कविताएँ ::
कृति राज

पिता का दुःख 

पिता मुस्कराते थे
पिता हँसते थे
जैसे कोई मायावी

हम बचपन से देखते रहे
‘जादूगर शंकर सम्राट’ को
जो बदलता था,
पल भर में कई कपड़े
काया भी बदलता क्षण-क्षण में
और हम विस्मित खड़े रह जाते

पिता का दु:ख
जादूगर के कपड़ों जैसा था
जो नहीं आता कभी पहचान में
वह हमारे सामने
एक पहाड़ की तरह था
जिस पर चढ़-चढ़ हमने
पिता की महत्वाकांक्षाओं का पीछा किया

समाज के सामने
पिता का दु:ख
सहानभूतियों की पोटली मात्र था
जिसे कोई भी टटोल लेता

माँ के सामने
पिता का दुःख
राई का पहाड़ था
जिनके छूते ही वह भरभरा जाता
न जाने कितने अनगिनत दुःखों को
संजो-संजो कर वे
उसको खड़ा करते रहे बार बार
जिससे राई बन जाए एक ठोस पहाड़
और उनके बच्चे वहाँ लेट सके
बहती हुई नदी को देखते हुए

पिता का दुःख
हमेशा
सुख का नकली कपड़ा पहने रहा
छोटे थे हम—
पहचानते थे पिता को
पिता के कपड़ों को नहीं

अब हम भी पहन लेते हैं
अक्सर
पिता के कपड़ों को
और पिता होने भर के
विचार मात्र से घबरा जाते हैं।

परित्यक्त आत्माएँ तुम्हारा इंतज़ार कर रही हैं

मैंने अभी अभी एक चिट्ठी पढ़ी। प्रेम की पराकाष्ठा से भरी। आदर्शों के चर्मोत्कर्ष से लबरेज़। जीवन के लिए भूख पैदा करने वाली…लेकिन मन है कि फिर भी ऊब और खीझ से भरा वर्तुलाकार घूमता है। लगातार चक्कर काटता है। पंछी समुद्री जहाज से उड़ता है और पुनः मुँडेर पर आकर बैठ जाता है। बार-बार कुछेक पंख टूट कर पानी में गिर जाते हैं। पानी उसे खुद में लील लेता है और पंछी ताक रहा है—

ये कैसा मौसम है?

कुत्ते घास नोच रहे हैं
गिलहरियाँ दाने देख ऊबकाई लेती हैं
गायें बार-बार अपनी थनों को सूँघती हैं
बिल्लियाँ अपनी लेंड़ियाँ घर से दूरस्थ निकाल रही हैं
मछलियाँ जलाशयों से बाहर आकर धूप सेंक रही हैं
गाभिन भैंस में कोई हरकत नहीं
शिशुओं ने स्तनों को मुँह में लेकर चबाना छोड़ दिया है
बच्चे कंचों को जेब में छुपाए फिरते हैं
बच्चियाँ नेलपॉलिश के लिए जिद्द नहीं करती
विद्यार्थी पुरानी किताबों को नहीं सूँघ रहे
मन ने बर्बर और हवस से भरे स्वप्नों को जन्म दिया है

कुछ भी ठीक नहीं लगता
बेतरतिबियत में सने और लक्ष्यहीनता से गूँथे
सब बिलबिला रहे हैं।

देखता हूँ
देख रहा हूँ
ओसारे में लटका है फंदा
परित्यक्त आत्माएँ
भटक रही हैं
चंदन अक्षत से भरा धूप थाल लेकर
एक और आत्मा के इंतज़ार में।

तथ्य की सामाजिकता 

जन्म से ही असुविधाओं की हथेलियों ने
शरीर को इतना रगड़ा है
कि गर्माहट में मिलावट की बू आती है

बचपन से ही तथ्यों में अफ़वाहों की नमी थी
हमें छाँकना सिखाया गया
पास बहती नदी से लोटे-बाल्टी भर-भर पानी लाया
हमने छाँक-छाँक कर पिया
पर तथ्यों को यूँ हीं गटका गया

पिता कहते रहे—
‘अफ़वाहों में बहुत ताक़त होती है
उसे कोई भी अपना हथियार बना सकता है’
हमने सिर हिलाया और कहा—अच्छा!

