कविताएँ : टेड ह्यूज़
अनुवाद एवं प्रस्तुति : उमंग
टेड ह्यूज़ (1930–1998) बीसवीं सदी की अंग्रेज़ी कविता की सबसे प्रभावशाली और मौलिक आवाज़ों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने आधुनिक कविता को प्रकृति, मिथक और अवचेतन की कच्ची ऊर्जा से दोबारा जोड़ा और सजावटी, सभ्य कविता के बजाय जीवन की हिंसक और आदिम शक्तियों को सामने रखा। यॉर्कशायर के मिथोल्मरॉयड में पले-बढ़े ह्यूज पर जंगली परिदृश्य और जानवरों का गहरा असर पड़ा, जो उनकी कविता में स्पष्ट दिखता है।
उनका पहला-संग्रह The Hawk in the Rain उन्हें तुरंत एक विशिष्ट कवि के रूप में स्थापित करता है। उनकी पशु-कविताएँ, जैसे “Hawk Roosting” और “The Jaguar”, शक्ति, प्रभुत्व और अस्तित्व-संघर्ष का प्रतीक हैं। वे मृत्यु, पुनर्जन्म और आध्यात्मिक संघर्ष को समझने के लिए मिथकीय और शैमैनिक परंपराओं का सहारा लेते हैं। उनकी भाषा तीखी, सीधी और ऊर्जा से भरी है, जो कविता को मूल सच्चाइयों से जोड़ने की उनकी धारणा को दर्शाती है।
1956 में सिल्विया प्लाथ से विवाह और 1963 में उनकी मृत्यु ह्यूज़ के जीवन और लेखन दोनों के लिए निर्णायक रहे, जिसका गहरा प्रतिबिंब Birthday Letters में मिलता है। 1984 में वे ब्रिटेन के Poet Laureate बने। Lupercal, Wodwo, Crow, River और Birthday Letters उनके प्रमुख संग्रह हैं। अपनी सशक्त कल्पना और गहन दृष्टि के कारण टेड ह्यूज़ आधुनिक अंग्रेज़ी साहित्य में एक केंद्रीय व्यक्तित्व हैं।
डूबी हुई स्त्री
लाखों की वेश्या, बिना गर्भ के,
उसका दिल पहले से ही बेकार था।
अपार्टमेंट में मौत को आते देख,
यह तीस साल की युवती
पार्क में टहल रही थी,
पक्षी और मधुमक्खी के साथ—लेकिन कोई आदमी नहीं;
जहाँ बच्चे मुट्ठी में
पकड़े हुए थे अछूते सूरज को।
प्लास्टिक के हैंडबैग के साथ, मिंक फर के साथ,
एक चेहरा नींद से थका हुआ और नींद से सूजा हुआ,
ताज़ा पुता और लेपा हुआ— “वेश्या”;
यह कठपुतली बिस्तरों के चीथड़ों
और अजनबियों के कपड़ों से भर दी गई थी—
एक फटा हुआ प्याला, एक कास,
जो धुआँ निगलती और बीमारी का ढोंग करती रही;
लेकिन उसके स्लॉट में एक सिक्का डाल दिया गया।
यह थकी हुई सार्वजनिक स्त्री
बातों में फव्वारों-सी उफन पड़ती,
और अपने शरीर को मूर्तिवत— देवी-सा बना लेती,
जिसके पैर मानो याकूब की सीढ़ी।
वह खुशहाल घरों के पुरुषों की आँखें चुरा लेती;
अँधेरे में उठे हाथ
उसकी देह पर गहनों से अटक जाते;
फिर भी वह इस पार्क में आई—
न सूरज की भुलक्कड़ निगाहों के लिए,
न इधर-उधर दौड़ते बच्चों के लिए;
झील की मिट्टी की तलहटी पर
उसे अपना सहारा मिल गया।
लोर्का के बाद
घड़ी कहती है, “सुबह कब होगी?”
