कविताएँ ::
विपिन शर्मा

शहर जो रह जाते हैं दूर कहीं…

शहर जो रह जाते हैं हमें में कहीं
और छूट जाते हैं हम उनमें कहीं
उनकी पगडंडियों में
रास्तों में
उनकी धूल हमारे पैरों पर नहीं
माथे पर चढ़ती है
और उतरती है हमारे अंदर
स्मृतियों का काफ़िला बनकर
शहर भावुक नहीं होते
आदमजात की तरह
वह रहते हैं निर्लिप्त
आने-जाने वालों से
किसी श्रमण की तरह
कोई भी उनके काफ़िले का हिस्सा होकर
शहर को अपना समझ ले
मगर वह तब तक ही अपना होता है 

जब तक वह काफ़िले में है
काफ़िले से छूटने वाला हो जाता है अकेला
और शहर मुस्कुराता है
तुम्हारे आने की प्रतीक्षा नहीं होगी
जाने का कोई शोक नहीं होगा
नहीं पसीजेगा मन
लौटते हुए तुम्हारे काफ़िले पर
जानते हो तुम!
तुम्हारे किसी श्रमण ने कहा था
लौटने वाले पूरे लौट कर नहीं आते
और जाने वाले उस जगह से पूरे नहीं जाते
रह जाते हैं, छूट जाते हैं, ठहर जाते हैं
कुछ-कुछ अपने ठिकानों पर
और याद रखो
कोई भी इतना निर्लिप्त नहीं होता
धूनी रमाने वाला जोगी
वर्षा वास करने वाला श्रमण
मज़ार का फ़कीर 

सच बस यही है

सच बस यही है
वही लम्हा जादू हुआ
जो तुम्हारे साथ बीता
वरना इस चपटे द्वीप पर
विचरते हुए जिंदगी ने अपनी मियाद पूरी की

तुम्हें प्रेम किया तो

तुम्हें प्रेम किया
तो
सब कुछ विस्मृत हुआ
याद आया तो
जैसे अजनबी शहर से
गुज़र रहे काफ़िले का
पीछे छूटा कोई शख्स हूँ 

धुंधले आईने में अपना अक्स 

अब
मैं तुम्हें बहुत दूर से देखता हूँ
ऐसे देखता हूँ
जैसे देखता ही नहीं है

जैसे देखता है कोई
धुंधले आईने में अपना अक्स
मन में नहीं 

मस्तिष्क की शिराओं में रहा तुम्हारा साथ
एक अजनबी बेला में
मिले थे तुम आशना बनकर
खिले थे तुम
घनघोर जंगलों में
सुनसान रास्ते पर खड़े हुए
किसी पेड़ का फूल 

मैं तुम्हारे साथ से जाना
किसी का साथ
किसी को कितना अकेला कर देता है

जाने वाले बुद्ध नहीं होते 

पहले हम खुद को संभालते हैं
मनचाहे के साथ हर तकलीफ़  में रहने के लिए
खींचते हैं लंबी साँस
अंदर उठने वाला धुआँ
अग्नि-सा
प्रज्वलित ना हो
हो थोड़ा शांत
और हमारी जिंदगी लग सके किसी ठौर-ठिकाने
फिर जाने वाले चल ही जाते हैं
बिना किसी परवाह
बिना किसी मोह के
नहीं सोचते पीछे जो बसाया है
एक व्यक्ति के मन में सपनों का अपूर्व संसार
उसके किरचे बिखरेंगे यदि
उसे कर देंगे लहू-लुहान
वह चल ही देते हैं
थोड़े क्षमा भाव के साथ
और हम समेटते हैं पहले खुद को
और एक दिन
सब कुछ विन्यस्त
बिखर जाता है क्षण में
और हो जाते हैं हम आवाक
और खुद को ही देखकर सोचते हैं 

हम वह तो नहीं थे
जो अब हैं
तब हम भोगते हैं अपने होने को
जीने से ज्यादा

जो बाशिंदे हैं ऋषिकेश के

जो बाशिंदे हों ऋषिकेश के
किसी भी शहर में ढूंढेंगे
बहते हुए जल का ठिकाना
जी सके बहते हुए जल के साथ
एक प्रवाह में डूबते-उतरते
पार होने की जुगत लगाते
शहर के बीच अजनबीपन के धुएं को उड़ाते
बसाते शहर में अपना शहर
मगर उन्हें कहाँ रास आएगा
कोई और शहर
जिन्होंने आचमन किया हो
ऋषिकेश में गंगाजल का

बस
मन बहलाओगे
और खुद को तन्हा पाओगे
तुम हो जल के किनारे के नागरिक
और घने-वन प्रांतर के रहगुजर
मगर फिर भी प्रार्थना करो
जल बचा रहे
नदियों में
हमारे मन में
लोगों की आंखों में
बेशक रहो किसी शुष्क शहर के किनारे पर
प्रार्थना करो
लबालब भरी हुई नदियों के लिए 

मृत व्यक्ति के बारे में सोचना 

मैने नहीं देखा था
उसे पूर्व में
मैंने देखा लेकिन उसे
तड़पते हुए और अंतत: जाते हुए
नसों में खून का प्रवाह कम होते हुए
हिलते हुए हाथों की जुंबिश धीरे होते हुए
यह देखकर हैरान हूँ ऐसे ही मरता है कोई आदमी
उससे पहले मैंने सोचा
वह भी निकला होगा सुबह।
घर से दफ्तर, स्कूल, कॉलेज, मजदूरी कहीं भी
हर रोज़ की जिंदगी को चलाने के लिए
किया होगा उसने भी नाश्ता
और कहाँ होगा दरवाजे पर खड़े किसी इंसान से
शाम तक लौट आऊंगा
बाकी के बचे हुए काम  शाम में देख लिए जाएंगे
शाम को कुछ लाना तो नहीं है?
मगर जाने वाले अप्रत्याशित रूप से ही जाते रहे हैं
कामों को अधूरा, वादों को अपूर्ण
स्थितियों को अधर में छोड़कर
जिंदगी अपना रास्ता खोज ही लेती है
मगर कहते हैं–अपूर्ण वादे हवा में तैरते रहते हैं हमेशा के लिए
आंखों के आंसू बेशक सुख जाएं
रिक्ति बनी ही रहती है
कुछ न होने की
अब यह जो जरा सी कमी है
उस व्यक्ति की जगह है
जो चला गया है

•••

विपिन शर्मा नई पीढ़ी के कवि-लेखक हैं। उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं: नई सदी का सिनेमा, मनुष्यता का पक्ष, आजादी की उत्तरगाथा, तुम जिंदगी का नमक हो। उनसे vipinsharmaanhad82@gmail.com पर बात हो सकती है। 

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