कविताएँ: नजवान दरवेश
अनुवाद एवं प्रस्तुति: वंश प्रभात

नजवान दरवेश [8 दिसंबर 1978] जेरूसलम, फ़िलिस्तीन में जन्मे कवि हैं। अरबी प्रतिनिधि कवियों में नजवान दरवेश का नाम अग्रणी है। 2009 में 39 प्रसिद्ध अरबी लेखकों में नजवान दरवेश भी शामिल थे। 2014 में NPR(National Public Radio(USA) ने इनके काव्य-संग्रह ‘Nothing More to Lose’ को वर्ष की श्रेष्ठ पुस्तक घोषित किया था। इनकी कविताएँ 20 से अधिक भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। कवि होने के साथ-साथ नजवान एक सांस्कृतिक सम्पादक भी हैं। इन्होंने कई अरबी पत्र-पत्रिका में बतौर सम्पादक काम किया है जिनमें प्रसिद्ध हैं: Arab World, Min Wa Ila, Al Akhbar, Al Araby Al Jadeed आदि। इनके कई संग्रह अरबी, अंग्रेज़ी, स्पेनिश इत्यादि भाषाओं में प्रकाशित हो चुके हैं जैसे: Exhausted on the Cross, Once We Woke up in Heaven, A Chair on the Wall of Akka, The Closer I got to the Storm, No One Will Know You Tomorrow, Nothing More to Lose, Embrace इत्यादि। 

1. गोलाबारी खत्म हो गई

कल तुम्हें कोई नहीं जानेगा।
गोलाबारी खत्म हो गई
केवल तुम्हारे अंदर फिर से शुरू होने के लिए।
इमारतें ढह गईं, क्षितिज जल गया
केवल लपटों के तुम्हारे अंदर भड़कने के लिए,
लपटें जो पत्थर तक पिघला देंगी।

मृतक नींद में डूबे हैं
पर नींद तुम्हें कभी नहीं खोज पाएगी—
हमेशा जागे हुए,
जागे हुए जबतक वे चूर न दें ये विशाल चट्टानें
जिन्हें कहा जाता है पुराने ईश्वरों के आँसू।

क्षमा खत्म हो गई
और दया का खून बह रहा है समय के बाहर।
अभी तुम्हें कोई नहीं जानता
और कल तुम्हें कोई नहीं जानेगा।
तुम, पेड़ों की तरह,
रोप दिए गए थे उन जगहों पर जहाँ गोले गिर रहे थे।   

2. बस साँसे चल रही हैं

दीवारों से दुःख बहता है
जबकि मैं, एक प्रेत की तरह, तुम्हारे सुनसान घरों में घुसता हूँ,
अपना अन्त अपने हाथ में लिए,
सोता और जागता अपने ध्वंस में।
अपने खालीपन से परिचित होना हताश कर देता है,
उसके साथ चलना इस हद तक।
इनका बोझ है मुझपर—ये सुनसान घर,
यह चुप्पी जो तुम्हारे घरों को भरती है।
मैं उनके खोखले दिलों में जाता हूँ और बस साँसे चल पाती हैं…

अब न तो अरबी न फ़ारसी न ही कुस्तुंतुनिये मुझे महसूस कर सकते हैं।
क्या मेरे पास कभी भी एक इतिहास नहीं था?
और कैसे गँवाया मैंने उन्हें समय के साथ—
कविताएँ जो दुनिया खोल देती थीं, एक पल में?
और कैसे खो गए तुम, तुम सब?
तुम मेरे हिस्से का दुःख ले गए
और छोड़ गए पीछे परित्यक्तता,
एक ग्रह बिना पंजर का—
तुम मेरे लिए छोड़ गए, तुम उसे छोड़ गए
मुझपर बोझ बनने के लिए।

अगर मैं कहता मैं जा रहा हूँ
तब भी यहाँ कोई नहीं होता
सिवाय परित्यक्तता के,
अपनी कर्कश आवाज़ के साथ जो मेरी आवाज़ निगल रही है।

3. मैं वतन लिखता हूँ

मैं वतन लिखना चाहता हूँ,
मुझे शब्द चाहिए
वतन होने के लिए।
पर मैं सिर्फ़ एक बुत हूँ जिसे रोमनों ने उकेरा था
और अरबियों ने भुला दिया।

उपनिवेशकों ने मेरा कटा हाथ
संग्रहालय में रख दिया।
कोई बात नहीं। मैं फिर भी लिखना चाहता हूँ—
वतन।
मेरे शब्द हर जगह हैं
और चुप्पी मेरी कहानी है।

4. केवल एक स्वप्न

कुस्तुंतुनिया के पुल जैसा जिसके निर्माता ने
कसम खाई थी धूप से पकी ईंट हर तरफ़
खड़ी करने की जबतक वह पूरा न हो जाए
—मुलाक़ात (तराफ़ा बिन अल-अब्द;
543 ई.–569 ई.)

