डायरी ::
आर्यन प्रजापति
२३ मार्च २०२४
यही फगुआ फागुन से शुरू होता और होली के दिन बंद होता था, लेकिन आज परिस्थिति कुछ भिन्न है। होली के दो दिन पहले ही फगुआ गाया जा रहा है और उसमें भी लोग नहीं आए, जितने पहले आते थे। वह उत्साह और खुशी लोगों में मुझे नहीं दिखी।
माना गाँव से शहर जा रहे हैं लोग, लेकिन गाँव में तो शहर नहीं आ रहा है? तो गाँव के लोग क्यों शहरी होते जा रहे हैं? बस दो पंक्ति—
अब गाँव में लोग नहीं रहे
कि लोगों में गाँव खत्म हो गया?
०१ अप्रैल २०२४
मैंने महसूस किया है, गाँव-घर में जो खिलखिलाती हॅंसी रहती है मेरी और जैसा गाँव-घर में रहता हूँ। वैसा गाँव-घर से दूर जाकर नहीं, बल्कि उससे बहुत अलग हो जाता हूँ।
गाँव-घर से दूर होके जब-जब भी हॅंसा हूँ मैं, तो खुद की हॅंसी ही मुझे नकली लगी है। गाँव-घर से दूर जाकर भी कितनी ही भीड़ में होता हूँ, तब भी ज्यादातर अकेलापन ही लगता है। यही गाँव-घर में अकेला हो जाओ, लेकिन आप अकेले हो नहीं पाऍंगे गाँव-घर पर। तब भी वहाँ के खेत-खलिहान, बगिया, गाय-भैंस और चिड़ियों के रहते हुए, आपको कभी भी अकेलापन नहीं लगेगा।
एक बार गांव-घर से निकले, तो निकले ही रहें
अब ठहर कर रुकना शायद नसीब नहीं होगा।
२३ अप्रैल २०२५
कुछ मन नहीं है। पढ़ने और मोबाइल चलाने का तो एकदम मन नहीं है। जब कुछ मन नहीं होता है या मन इधर-उधर भागता है, तो मैं अपनी कलम और कॉपी के पास भागता हूँ और जल्दी-जल्दी कुछ भी लिखने लगता हूँ। मानो क्षणभर में ही जी को तसल्ली हो जाती है। आज क्या किया, मेरे मन में जो चल रहा है कुछ भी लिखता हूँ और मन शांत हो जाता है। जैसे किसी के आगोश में आ गया हूँ और कोई सर पर थपकी दे रहा हो और धीरे-धीरे मन को सुकून मिलने लगता है।
२६ अप्रैल २०२५
सब कुछ याद है—
इतना याद कि विस्मृति की तरफ मोड़ देता है।
२७ जून २०२५
जो सबका सुनता होगा, उसका कौन सुनता होगा? कौन इतना मजबूत होगा जो उसके कहे को सुन लेता होगा। इतने लोगों का सब कुछ लिए और सब कुछ किसी एक को सुनाने के लिए तत्पर। सब कुछ सुन लेने की जिज्ञासा लिए उसे सुनने वाला मिलता होगा? जिस तरह उसने लोगों की कहानी सुनी, दुःख सुने और पता नहीं कितना बिलावजह बात सुने।
२३ नवंबर २०२५
बहुत शहरों से गुज़र कर या कहूँ दिल्ली आने के बाद बहुत शहरों से गुजरा हूँ, लेकिन काशी, काशी गुजरने के लिए नहीं ठहरने के लिए है। जैसे ठाँव पर नाव ठहरती है उसी तरीके से आपका मन काशी में ठहरता है। सब और इस शहर में जो फर्क मुझे दिखता है वह जीवन दर्शन का है। जहाँ की भाषा से लेकर नशे तक में अपना एक अलग छंद है, वह किसी दूसरे से लिया हुआ नहीं है। बल्कि खुद का है। मौलिक है।
केदारनाथ सिंह इस शहर के छंद को जानते हैं। अपनी कविता ‘बनारस’ में लिखते हैं कि
इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजाते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है।
१७ दिसंबर २०२५
सोचता हूँ कि समय से उठना, समय से सोना और अपने लक्ष्य के प्रति काम करते रहना। क्या हम मशीन बनने की ओर नहीं हैं? जब नया दिन आता है तो नया तरीका क्यूँ नहीं। नया ढंग क्यूँ नहीं। क्या हमें ऐसा बनाया गया है या हम बनते चले जा रहे हैं। हमें बनाने में अगर हाथ समाज का है, तो बुरा बनने का क्यूँ नहीं ? क्या हम हमेशा अच्छा क्रेडिट लेना चाहते हैं? बुरा क्रेडिट लेने से क्या दिक्कत होती है? आदमी की फितरत ही ऐसी होती है कि अपने नाम पर कोई दाग़ नहीं चाहता है। भले ही वह कितना बड़ा जुर्म या बुरे काम करते रहे, लेकिन समाज के सामने अच्छे की छाया बनी रहे। कैसा दोगलापन है?