सूरज कहता है, “दोपहर ने मुझे चोट पहुँचाई।”
नदी मुँह में खून भरकर रोती है,
और समुद्र बिना हिले-डुले हर तरफ़ बहता है।
मेरे कान से एक काँस निकली,
जिसे कभी मुँह से नहीं छुआ गया।
कागज़ बिना लौ के भी पीला पड़ जाता है,
लेकिन शब्दों में कार्बन हीरा बन चुका है।
मैं दौड़ता हूँ नदियों के कोमल दर्पण पर,
जहाँ महान परछाइयाँ उभरकर देखती हैं,
सब कुछ आगे की ओर बहता हुआ,
और मेरी प्रतिछाया में संसार को बहाता हुआ।
एक भूत-सी आवाज़, जो मार्ग में
मृतकों को सरसराहट नहीं देती,
जीवितों को ठंडा छोड़ देती है।
पत्थर के इस निर्मल काँच को पोंछकर स्वच्छ कर दो,
मांस के इस निर्मल पत्थर को पोंछकर स्वच्छ कर दो।
एक दुर्घटना
खेतों में किसान, भाप से भरी खिड़कियों के पीछे बैठी गृहिणियाँ,
जलते हुए विमान को नीले आसमान में उड़ते हुए देख रही हैं,
मानो कोई जुगनू और मकड़ी लड़ रहे हों—
पेड़ों से बहुत ऊपर, धुले कपड़ों की टंगी कतारों के बीच।
वे शाम की खबरों का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं।
लेकिन अभी, एक झड़बेरी खाई में अचानक खंड-खंड बिखर गई।
टूटे हुए तने हिलने लगते हैं। ठूँठ में एक तीतर
आश्चर्य से इधर-उधर देख रहा है।
वह खरगोश जो उछलता है, चकित-सा, झिझकता हुआ,
कान चपटा करता है और पागलों की तरह भागता फिरता है—
और नन्ही चिड़ियाँ चेतावनी देती हैं।
कुछ ने उसे गिरते देखा; धुआँ मानो इशारा कर रहा हो।
वे ऊपर हलचल करते हैं, सूरज की किरणों के सहारे झाँकते हैं,
मानो उन्हें झाड़ियों के बीच कोई साँप या कोई दुर्लभ फूल दिखाई दे रहा हो।
वे सूखे पत्तों की कब्र को अचानक हिलते हुए देखते हैं,
सुनते हैं कि कोई जीवित इंसान हवा से नीचे गिर गया है।
अब उसकी कराहें और इंद्रियों की टटोलने की आवाज़ सुनो।
वे झाड़ियों, पत्तों और काँटेदार तार के अंबर को चीरते हैं;
वे एक ऐसे शरीर को उठाते हैं, जो हवा के स्पर्श से चमक उठता है,
और उसकी हड्डियों पर अपने हाथ फेरते हैं। अब, जब उसकी रीढ़
बंधे पूलों की ढेरी पर भी नहीं टिकती, वे उसे सहारा देते हैं,
उसके अंगों को क्रम से व्यवस्थित करते हैं, उसकी आँखें खोलते हैं,
फिर भूतों की तरह असहाय खड़े हो जाते हैं—अगस्त की दोपहरी में पिघलते दृश्य में।
जला हुआ इंसान और निकट आता है,
उनके अपने मांस-रक्त से अधिक सघन और सजीव,
जैसे हृदय की अकस्मात धड़कन देह थर्रा देती है, और
आँखें बालसुलभ खुल जाती हैं। सहानुभूति
मक्खियों की तरह खून से चिपक जाती है। यहाँ कोई भी हृदय
बंद मुट्ठी से ज़्यादा विस्तृत नहीं है, और उसमें
अपना सबसे प्यारा, अघर्ष्य हीरा,
आत्मसंतुष्टि लिए हुए है। आँसू उनकी कोमल आँखों पर थे
उभरने को—पर संकोच में, शोक मनाने वालों के लिए
भय से भर जाते हैं। जो कुछ उन्होंने सहा,
उसे कहने को वे लालायित थे—
