कविताएँ ::
जयंत शुक्ल

परम्परा 

जो आँखों से ढुलक
रही है धारा
आँसू! बूंदें!
यही है परलोक की कल्पना
की उपज
दूर कहीं अब भी बजता है
पखावज
नहीं सुनता जिसे मैं।

‘परम्परा को ठुकरा दोगे?’

क्या है परम्परा?
शास्त्र प्रमाण हैं
लोक आबद्ध है
मैं स्वतंत्र हूँ?
घिरा हूँ स्वयमेव सिद्धों से
रूढ़ियों के गिद्धों से।

‘रूढ़ियाँ?’
‘धर्म-भ्रष्ट!’
‘शूद्र हो तुम!’ 

‘हाँ! बहिष्कृत कर दो मुझे
मेरी जाति से निष्कासित कर दो मुझे
मैं चाहता हूँ
मैं मेहतर हो जाना चाहता हूँ।’

पर ये क़माल है कि
मैं मुक्तिबोध की कविता चाहता हूँ
मुक्तिबोध के दुःख नहीं
(मध्यमवर्गीय छद्म-चेतना!)

और फिर यह नॉस्टैल्जिया भी तो…
नहीं मैं रोना नहीं चाहता
न हँसते हुए
न गिरते हुए
मैं अभी मरना नहीं चाहता।

पर इससे बचा भी कैसे जाए?
इसे जिया भी कैसे जाए?
और इसमें मरा भी क्यों जाए!

मिथकों से परे
ज़िंदगी एक लंबी कविता हो रही है

लंबी कविता का-सा तनाव ढो रही है।

बुरा समय

किसी रुके हुए के जाने का
सबके मर जाने का
यह बहुत बुरा समय है
अधूरी इच्छाओं के याद आने का
या उसके आने का, जो मेरा नहीं।

नहीं, मुझमें उत्साह की कमी नहीं
पर थकावट है
रुकावट मेरा हृदय है
वह प्रेम जो सिर्फ़ मेरा था
या वो देश, जो किसी का नहीं।

क्षणिक धूप

पीली धूप डुबाने को है मेरी काया
यह आतुर काया
गेंहूँ की रंगाई लिए हुए
स्वर्ण कुमकुम हो जाना चाहती है
इसको क्या पता है
कि मेरी छत पर यह धूप क्षणिक है

पर धूप को भी क्या पता है
कि मेरी छत पर मैं क्षणिक हूँ 

मेरी यह काया जिसे डूबाने आई है
यह धूप
इस पीली धूप को ही पी जाना चाहती है।

कविता

मैं प्रेम पर कविता लिखूँगा
संभोग पर नहीं
कविता को सभ्य बनाना है
सभाओं में पढ़कर वाह-वाही लूटनी है अपना पांडित्य बघारना है
[छी] बड़ा कवि बनना है!

इसलिए
मैं पेड़ के टूटे पत्ते पर कविता लिखूँगा
कटे हुए पेड़ पर नहीं
आदिवासियों की पीड़ा लिखूँगा
उनसे घिन खाते हुए
और दलितों के हक़ की बात करूँगा
सवर्ण होने के दंभ से भरकर।
आख़िर बड़ा कवि बनना है!

पर दिन के आख़िर में
जब मैं अंधेरे में अपना चेहरा देखूँगा
तो कैसा लगेगा?
कई दिन की थकान
जब उतरेगी किसी कविता में
उसका सामना तो करना होगा न!

तब अपनी पीड़ा से भागने को
(यहाँ भी अपनी पीड़ा: स्वार्थ!)
छिपने की कितनी जगहें होंगी मेरे पास?

आख़िर कुछ कविताओं
और चुटकुलों के अलावा
बचा भी क्या है मेरे पास?

मनुष्य 

प्रेम जाता रहा है लगातार
पर मैंने अपने को बांधे रखा है इससे
सब छूट रहा है
और मैं उसके दुख में हूँ
        —रहना चाहता हूँ।

अन्ततः हूँ तो मैं
एक मनुष्य ही,
नहीं हूँ तो होना चाहता हूँ
कम से कम अनुभव करना चाहता हूँ

और इस पीड़ा को थामे
इसमें अपना अस्तित्व खोते
                          या पाते

मैं अपने दुखों के साथ
मनुष्य होने की अनुभूति करता हूँ।

मैं नाज़िर हूँ
मैंने मौत देखी है
आँखों में पानी लिए।

उस पानी को संजोकर
अब तक चल रहा हूँ
आत्मा की तृप्ति के लिए।

पर सवाल है
कि मनुष्य होने में
और होने की अनुभूति करने में
कितना साम्य है?