१८ दिसंबर २०२५
आलोचना की परीक्षा है आज। आलोचना सिर्फ छोटा सा शब्द है, लेकिन त्रिलोचन लिखते हैं न, ‘ऐसा कुछ है लोग सहमते हैं’। इन दिनों कविताओं का बुरा हाल है। पता नहीं जो लोग अपने लिखे को या छोटी-छोटी पंक्तियों में करके उसे कविता बोल रहे हैं और छप भी जा रहे हैं…
आत्मसंतुष्टि के लिए लिखना ठीक बात है, कुछ लोग कविता इसीलिए भी लिखते हैं।
२१ दिसंबर २०2५
पिता चाहते हैं अकेले लड़ाई लड़ें। उन्हें पता है दुनिया के बारे में कि आगे कोई साथ नहीं आता है, लेकिन तुम साथ आना लोगों के। उस समय के लिए तैयार करते हैं। माताएँ जो कभी बाहर नहीं निकलीं, वे बच्चों को अकेला नहीं छोड़ना चाहती हैं। कुछ चाहती हैं कि मैं नहीं निकली हूँ, तो बच्चे बाहर निकलें, देश-दुनिया देखें। जो माताएँ बाहर निकलीं और समाज से लड़ना सीखीं, वे माताएँ सोचती हैं कि बच्चे अकेले रहें और अकेले दुनिया का सामना कैसे किया जाता है, सीखें। मैं उन परिवारों से बहुत खुश हूँ जो लड़ना और बचना दोनों सिखाते हैं। सिर्फ लड़ना भी नुकसान और सिर्फ बचते रहना अपने आप को मारना हो जाता है। इसीलिए लड़ना और बचना दोनों सीखना-सिखाना चाहिए…
२४ दिसंबर २०२५
आज होमबाउंड देखी सुबह। एक अलग प्रकार की फिल्म। जिसमें सबकुछ को दिखाने के बाद भी वह अपने कसाव से नहीं हटती है। ‘भीड़’, ‘आर्टिकल 15’ जैसी फिल्मों का कॉम्बो कहूँगा। जाति,धर्म, भ्रष्टाचार, गरीबी, लॉकडाउन, दोस्ती हर चीज को सिर्फ छूकर नहीं निकली है, बल्कि उस पर एक पकड़ थी। जिस तरीके से फिल्म खत्म हुई वो कुछ उम्मीद और दुःख के साथ समाप्त होती है।
विनोद कुमार शुक्ल का देहांत हो गया। कोई दुःख नहीं, बस एक मलाल ज़िंदगी भर रहेगा कि सशरीर मिल नहीं पाया। कितनी बार सोचा था कि जाऊँगा जरूर मिलने, लेकिन किसी लेखक या कवि को बिना पढ़े मिलना वाजिब नहीं लगता है, लेकिन फिर इस निर्णय पर सोचता हूँ कि क्या तुरंत काम कर देना चाहिए। लोग कहते है कि जल्दीबाजी में फैसला नहीं करना चाहिए और कुछ शुभ अशुभ वाले लोग कहते हैं कि शुभ काम में देरी नहीं करना चाहिए। इतने तो निर्णय लेने के कायदे है पर फिर यह धारणा मजबूत होती है कि सुनो सबकी करो अपनी, और दूसरा जो दिल में आए और ठीक लगे उसे जरूर करना चाहिए।
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यह इंद्रधनुष पर आर्यन प्रजापति (जन्म: 2006) की लिखत का प्रथम अवसर है। वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में हिंदी के छात्र हैं। उनसे aryanprajapati.ap71@gmail.com पर बात हो सकती है।

Bahut hi accha bhai ji
प्रिय आर्यन आपकी लेखन शैली अतभुद है
मुझे हिंदी का ज्ञान तो बहुत अच्छा नहीं है ,जितना मैने पढ़ा वो बहुत अच्छा लगा
आपकी लेखनी अद्भुत हो यही प्रकृति से कामना है