लेख ::
ईशा झा
खिड़कियाँ मुझे आकर्षित करती हैं। एक धुंध भरी शाम की खिड़की और गर्म हवाओं को रास्ता देती खिड़की कैसे एक होते हुए भी अलग लगती है।
हमारे जीवन में कितना कुछ होता है जो चाह-अनचाहे हमें आकर्षित करता है। हर वक्त का आकर्षण अलग होता है और हर बार देखने पर वही खिड़की कुछ बदली हुई लगती है। बाहर की दुनिया को खिड़की से देखना जैसे अपने दायरे को सुरक्षित रखते हुए बाहर की दुनिया से संलग्नता बनाने का प्रयास हो। बाहर निकलना भी तो पूरी तरह से नहीं, अपने निजत्व को बनाए रखकर और बाहरी परिवेश को भी अपनी इच्छानुसार अपनी दुनिया में दख़ल देने का अवसर देना।
‘द वर्ल्ड इज़ टू मच विद अस’ वाली बात अपनी भयानक प्रासंगिकता का एहसास कराती है और सोचने पर मजबूर करती है कि व्यक्ति का निज क्या है?
अपनी बात कहने की हिमाकत करने वालों को भी कहाँ बख्शा जाता। कभी अज्ञेय जैसे कवि को आत्मवादी कहा जाता है तो कभी छायावादी कवियों पर अपना राग अलापने का आरोप लगाया जाता है, उन्हें संसार से पृथक् अपनी ही दुनिया में मग्न सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है।
कहा जाता है कि हमारी उपलब्धियों में हमारे परिवेश का योगदान हमारी अपनी योग्यताओं से बहुत अधिक होता है। हमारे निर्णय, महत्वाकांक्षाएँ भी समाज अथवा परिवेश द्वारा रूपायित होती हैं। हम वही होना चाहते हैं या होने का स्वप्न देखने लगते हैं, जो समाज चाहता है। विश्वविद्यालयों में तथा ‘उत्कृष्ट’ संस्थानों में हर वर्ष प्रवेश पाने के लिए होड़ लग जाती है। विद्यार्थी अमुक विश्वविद्यालय में जाना चाहते हैं, क्योंकि लाखों–करोड़ों लोग वहाँ जाना चाहते हैं।
गिनी–चुनी सीटें होने के कारण, स्वाभाविक रूप से एक बड़ी आबादी के हाथ निराशा ही लगती है। लेकिन यह स्थिति इतनी भी स्वाभाविक नहीं है।
अपने जीवन की सार्थकता किसी संस्थान में न चुने जाने से तो नहीं निर्धारित की जा सकती है। यह कहना भी शायद उस स्थिति की अपेक्षा आसान है, जब स्वयं इस कड़वी सच्चाई का दंश सहन करना पड़ता है। अपने स्क्रीन अथवा अन्य किसी भी माध्यम से जब यह सूचना मिलती है कि नामांकन नहीं हुआ, तो पैरों तले ज़मीन खिसकने का अर्थ समझ में आता है। अपने माता–पिता की ओर देखकर जिस अपराधबोध का आभास होता है, वह भीतर से तोड़ देता है। इस पर अपना दुःख प्रकट करने में भी संकोच होता है कि कहीं कोई यह न कह दे कि इतना ही दुःख हो रहा है तो अधिक परिश्रम करना चाहिए था।
जिस परीक्षा अथवा संस्थान में जाना पता नहीं वास्तव में मेरी अपनी इच्छा की प्रतिध्वनि थी भी या नहीं, वहाँ न जा पाने की असफलता का भार तो मुझे ही उठाना है।
वहाँ पहुँचकर भी क्या हम संतुष्ट हो जाते हैं? क्या हमें लगता है कि हमारा प्राप्य हमें मिल गया है? कई बार वास्तविकता हमें सहमा देती है। अपनी मनचाही जगह पहुँचकर जब वहाँ की सच्चाई हमारे सामने आती है, तो निराशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता।
मनुष्य जो होना चाहता है, वह होने से उसे क्या रोकता है? समाज, परिवार या शायद उसकी अपनी सीमाएँ। वह न हो पाना उसे घुन लगी लकड़ी की तरह कमज़ोर बना देता है — जर्जर और अर्थहीन। उसका सब कुछ छिन गया हो मानो, उसकी इच्छाएँ, कामनाएँ, उसका निजी सब समाज के आगे दयनीय अवस्था में खड़ा मिलता है।
यहाँ तक कि उसकी भावनाओं पर भी उसका नियंत्रण स्वीकार्य नहीं है। वह कब हँसेगा, कब रोएगा, यह भी उसे बताया जाता है। किससे प्रेम करेगा और कब, किसको घृणा की दृष्टि से देखना है और किसे उपेक्षा की, यह भी तय है।
समाज के खाँचे से भिन्न होना अपराध के दायरे में आता है। अपनी मनचाही अभिव्यक्ति को भी उतना ही स्थान देना है, जितने में समाज पर संकट की स्थिति न बने। अपने अलग होने को, चाहे शारीरिक रूप से अथवा वैचारिक, छुपाकर रखने को बाध्य किया जाता है क्योंकि समाज इसे स्वयं पर आसन्न संकट के रूप में देखता है। मुख्यधारा से हटकर होने वाले किसी भी विचार पर कब प्रतिबंध का ताला लटका दिया जाए, यह कहना असंभव है।
अपने होने को सबके साथ लेकर चलने की मजबूरी है, सबमें घुलना है ताकि अलग से आप उनके बीच उभरें नहीं। कसीदाकारी करते हुए यदि कोई धागा भिन्न रंग का हो जाए, तो आपके सौंदर्यबोध को आघात तो पहुँचेगा ही।
लौट आती हूँ खिड़की पर। अपने निज को बचाने की छटपटाहट कभी–कभी ले आती है इसके सामने, कि शायद कल्पना में ही सही अपने दायरे को बचाया जा सके।
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ईशा झा (जन्म: 2004) का ‘इंद्रधनुष’ पर यह पहला प्रकाशन है। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य (स्नातकोत्तर) की छात्रा हैं। उनसे ishajha394@gmail.com पर बात हो सकती है।