मेरी धमनियों में तो अफ़वाहों का ही अविरल प्रवाह रहा
जिससे पूरा शरीर ही नम होकर चिपचिपा गया
लेकिन हम उसे समझते रहे तथ्य
और उड़ेलता रहा समाज में
छाँक विधि रेगिस्तान में बूँद की तरह गिर गई

राष्ट्रीयता का स्वर
और कोयल की कूक में कोई पर्याय नहीं समझा
प्रतिरोध को कागा का काँव-काँव कह कर
करा दिया चुप
आड़ी तिरछी रेखाओं को मिलाकर
बनाता रहा एक सीधी रेखा

हमने सत्ता के झंडे उठाए
और हरेक खाली जगहों को झंडों से पाट दिया
सुंदर से सुंदर दीवारों पर—
‘फलाना का चिलाना की धरती पर स्वागत है’ के
पोस्टरों से रंग दिया

बेआवाज़ गलियों के आर्तनाद के बीच
हमारे नारे सबसे अधिक सुनाई पड़े
सांप्रदायिकता के सामूहिक गीत गाए
और इशारों से कहता रहा
कि पानी की कीमत बढ़ने वाली है

हमारी लगाई आग की लपटें
कई घरों को राख कर चुकी थीं
हवाओं ने जरा सा रुख़ मोड़ा
कि चिंगारी हमारे घर आ गिरी
और अब आँगन में राख ही राख थी

लोगों की उँगलियों को सीधा
और जीभों को दूसरे रूख में मोड़ना
हमने अपना कार्य समझा

यूँ जवानी का उत्सव चला

आज जब बीत गए कई-कई बसंत
और झुर्रियाँ बन गए पैरहन
हमने जान ही लिया
झुकी हुई रीढ़ का दर्द
टूटी हुई हड्डी के दर्द से ज़्यादा है।

हमने इस बीच सीखा था कई भाषाओं को
रखा था अनुवाद की परंपरा को जीवित
लेकिन अब मौन की भाषा आसान लगती है
शब्दों को अनुवाद करने पर भी
अर्थ संचित मौन में हो जाते हैं घुप्प
नसें चटखतीं हैं तो झुक जाता है सिर
और फूलती हैं साँसे

हमने अब मान लिया है—
हर पत्थर में एक देवता है
और अंत में हर देवता एक पत्थर।

कोयले की राख के नीचे दबी आग
अब फफकती है कभी-कभी
और चिलमिलाते हुए बुझ जाती है
सिसकियाँ रुलाई बन
गालों से ढुलक जाती हैं

अब हमें भान है
शरीर की गर्माहट हथेलियों की गर्मी से नहीं थी।
सच कहता हूँ—
अब रुँधे हुए कंठ से अभ्यर्थना भी बेकार है।

दिल्ली डायरी
(गाँव से दिल्ली आकर यहाँ के वातावरण को महसूसते हुए)

1.

शहर में भागते तमाम चेहरे
जो पड़ चुके हैं पीले
मगर अफसोस!
अमलतास उनका रंग नहीं।

2.

आदमी अपनी संवेदनाओं को
बैग में भरकर, मेट्रो में लादकर
घसीटता हुआ उड़ेल देता है
कहीं भी, कभी भी
संवेदनाएँ भाप बनकर उड़ जाती हैं।

3.

भागता है शहर
बुलेट ट्रेन से भी तेज़
दौड़ते लोगों का फूलता है दम
और उनपर
हँसती हैं एक्वेरियम की मछलियाँ।

4.

यहाँ—
आदमी इच्छाओं के
जनता शासनतंत्र के
सिद्धियाँ मंत्र के
कविताएँ प्रसिद्धि की
और दीवारें इश्तेहारों के गुलाम हैं।

 5.

झुग्गियाँ अब कांक्रीट हैं
हरियाली झाड़ झाँखाड़
शहर जो हो चुका है हताश
कनस्तर और ऐश ट्रे में बना देता है
छोटा मोटा राख का पहाड़।

6.

इस उदास नस्ल में
सेमल राह चलते लोगों के सर पर गिर आता है
कि लोग चुनते नहीं पैरों तले मसल देते हैं।

7.