तुम सितम्बर के बीच में हो
और जीवन स्वप्न में एक पुल है।

क्या यही है कुस्तुंतुनिया का वह पुल?
तुम उसे पार कर
हर जगह जाते हो,
और तुम उससे गिर जाते हो
जब स्वप्न टूट जाता है।
मत कहना कि तुम एक क़ैदी हो
और तुम्हें कोई नहीं बचाएगा।
मत कहना कि तुम्हारा जीवन बन गया है
केवल एक स्वप्न
कुस्तुंतुनिया की धरती का।

5. यह हवा

अपने तिरासीवें घर में
तुर्क, आर्मेनियाई, पुराने यूनान के प्रेतों के बीच
अपने दुःस्वप्न, जो केवल वतन से आते हैं
उनके बीच,
जैसे कि वे ही तुम्हारा घर थे…

बहुत हो गई गिनती।
कोई घर नहीं तुम्हारा
इस हवा के सिवा।

6. दो पड़ाव

बस आ जाती है
इससे पहले कि तुम कविता पूरी करो।

क्या यह काफ़ी नहीं है
कि तुम्हारा पूरा जीवन लड़खड़ा रहा है?
क्या बस भी तुम्हारे हाथ की
नोटबुक को झटका दे?

दो पड़ाव से बात नहीं बनेगी:
एक ऐसी बस का सपना देखो
जो कभी न आती हो।

7. पहचान पत्र

बावजूद इसके–जैसा मेरे दोस्त मज़ाक में कहते हैं—कि कुर्द अपनी कठोरता के लिए मशहूर हैं, मैं गर्मी की हवा से भी ज़्यादा कोमल था जब मैंने गले लगाया था अपने भाइयों को दुनिया के चार कोनों में।
और मैं वह आर्मीनी था जिसने इतिहास के बर्फ़ की पलकों के पीछे के आँसुओं पर कभी विश्वास नहीं किया जो ढँकते हैं मृतक और हत्यारे।

क्या इतना ज़रूरी है, सब कुछ होने के बाद, कि मैं अपनी कविता कीचड़ में गिरा दूँ?

हर तरह से मैं बेथलहम का एक सिरयन था जो अपने आर्मेनियाई भाई की बात उठाता है, और कोन्या का एक तुर्क जो दामिश्क के द्वार में घुसता है।
और अभी कुछ देर पहले मैं पहुँचा बयादिर वादी अल-सीर और मेरा स्वागत किया हवा ने, हवा जो अकेली जानती है काकेशस के पहाड़ों से आते हुए आदमी का मतलब, उसका एकमात्र साथी उसका स्वाभिमान और उसके पुरखों की हड्डियाँ।
और जब मेरा दिल पहली बार अल्जीरियाई मिट्टी पर चला, मुझे एक बार भी संदेह नहीं हुआ कि मैं एक अमाज़ी था।

जहाँ कहीं मैं गया उन्होंने सोचा मैं एक इराक़ी हूँ, और वे ग़लत नहीं थे। और मैंने कई बार अपने आप को एक मिस्री समझा जो बार-बार नाइल के किनारे जीता और मरता है अपने अफ्रीकी पुरखों के साथ।
पर सबसे पहले मैं एक आर्मीनी था। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि मेरे स्वजन कुस्तुंतुनिए थे और मैं एक हिजाज़ी बच्चा जिसे उमर और सॉफ़रोनियस ने दुलारा था जब जेरूसलम खोला गया था।

ऐसी कोई जगह नहीं जो अपने घुसपैठियों से जूझी हो सिवाय इसके कि मैं उसके लोगों में से एक था; ऐसा कोई आज़ाद इंसान नहीं जिससे मेरा नाता न हो; ऐसा कोई पेड़ या बादल नहीं जिसका मुझपर एहसान नहीं। और यहूदीवाद के प्रति मेरी घृणा मुझे रोकेगी नहीं यह कहने से कि मैं अंदालूसिया से निष्कासित एक यहूदी था, और मैं अब भी उस ढलते सूरज की रोशनी से अर्थ बुनता हूँ।

मेरे घर में एक खिड़की है जो यूनान पर खुलती है, एक चिह्न जो रूस के तरफ़ इशारा करता है, एक मीठी सुगंध जो हमेशा हिजाज़ की ओर से बहती है, और एक आईना: जिसके सामने खड़ा होते ही मैं खुद को शिराज़ और इस्फ़हाँ और बुखारा के बाग़ में पाता हूँ।

और इससे कम, कोई अरबी नहीं होता।

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वंश प्रभात हिंदी के कवि और अनुवादक हैं। उनके अनुवाद में महमूद दरवेश की कविताएँ यहाँ पढ़ सकते हैं: नैतिकता कवि-दिल के लिए एक गोली की तरह है