चुप्पी के हाहाकार में
और
विनम्रता के अहंकार में
मैं बहुत क़रीब हूँ
लोगों का भगवान होने में।

लापरवाही है मुझमें
एक टीस की तरह चुभती
बेध्यानी है
ख़ालीपन है
वासना है
और इन सबसे लड़ती
थकी-हारी निरी नैतिकता।

कुछ गाने
कुछ फ़िल्में
कुछ कविताएँ
और यदा-कदा गद्य
इनके साथ रहते मन में
पैठ बनाए कुछ शब्द—
‘साहित्य-संगीत कलाविहीनः
साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः।’ 

बच्चे इसका स्वतंत्र अस्तित्व भूल रहे हैं
इसे लिखने में ग़लतियाँ करते हैं
इसके उच्चारण में अधिक समय लगाते हैं
और-तो-और इसे किसी व्यंजन से जोड़ने पर भी
पहली बार में ठीक ध्वनि ही निकले
उसका भरोसा थोड़ा कम हो गया है।

वैदिक भाषा में यह अन्य स्वरों का संबंधी ही है
ह्रस्व और दीर्घ के भेद के साथ
जिसे शायद मैं भी ‘त्र’ ही पढ़ता था,
बाबा के ठीक-ठीक सिखाने पर
मुझे यह सुंदर लगने लगा।

वर्ण से शब्द और सुंदर बनता है
पद से पदार्थ की महत्ता बढ़ सकती है
संज्ञा ज़रूरी होती है
किसी नाम के होने मात्र से
संसार सुंदर हो जाता है।

तुम्हारा नाम भी तो
शुरू हो सकता था ‘ऋ’ से
जहाँ मैं लड़ सकता किसी से
सही उच्चारण के लिए।

ऋतुओं में वसंत आया है
तिस पर फूल कितने वृक्षों पर
काया क्योंकर न खिल उठे।

मेरे लिए यह कितना सुंदर है
तुम कितनी सुंदर हो।

मिलना

युद्ध फिर शुरू हो गए हैं
और हम नहीं मिल पाये।

हम जूझ रहे हैं
भीतरी उथल-पुथल से
जब कि हमें सोचना है
युद्ध में मारे गए लोगों के विषय में भी।

हर दिन तो सूरज उगता है
हर दिन तुम मेरे पास भी नहीं रहती।

फिर आज क्यों
इस सूरज का ताप मेरे कमरे में
मुझे ज्यादा महसूस हो रहा है।

पेड़ों ने धूप को छानना बंद कर दिया है
और हवाओं ने पत्तों को थपथपाना।

अब, जब हम अंत में हैं
(संभवतः)
हमें आख़िरी बार मिलना चाहिए
हमें मिलना चाहिए
जैसे दोस्त मिलते हैं
पूरी ग़र्मजोशी से
फिर मिलने का वादा करके,
हमें मिलना चाहिए
जैसे चिड़िया मिलती है
अपने घोंसले से
अंतिम बार उड़ने से पहले
हमें मिलना चाहिए
जैसे एक माँ मिलती है बच्चे से
हमेशा साथ रहने के वादे के साथ
मरने से पहले।

इच्छा

कई बरसात बीतने के बाद भी
तुम्हारे साथ भीगने की इच्छा
अब तक बची हुई है।

सेमल के पतन के बावजूद
उसकी रूई जितना कोमल स्वप्न
बचा हुआ है,
तुम्हें जी भर प्यार करने का।

चोट पर पसीने का नमक!
आह भर रह जाता है मन,
भर जाता है तन
तुम्हारे छूने भर की कल्पना से।

मरुस्थल की फटी हुई धरती पर
लगातार छाले फूटने पर भी,
पीछा नहीं छोड़ पाया
तुम्हारे चुंबन की मरीचिका का।

कविताएँ एक उम्र भर की
काम नहीं आती हैं,
अपनी कामनाओं का दमन करने में।

•••

जयंत शुक्ल ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक किया है तथा वर्तमान में डी ए वी पी जी कॉलेज, वाराणसी में हिंदी के परास्नातक के छात्र हैं। उनकी कुछ कविताएँ हिंदवी तथा सदानीरा पर प्रकाशित हैं। उनसे jay497shukla@gmail.com पर बात हो सकती है। 

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