यहाँ जिंदा इच्छाएँ बिना आत्मा के
भटकती हैं श्मशान में
ख़्वाब चक्कर लगाते हैं
रेल की पटरियों के बीच
आदमी को चाहिए दो गज कब्रिस्तान
या कि सोने के लिए एक जनाजा
या कि नींद के लिए एक चिता?
प्रश्न खड़े खड़े कर्मक्षेत्र में चीखते हैं।

8.

शहर में भागती मेट्रो
आदमी नहीं, ढोती है लाश
जिसमें ठूँस दिए जाते हैं बोरी के बोरी
जहाँ कुलबुलाते हैं मुर्दे
और झटपट इयरफोन में बंद हो जाती है दुनिया।

9.

अलगनिओं पर अब कपड़े नहीं
टाँगी जाती हैं इच्छाएँ
अलगनियाँ विलुप्त हो गईं शहर आकर।

जिम्मेदारियाँ

कल रात सोया
एक भारी थकान और जिम्मेदारियों के साथ
सुबह उठा
थकान मर चुकी थी
मगर जिम्मेदारियों की उम्र एक रात और लंबी हो गई थी।

साज़िश

‘फूल’
क़ब्र और चिता की चीज़ है
देवताओं और मज़ारों ने
छीना है इसे
साज़िश के तहत।

तालाबंद घर

ताला लगाने से
आदमी निश्चिंत होता है
घर नहीं

प्रतीक्षा की एक डोर
खींचती रहती है ताले को
बारम्बार
…लौट कर
चौखट पर पड़ेंगे पाँव?

चूहे अंदर ही अंदर कुलबुलाएँगे
बिल्लियाँ बाहर झख मारेंगी
कुत्ते दरवाजे से लौट जाएँगे
गिलहरियाँ दानों के लिए तरसेंगी
गौरैया सूने अँगने में उदास रहेंगी
सारे फूल मुरझाकर झड़ जाएँगे

कि घर बंद होने से
मुठ्ठी भर हो जाता है संसार

ताला लगाने से
आदमी निश्चिंत होता है
पशु-पक्षी नहीं।

उतर आओ

मैं दिहाड़ी से लौटूँ थका-हारा
फिर भी चौके में मेरा बाट जोहना
और ताखे पर रख देना दु:ख।
रूखा-सूखा ही सही
हाथ बँटा कर
थाली में रोटी संग परोस देना दो चम्मच सुख।

चूल्हे में रोटी थापना
जैसे थपकी देती हो मुनिया को
चूल्हे से उठे धुँए को फूँक देना
जैसे फूँक देती हो दुःख को

रसोई में तुम्हारी पसीनाई स्याह देह देख
याद आता है—
हथौड़ा मारता, पहाड़ तोड़ता
माँझी का शरीर।

तुम्हारे लिए गीत गुनगुनाने की चाह में
मैं गीत लिखकर मिटा देता हूँ
मेरे सारे शब्द जूठे हैं
इसलिए समझो मेरा मौन
जानो मेरा स्पर्श
मेरी छुअन की छूअनियत से
उतर आओ अनकहे शब्दों की खोह में

न होना अपने श्रेष्ठतम रूप में

सारे फूल नहीं खिले हैं अभी तक
बिलखते बच्चों को पुचकारना है
बर्बर युद्ध विभीषिकाओं को रोकना है
दुखों से जर्जर शरीर को आत्महत्या स्थगित करना है
दुनिया की सबसे सुंदर कविता रची जानी बाकी है

तुम्हारी हथेलियों को
अपने हाथों में लिया जाना अभी बाकी है
बहुत कुछ करना शेष है
यहाँ कुछ भी श्रेष्ठ नहीं

किसी का भी न होना
अपने श्रेष्ठतम रूप में
देता है उसे एक गति

अंतिम बिंदु पर पहुँचने के बाद
खत्म हो जाता है आगे का रास्ता
बचती है केवल पीछे की पगडंडी

अंतिम बिंदु तक पहुँचने से पहले
रहना एक कदम पीछे
श्रेष्ठतम होने से
थोड़ा सा कम

क्योंकि…

श्रेष्ठतम रूप सत्य
लेकिन भयावह है
केवल मृत्यु ही है
अपने श्रेष्ठतम रूप में।

•••

कृति राज नई पीढ़ी के कवि हैं। वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में हिंदी साहित्य में शोधार्थी हैं। उनसे kritirajshanu@gmail.com पर बात हो सकती है।