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विस्थापन, विषाद और मछलियाँ

श्वेत रव :: कविता : अपर्णा अनेकवर्णा वरिष्ठ चित्रकार अखिलेश जी के आदिवासी कलाकार जनगढ़ पर लिखे आलेख को पढ़ने के बाद बहुत बेचैनी रही. उसी बेचैनी में यह सब लिखा : मछलियाँ अपनी अन्धी आँखों से ताकती हैं रहस्य नीले से हरा हुआ जाता है एक कैनवास में बंध गए हैं तृप्ति कलाकार की और उसी कलाकार का निर्वासित विषाद शैवाल मुँह बाए ताकते हैं अन्धी हैं हरी मछलियाँ नीले जल वाले एक फ्रेम में उस फ्रेम के बाहर एक कमरा...

साप्ताहिक प्रहसन

गद्य : आदित्य शुक्ला (शाम के सात बजे आज साप्ताहिक प्रहसन सुनिए…) “जरा हटके, जरा बचके ये है बम्बे मेरी जां” *फ़िल्मी वह एक स्कैंडेलस शाम थी. सब लोग इस दुनिया में व्याप्त केओस से परेशान थे. लेकिन आखिरकार वे ही लोग उस केओस के वाहक थे. वहां उपस्थित सभी लोग जंगली सूअरों के मुखौटे पहनकर घूम रहे थे. उन सब की आँखों से लालसा, लालच और ईर्ष्या झलक रही थी. वे सभी किसी न किसी सेन्स ऑफ़ अर्जेंसी में थे और...

नाटक की समझ से मुक्तिबोध का संसार खुला

संस्मरण : संजय कुन्दन मुक्तिबोध की कविताओं से पहली बार सामना होने पर झटका लगा, बिल्कुल बिजली के करंट जैसा. उन दिनों मैंने मैट्रिक (दसवीं) की परीक्षा पास की थी और इंटर में मेरा दाखिला पटना कॉलेज में हुआ था. तब इंटर की पढ़ाई कॉलेज में होती थी. तब मेरी बड़ी बहन बीए में हिंदी साहित्य पढ़ रही थी. मुक्तिबोध उसके कोर्स में थे. मैं उसकी सारी किताबें पढ़ता था, सो मुक्तिबोध को भी पढ़ा. आश्चर्य हुआ कि क्या...