समीक्षा ::
मधुरिमा

हिज़्र की शब तो कट ही जायेगी
रोज़े-वस्ले-सनम की बात करो
जान जायेंगे जानने वाले
फ़ैज़ फ़रहादो-जम की बात करो

किसी चेहरे की एक मुस्कान खुशी दे जाती है। उसी तरह से पसंद का ख्याल घर में कोई रखता है तो, आत्मिक खुशी मिलती है। लंबे समय से बीमार चल रही हूँ। बीमार होने का यह एक फायदा है कि अपनी पसंद का एक काम आप मन से लेटे-लेटे ही कर सकते हैं। एक तो किताबें पढ़ना और दूसरा ध्यान। ढेरों किताबें मेरे बिछावन के पास रखी गयी थी। सेतु से प्रकाशित ख़दीजा मस्तूर के  उपन्यास ‘आंगन’ पर नज़र पड़ी। मैंने किताब छुई, पन्ना पलटते ही फ़ैज़ की पंक्तियाँ सामने थीं—

आइए हाथ उठाएँ हम भी
हम जिन्हें रस्म-ए-दुआ याद नहीं
हम जिन्हें सोज़-ए-मोहब्बत के सिवा
कोई बुत कोई ख़ुदा याद नहीं

मैंने भी हाथ उठाया और ‘आंगन’ पढ़ने लगी। तीन दिनों में पूरा पढ गई। इसे पढ़ते हुए मैंने जो महसूस किया उसे अपने पसंदीदा शायर फ़ैज़ के शब्दों में ही कहना चाहूंगी—

छनती हुयी नज़रों से जज़बात की दुनियाएं
बेख्वाबीयां, अफ़साने, महताब, तमन्नाएं
कुछ उलझी हुयी बातें, कुछ बहके हुए नग़मे
कुछ अश्क जो आंखों से बे-वजह छलक जायें

यह उपन्यास 1940 के दशक के हिन्दुस्तान की आज़ादी की पृष्ठभूमि और विभाजन के विध्वंस का एक अलग स्वरूप पेश करता है। यह उपन्यास उस वक्त देश के भीतर चल रही राजनीति के विभिन्न धुरों, मतों और आम जनता की मानसिकता को उकेरता है। किताब आज़ादी से पूर्व के एक दशक के राजनीतिक घमासान पर एक पैनी दृष्टि डालती है। उस समय के कुछ अनछुए पहलुओं, अनकहे बलिदानों को भी रेखांकित करती है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए मुझे ऐसा लगा कि हिन्दुस्तानी समाज की कुछ तस्वीरें दोनों ही क़ौमों में अभी भी जस की तस पड़ी हुई हैं। अधिकांश आधी आबादी का दायरा उसके आंगन तक समेटे रहने का यथार्थ अब भी बरकरार है।

प्यार और आज़ादी के लिए बुलंदी से उठी आवाज़ को हर तरह की सत्ता दबा देती है। चाहे वह पितृसत्ता हो या फिर राजसत्ता। हुकूमत और हुक्मरान आमतौर पर नृशंस हो ही जाते हैं। यह एक आंगन की दास्तान नहीं। एक छोटी सी बच्ची की आंखों से गुजरते हुए जंजीरों में जकड़े हिन्दुस्तान के अंदर से बाहर तक का अफ़साना है। आलिया, एक छोटी सी बच्ची, जो अपने घर के आंगन में बंद है। वह खुली हवा में सांस लेना चाहती है। आंगन की दहलीज के उस पार की जिंदगी से रूबरू होना चाहती है। घर में रोज-रोज होने वाले छोटे-मोटे झगड़ों में इंसानियत की सिफ़त तलाश करती है। पितृसत्ता के दो अलग-अलग चेहरों में गुम होते बचपन के बीच वह खुद को शिक्षित करने की चाहत रखती है। हालात के साथ चलते हुए आलिया बौद्धिक, विचारवान और एक मजबूत दिमाग वाली इंसान बनती है। आलिया के चरित्र की दृढता फ़कत उस वक्त की ही नहीं, बल्कि आज, कल और आने वाले समय के लिए भी बतौर मिसाल देखी जा सकती है।

उसकी मां और दादी के चरित्र में महिलाओं द्वारा अनजाने में पितृसत्ता को बढ़ावा दिये जाने और इसे पनपने दिया गया है। यह उपन्यास उस समय में महिलाओं की क्लस्ट्रोफोबिक स्थिति को भी दर्शाता है। घर की महिलाएँ गपशप में व्यस्त हैं और अतीत की घटनाओं पर झगड़ा कर रही हैं। स्थिति तब और खराब हो जाती है, जब आलिया की बहन घुटन भरे हालात में नाकाम मोहब्बत की वज़ह से आत्महत्या कर लेती है। फिर कुछ ही समय बाद उसके पिता को अंग्रेज़ अफसर की तौहीनी में गिरफ्तार कर लिया जाता है। इस परिस्थिति में आलिया और उसकी मां को उसके बड़े चाचा घर ले जाते हैं। वहाँ भी स्थिति बहुत सही नहीं है। पुरुष, देश की राजनीतिक घटनाओं में व्यस्त हैं। घर में आर्थिक तंगी है। सभी किसी भी सूरत अपनी ख्वाहिशों को पूरा करना चाहते हैं। महिलाएं घर से बाहर निकलने का ख्वाब बुनती हैं।

