लंबी कविता::
सौरभ राय
1.
पहले भुनाया था गोश्त
फिर भात
जलते कोयले पर चढ़ी थी डेगची
और ढक्कन के ऊपर जलता कोयला
और चारों तरफ कोयला
बाहर से बिलकुल काला
और अंदर की सतह पर
सिरजती लाल गंध
धीरे धीरे…
दालचीनी थूरकर पसीना पोंछता था मोमिन
सुबह प्याज काटने की झुँस से
रात कढ़ाई मांझने की खुरच तक
मोमिन के दिन में लेकिन
आम्बुर नहीं आता था।
2.
गूगल मैप पर सर्च मारा तो
आम्बूर
बेंगलूर के प्लेट पर बचा
भात दिखता है।
बढ़िया रूपक परोसा जा रहा है—
मैं सोच ही रहा था
लेकिन डिलीवरी वाले ने हेलमेट नहीं उतारा
डीप–डीप–जलता रहा बाइक का ब्लिंकर
उसके सिगरेट की तरह
वो आर्डर उठाकर चला गया।
3.
क्लास से प्रॉक्सी लगवाकर भाग आईं
लड़कियों को क्या मतलब
आम्बुर फाम्बुर से!
खिला हुआ था उनका मन
जैसे बारिश के बाद का दिन
पटरे पर प्लेट रखे वे खातीं थीं गपचकर
आते जाते लोगों को
गरदन घुमाकर देखती हुईं
धूप के टुकड़े में खड़ी
बाल्टी से छलकाती थीं साम्बर
उनकी नाक की नथ में ठमकता था
आम्बुर।
4.
ऐनक ठीक करता था वीरप्पा
दाँत से बोटियाँ नोचते हुए
शहर का कोना–कोना जानता था
अपने ऑटो के इंजन की तरह
वो जानता था
कहाँ–कहाँ था आम्बुर
कहाँ का आम्बुर अच्छा था
और कहाँ अच्छा नहीं था
आदमी मुकम्मल है, मैंने पूछ लिया—
पेप्सी के बोर्ड अधिक हैं आम्बुर पर
या कोका कोला के?
दाढ़ी से ढुलका भात का दाना
मुँह खुला उसका सोचने के लिये रुका जबड़ा
अब तक रुका हुआ है।
5.
‘आम्बुर तमिलनाड़ का गाँव है
हमारा पुरखन ख़ानसामा था
मुग़लों की रसोई में’—
कहता था मालिक
‘पइले नाटी मुर्ग़ी, बंगाल का चावल
अब बॉयलर, सीरा राइस’
बहुत गरम हो चुका था तेल—
मोमिन ने दोनों हाथों से छलना झटका
काँप उठीं थीं बोटियाँ
काँप उठा था मेरे भीतर कुछ
काँप रहा था मुग़लकाल
तमिलनाड़
बंगाल।
6.
यही आम्बुर है
टेस्ट दाँताँ में फँसा है–
कहता था पोपला भिखारी
सिलिंडर के पास खड़ा
हेगिदिरा! येन समाचारा!
पूरे हक़ से मांगी
कबाब की पहली बोटी
हाथ में मसलकर फाँक ली
और खरीद रहा था पैसे देकर
दूसरी
यही है आम्बुर बिरयानी
बोर्ड की ओर आँख मारकर बोला
लेकिन दामों पर नये कागज़ चिपके देख
वापस ले लिये उसने
अपने शब्द।
7.
टेबुल के ऊपर बैठी थीं
कुर्सियाँ
चल रहा था ठाट से
सिर्फ झाड़ू
ठन ठन–
बजती थी डेगची
जब मोमिन खुरचता था तल
पीजी की दाल से अघाये
आईटी इंजीनियर की भूख में आम्बुर
उसकी मुट्ठी में बंद
टोकन भर था
और अब
जब भात और गोश्त की गंध में
गुँथ चुकी थी गली
और भर चुके थे सारे पेट
इतनी मामूली चीज़ थी आम्बुर
कि फुटपाथ पर बैठे कुत्ते भी
हारे गाढ़े तब उठते थे
जब झाड़ू कोंचती थी
8.
मैं गया हूँ आम्बुर
वहाँ इलाइची है
दाँत में फँसने की चीज़ नहीं
सिर्फ एक गंध बनकर
तृप्ति की
वहाँ गरम है साँस
तेज़ है मिर्च नमक
हम पहले खाते हैं धचककर
फिर बहाते हैं पसीना
या सोते हैं टूटकर
वहाँ बोटियाँ हैं, भात
जिनका स्वाद मन में घुल जाता है
हिचकियाँ हैं
जो नहीं रुकतीं
छककर पानी पीने पर भी
मैं गया हूँ
आम्बुर की तलाश करता
आम्बुर
वहाँ कोई आम्बुर नहीं है
सिर्फ एक आदमी है मेरे जैसा
सड़क पार करता हुआ
जिसे भूख लगी है।
•••
सौरभ राय सुपरिचित कवि-अनुवादक हैं। काल बैसाखी (कविता-संग्रह), सोहो में मार्क्स और अन्य नाटक–हॉवार्ड ज़िन (अनुवाद), ओस की पृथ्वी–तीन जापानी हाइकु कवि (अनुवाद) उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। उन्होंने कर्णकविता (बैंगलोर वासियों की कविताएँ), पेरेनियल (समकालीन हिंदी कविता का अंग्रेजी अनुवाद), तथागत और अन्य नाटक–अभिषेक मजूमदार (वाम प्रकाशन), तीन नाटक– अभिषेक मजुमदार (ब्लूम्सबरी लंदन) का संपादन किया है। उनका नवीनतम कविता-संग्रह ‘हिमाक़त’ वाणी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य है। सौरभ से sourav894@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।
