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स्वदेश से निर्मल पाठक की घर वापसी तक

आलेख :: बड़े प्रश्न १ : अंचित जंब्रा की एक मज़ेदार किताब दोबारा पढ़ रहा इन दिनों। और बेकन को याद करते हुए यह कह दूँ कि धीमे-धीमे चुभलाते हुए। कभी-कभी दो दिनों तक भी उस किताब तक नहीं लौट पाता। ऐसे में किसी ने कहा कि मुझे ‘निर्मल पाठक की घर वापसी’ देख लेनी चाहिए और इस ताकीद के साथ कि पाँच एपिसोड हैं और यह कि पसंद आएगी। निर्मल का नाम निर्मल इसीलिए है कि उसके पिता जी को निर्मल वर्मा की...

ये सभी एकाकार हैं इस धात्विक परिधि में

संस्मरण :: कवि रमाकान्त रथ से मिलना : सतीश नूतन ‌हम श्रद्धा से जब कोई कार्य ठान लेते हैं तो प्रतिफल निश्चित ही अच्छा होता है। उड़ीसा जाना-आना लगा रहता है और साहित्यजीवी होने के कारण स्वतः ही एक नाता बनता जाता है। मैं उड़ीसा के कई साहित्यकारों को जानता तो था पर मिला नहीं था। एक-एक कर सभी विद्वान सहित्यजीवियों से शब्द-संगति की इच्छा बलवती हुई। इसी क्रम में उड़ीसा के कई मित्रो से पूछा- यार, तेरे पास...

पितृसत्ता का विपरीत मातृसत्ता नहीं बंधुत्व है

न से नारी :: उद्धरण : जर्मेन ग्रियर अनुवाद एवं प्रस्तुति :  प्रकृति पार्थ जर्मेन ग्रियर (जन्म 1939) का जन्म ऑस्ट्रेलिया में हुआ था और अब वे इंग्लैंड में रहती हैं. उनकी पुस्तक ‘द फीमेल यूनक‘ (1970) के प्रकाशन ने उन्हें एक लेखिका के रूप में और महिलाओं की मुक्ति और लैंगिकता पर एक आधिकारिक टिप्पणीकार के रूप में स्थापित किया. किताब के शीर्षक के अनुसार महिलाओं की लैंगिकता में निष्क्रियता...

रिफ़्रेंस फ़्रेम : २०२२

सम्पादकीय : अंचित समय के गुज़रने, कुछ बीत जाने और कुछ नया आने, इतिहास की गति और यह कि कोई यात्रा चल रही है, कि हम कहीं जा रहे हैं— मानव विकास की यात्रा में यह भी कोई स्टेज है, इस क्षण की ओर उम्मीद से देखते हुए, इसको बीत गए और आने वाले से अलग रखते हुए भी व्यापक निराशा से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता— ठीक वैसे ही जैसे उम्मीद और उदासीनता में अंतर किए बिना लक्ष्य, असल बदलाव का होना चाहिए. दृश्य का बदलना—...

हमारी देह हमारे समाज की प्रतिछाया है

डायरी :: तोषी पांडेय आज से ४ साल पहले मेरे थेरिपिस्ट ने यह घोषित कर दिया था की मुझे पी टी एस डी है. यानि पोस्टट्रामेटिक डिसऑर्डर. आज से चार साल पहले ये जानना और अब उसको पलट के देखना बहुत अलग तरह का एहसास है. मैं पिछले एक साल से ऑलमोस्ट बिस्तर में हूँ, नहीं कुछ जान लेवा नहीं है पर कई बार आपका अपना दिमाग आपको कई मृत्यु दे चुका होता है. शरीर से जीतना शायद थोड़ा आसान है पर दिमाग से लड़ना उस अदृश्य...

मेरी नीरवता के बीच घुसता चला आता है समुद्र

कविताएँ :: पाब्लो नेरूदा अनुवाद एवं लेख : रामकृष्ण पाण्डेय नेरूदा का अनुवाद अनुवाद कर्म को कुछ लोग हेय दृष्टि से देखते हैं. और कुछ लोग प्रशंसा के भाव से. मुझे लगता है कि अनुवाद करना एक सामाजिक कृत्य है. ठीक उसी तरह जैसे कविता-कहानी लिखना. जैसे असामाजिक आदमी रचनाकार नहीं हो सकता, वैसे ही जो लोग अनुवाद को हेय दृष्टि से देखते हैं, उनमें मुझे सामाजिकता का अभाव नज़र आता है. अनुवाद को लेकर एक और समस्या...

घाव, उम्मीद और प्रकृति प्रेम की कविताएँ

समीक्षा :: दिव्या श्री देवेश पथ सारिया युवा कवि, कथेतर गद्य लेखक होने के साथ विश्व कविताओं के अनुवाद में भी सक्रिय हैं। फिलवक्त वे ताइवान में कार्यरत हैं। देवेश पथ सारिया द्वारा अनुवादित ताइवान के वरिष्ठ कवि ली मिन-युंग का काव्य संग्रह ‘हक़ीक़त के बीच दरार’ हाल ही में प्रकाशित हुआ है। ली मिन-युंग की कविताओं में जो ख़ास बात है वह है उनकी पाठक को बांध लेने की क्षमता। विषयवस्तु तो अपनी‌‌...

अंत का दृश्य और अदृश्य-2

लेख :: अंत का दृश्य और अदृश्य : अंचित नींद के तंग आकाशों की जमी हुई गर्द से भारी हो उठी है यह छाती. नमक-जैसे मैले संगमरमर का बादल मेरी आँखों में कब तक गड़ता-घुलता जाएगा? — शमशेर  …दृश्य में क्या है?  अपने आसपास क्या है, कैसे है और इन संदर्भों में किन निष्कर्षों तक पहुँचा जा सकता है, इसकी विवेचना, उस लघु की विवेचना है जो वृहत की तरफ़ इंगित कर सकती है. कला और संस्कृति से जुड़े, उनके मानकीकरण से...

अंत का दृश्य और अदृश्य

लेख :: अंत का दृश्य और अदृश्य : अंचित सब जानते हैं पासों का पलटना तय है सब जानते हैं और फिर भाग्य पर दांव लगाते हैं सब जानते हैं युद्ध ख़त्म हो गया सब जानते हैं अच्छे लोग हार गए हैं सब जानते हैं पहले से तय थी जीत और हार गरीब गरीब रहेंगे, अमीर और अमीर ऐसे ही चलती है दुनिया सब जानते हैं. — लेनर्ड कोहेन थोड़ा ज़हर कभी-कभी : इससे सपने हसीन हो जाते हैं. अंत में खूब सारा ज़हर. एक ख़ुशनुमा मौत — ज़िज़ेक...

फिसलना हमारे समय का महत्तम समापवर्तक है

पाठ :: प्रभात प्रणीत हमारे दर्शन, यथार्थ और स्वप्न स्वाभाविक तौर पर हमें, हमारी मनःस्थिति को अपने बस में रखते हैं, हम इनसे उलझते हैं, प्रेरित होते हैं, संघर्ष करते हैं. एक हद तक हमारा संपूर्ण अस्तित्व इस प्रक्रिया की ही परिणति है. दुर्भाग्य यह है कि हम इसके प्रति ईमानदार नहीं रह पाते और खुद को खुद से ही छुपाते रहते हैं, बचने और बचाने की कोशिश करते रहते हैं. लेकिन कवि इस किताब में अपनी चेतना और...