आलिया खुद को अपनी किताबों और पढ़ाई में व्यस्त रखती है और एक दिन आज़ाद जिंदगी के सपने देखती है। उसे यह बात भी खटकती है कि स्त्री पुरुषों के प्रेम में अपने मौलिक विचारों को दबा क्यों देती है? क्यों किसी के प्रेम में पागल होकर जान देती है, जबकि पुरुष तो ऐसा नहीं करते। उन्हें किसी स्त्री की मनोदशा या भावना से ऐसा जुड़ाव तो नहीं होता? ऐसे कई प्रश्नों को इस उपन्यास में रेखांकित किया गया है। इस उपन्यास का स्त्रीवादी स्वर अपने समय से बहुत आगे है। यह किताब एक बेहतरीन क्लासिक है। इसमें आंगन को केंद्र में रखकर महिलाओं की परिस्थिति को चित्रित किया गया है। पुराने जमाने में आंगन ही ऐसी जगह थी, जहां महिलाएं साँस लेती थीं और एक साथ इकट्ठा होती थीं।

अपनी कहन में अनोखा अंदाज लिए वाकई यह किताब अलहदा है। यह अंग्रेजी शासन से आजादी के 12-13 साल पहले की समय की कहानी है, जो इस उपन्यास की रवानी है। एक बात जो इसे महत्वपूर्ण बनाती है, वह यह है कि यह उन स्वतंत्रता सेनानियों या राजनेताओं के बारे में नहीं बात करती है, जिन्होंने आजादी के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। यह उन लोगों की कहानी बयां करती है, जो आज़ादी की दौड़ शुरू होने से बहुत पहले ही बलिदान दे रहे थे। जिन्हें यह भी न मालूम था कि कभी आजादी हासिल होगी भी या नहीं। यह उन पुरुषों के परिवारों, उनके बच्चों, उनकी पत्नियों, उन घरों के बारे में है, जो नजर में नहीं हैं। इनका बलिदान मौन था।

ये लोग वास्तव में इस बात की परवाह नहीं कर सकते थे कि देश आज़ाद हुआ या नहीं। इनकी जिंदगी घर की चारदीवारी में कैद थी। इन्हें उनकी शानदार जीवनशैली से हटाकर उन पैसों पर गुजारा करने के लिए मजबूर किया गया, जिनका इस्तेमाल घरेलू नौकर भी नहीं करते थे। जबकि उन लोगों ने अधिक “महत्वपूर्ण” उद्देश्य के लिए अपना सब कुछ दे दिया। उनके बच्चे जो पिता की देखरेख के बिना बड़े हुए, क्योंकि उनके पिता मातृभूमि की रक्षा कर रहे थे। महिलाओं के दिन-रात उनके पतियों के बारे में चिंता करते हुए बीते। और इस चिंता में भी कि अगले महीने के राशन, बच्चों की पढ़ाई आदि के लिए पैसे कहाँ से आयेंगे? उनके पति और उनकी तरह के अन्य कई स्वतंत्रता सेनानियों को ब्रिटिश सरकार द्वारा विशेष रूप से कांग्रेसियों को लगातार जेल में डाला जा रहा था।

ये उपन्यास उस दौर के अभिजात वर्ग के महिलाओं की दुनिया की दुःखों की कहानी है। वो अभिजात वर्ग, जिसने हमेशा स्त्रियों के दुःखों को बढ़ाया। उनकी संकीर्ण सोच और प्रथाओं में डूब मरने की नौबत में कुसुम के आंचल से आंसू की बूंदें टपकतीं हैं। नौकर से मोहब्बत में सलमा की रुसवाई और अंततः मौत! फिर भी संवेदनहीन और पाखण्डी दिलों में दु:ख तो दूर की बात खेद भी नहीं ! यह सिर्फ पीड़ितों की कहानी नहीं है बल्कि उन लोगों की भी कहानी है, जिनकी सांस्कृतिक वर्जनाओं ने कितनों को  शिकार बनाया।

फ़सुरदा रुख़, लबों पर इक नयाज़-आमेज़ ख़ामोशी
तबस्सुम मुज़महल था, मरमरी हाथों में लरज़िश थी
वो कैसी बेकसी थी तेरी पुर तमकीं निगाहों में
वो क्या दुख था तिरी सहमी हुयी ख़ामोश आहों में। 