कष्टभरी भंगिमा, हाँफना, मृत्यु के संकेत—जब तक कि उनकी नज़र नीचे उस रूमाल पर नहीं पड़ती,
जिस पर उसकी आँख टकटकी बाँधे देख रही है।
लुपेर्केलिया
(I)
कुत्ता अपने अक्खड़ जीवन से प्रेम करता है—
टुकड़ों से, चोरी-चकारी से, अपनी ढलती हुई नसों से।
बेतुके अभिमान की एक अराजकता।
किसी का पालतू नहीं, पर उतनी ही बेचारी कुतिया
की संगत निभाने लायक तो वह था।
उसके कान कटे थे और छोटी पाथर जैसी आँखें।
उसका मुँह भट्ठी की तरह था।
वह मनुष्य के माक़ूल तरीकों
को अपने दाँतों में जकड़े रखता था। मृत्यु मिली—
आँखें बंद, और एक ठहरी हुई मुस्कान।
(II)
यह स्त्री जो मृत्यु के स्पर्श से बची हुई है—
एक जीवित बंजरपन; वह स्वीकार करती है, वह परिपूर्ण है,
लेकिन जीवन के चक्र से बाहर फेंक दी गई है।
अतीत उसके भीतर मारा गया है, भविष्य उखाड़ा गया है।
मरे हुए लोग ज़मीन के नीचे निरुत्सुक रहते हैं।
जीवित लोग उनसे कुछ ख़ास सीख नहीं सकते।
शरीर में बसी वह आदिम समझ,
जर्जर टोटकों की
कहावतों का टोना-टोटका सामान। अब इस जानवर की देह
जलने वाला चारा बन गई है। ख़ून की पुरानी चिंगारी—मृत्यु का स्पर्श नहीं,
बल्कि गर्मी उसके बिस्तर पर छा गई है,
हालाँकि उसने उसे पूरी तरह असहाय कर दिया।
(III)
बकरियाँ—काली, फ़रिश्ते नहीं, बल्कि
शराब से भरे गोल पेट—खालें
हड्डियों के नीचे लटकी हुई।
फिर भी यह कोई क्रूर प्रकाश नहीं है,
और सिर्फ़ पहाड़ की रोशनी नहीं—
उनकी आँखों का सुनहरा तत्व।
उनके सूखे खुरों की सरसराहट, पैरों की सूक्ष्म पड़पड़ाहट,
बलूत में बहती हवा-पत्ते और उसकी
मुड़ी हुई सींग, अचानक उठे वे नेत्र
जो स्त्रियों को चौंका दें; आइवी का जोश,
बकरी की दुर्गंध, एक समृद्ध पनप—
हे पर्वत, श्रोता!
(IV)
सूरज की किरणों से झुलसती रेत पर,
शक्तिशाली लोगों के पैर धड़धड़ा रहे हैं।
उनके तेल से सने शरीर—धूल के गुबार में
पीतल जैसे चमकते। धरती भरी पड़ी है,
उसकी झुलसती लाल काया आकाश के चमकते
नीले पर फूली हुई उठती है—उनके दृष्टिकोण,
एक प्रमेय, बेख़ौफ़ प्रयास का, ब्लेड्स की धार।
कोई भी नश्वर चीज़ उनके संतुलन को डिगा नहीं सकती।
ख़ून से भीगे होने के बावजूद, कुत्ते ने उनकी उग्रता
को आशीर्वाद दिया है। बकरी की खाल के ताज़े चाबुक
हाथों में लिए वे उछलते हुए आगे बढ़ते हैं,
और जानबूझकर किए गए घावों ने
उसे भी उनकी दौड़ में बाँध लिया। हे संसार के रचयिता,
मनुष्य की प्रज्वलित रूह को हड़बड़ाते हुए
उसकी देह युगों-युगों तक तनी रहे,
इस स्तंभित देह का स्पर्श करे।
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उमंग हिंदी और अंग्रेजी में कविताएँ लिखते हैं एवं अनुवाद करते हैं। उन्होंने अंग्रेजी-साहित्य में पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है। इंद्रधनुष पर उनके पूर्व प्रकाशित अनुवाद-कार्यों के लिए यहाँ देखें: डब्ल्यू. एच. ऑडेन | फ़िलिप लार्किन
