़म्बर मोहम्मद, शास्त्रीय अरबी बोलते थे।
“और फिर क्या?” फिर क्या? एक महिला सैनिक चिल्लाई:
क्या यह फिर से तुम हो? मैंने तो तुम्हें मार दिया था ना?
मैंने कहा: तुमने मुझे मार दिया था और मैं भूल गया तुम्हारी तरह,
मरना।

 

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अंचित कवि-अनुवादक हैं। उनसे anchitthepoet@gmail.com  पर बात हो सकती है। महमूद दरवेश की अन्य कविताओं के लिए यहाँ देखें : वायलिनें