यह एक ऐसी पीढ़ी थी, जो ब्रिटिश राज से आजादी चाहती थी लेकिन विभाजन नहीं। राजनीतिक दांव-पेंच से मुस्लिम लीग आजादी के बाद एक अलग मुस्लिम राज्य उर्फ ​​पाकिस्तान चाहती थी। कांग्रेसी ब्रिटिश हुकूमत से आजाद होना चाहते थे। गौरतलब है कि मुस्लिम परिवार में एक ही परिवार के अलग-अलग सदस्यों में दोनों पक्षों के विचार मौजूद थे। दोनों क़ौम में मुहब्बत के लिए यह बात एक अच्छी संभावना थी। लेकिन दो अलग विचारधाराओं के बीच देश जनता फंसी हुई थी, या उसे बरगलाया जा रहा था।

उपन्यास के आखिरी दो पन्ने में क्लाइमेक्स की ऊंचाई के साथ-साथ तीन चरित्रों और तीन विचारधाराओं की प्रतिक्रिया देखी जा सकती है। आलिया की अम्मी जो शुरू से दौलत, शोहरत, रसूख और अपनी आन-बान-शान में रहनेवाली एक आर्थोडॉक्स महिला थीं। उन्हें बेटी की ज़िंदगी से अधिक अज़ीज़ अपनी शानो-शौकत थी। सफ़दर जिसे उन्होंने आजीवन नफरत के सिवा कुछ न दिया। ज़हालत और गरीबी के सिवा उसे कुछ न मिला, कम्युनिस्ट होने के नाते उसकी ज़िन्दगी जेल में कटी। आज़ादी के बाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ही धाराओं को कुछ न कुछ आसरा मिला। पर कम्युनिस्ट विचारधारा की किस्मत अभी भी शायद सलाखों के पीछे ही थी। आलिया को सफ़दर के साथ हुई नाइंसाफी और बचपन की सहानुभूति के साथ-साथ उसका कम्युनिस्ट रूप पसंद था। शायद इसी वज़ह से उसे सफ़दर में अपने प्रेम की परिणति दिखी, और अम्मी से विद्रोह करके भी वह सफ़दर के साथ शादी करना चाहती थी। लेकिन अम्मी के विरोध के बाद आखिर में सफ़दर ने दौलत कमाकर बड़ा आदमी बनने की बात की, इस बात से आलिया अचंभित हुई। उसे सफ़दर से अजनबियत महसूस हुई। अगले ही पल उसने सफ़दर से शादी न करने का फैसला लिया। मोहब्बत में सिर्फ़ दो इंसानों का साथ होना नहीं, उनकी इंसानियत, उसूल, इज्ज़त और समान विचारधारा भी ज़िंदगी जीने की वज़ह होनी चाहिए।

आलिया बियाबान में चलते-चलते थक गई। मानो चारों ओर तपती मरूभूमि में बूंद-बूंद पानी के लिए उसका गला सूखने लगा हो। जैसे हरेक सिर्फ और सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए जिंदा थे। ऐसे में फिर कौन सी कौम और कौन सा वतन बचा रहेगा। किसी लालसा में देशहित की बात करेंगे तो विभाजन होते ही रहेंगे। उकसाने वाले मासूमों को रौंदकर खिलखिलाते रहेंगे। घर-आँगन के बंधनों से असहमत आलिया की सहानुभूति विभाजन की रौद्र राजनीतिकता के खिलाफ स्मृतियों को सहेजने में दिखती है। अपने पूरे परिवार और आलिया के न चाहते हुए भी वह अपने भाई के साथ पाकिस्तान चली आईं। वहाँ उनके भाई ने जो बंगला दिलवाया था, वह किसी हिन्दू का लुटा हुआ घर था। लूट-मार की तमाम निशानियां उस घर में भी आज़ादी का जश्न मना रहीं थीं। उस घर में कृष्ण की एक खंडित मूर्ति को जब  आलिया की अम्मी ने हटाने के लिए बाध्य किया तो , उसने उसे चुपचाप उठाकर अपने बक्से में छुपा लिया था। बचपन में कुसुम से संगीत सीखते वक्त ‘कौन गली गयो मोरे श्याम’ की धुन उसके कानों में गूंज रही थी।

प्यार की कोमल भावनाओं को दफन कर देना आसान नहीं होता। अपने उसूलों पर चलना भी आसान नहीं होता। खो जाता है बहुत कुछ या फिर सब कुछ। आलिया के आंतरिक द्वंद्व को परिपक्वता के साथ लिखा गया है। उपन्यास समाप्त होने तक आलिया के प्रति पाठक की सहानुभूति बनी रहती है।


मधुरिमा कवि-कथाकार हैं। हिंदी और मैथिली में परस्पर लिखती रहीं हैं। पहला कविता संग्रह “धरती ही सहती है” वातायन प्रेस से प्रकाशित हुई। किलकारी बिहार बाल भवन में विगत 15 वर्षों से रचनात्मक लेखन एवं प्रकाशन से संबंधित  कार्य कर रही हैं। गत वर्ष इनकी अंडमान पर लिखी हुई चुनिंदा कविताएँ  साहित्य अकादमी संग्रह में प्रकाशित हुई हैं। उनसे madhurimamishra71@gmail.com पर बात हो सकती है।

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