इंद्रधनुष की पहली वर्षगाँठ पर प्रधान सम्पादक की चिट्ठी

प्रधान सम्पादक की चिट्ठी ::

प्यारे दोस्तों

इंद्रधनुष की औपचारिक शुरुआत हुए आज एक वर्ष हो गया. पिछला एक साल कई तरह की चुनौतियों, अनुभवों और संतुष्टियों को देने वाला रहा. सबसे पहले तो संस्था के तौर पर, हमलोग नए हैं, युवा हैं और अभी भी अपने होने की वजहों, अपने होने से पैदा हुई चुनौतियों और हमारे होने से परेशान होने वाले सत्ता प्रतिष्ठानों – इन सब से एक साथ जूझ रहे हैं. समय के साथ आप उत्तेजना की जगह निरंतरता के घर जाने की इच्छा पालने लगते हैं – हमारे साथ भी कुछ कुछ यही स्थिति है.

छपे हुए की बात करें तो पिछले एक बरस में हमने जो कुछ छापा, हमने कोशिश की कि जनता की आवाज़, समाज की वास्तविकताओं और साहित्य के स्तर को ध्यान में रखते हुए ही आगे बढ़ा जाए. राह में बाधाएँ थीं, आगे भी रहेंगी लेकिन कमोबेश लगता है, काम चलता ही रहा, हमने जहाँ से रास्ता शुरू किया था, कुछ आगे तो बढ़े ही. अपनी कमियों को मानने में संकोच नहीं, अपनी असफलताओं से मुँह छिपाना नहीं, तमाम असहजताओं का सीधा सामना करना और बार-बार ग़लत को ग़लत कड़े शब्दों में कहना ही इंद्रधनुष की विचारधारा रही है. हो सकता है कि कहीं हम चूके होंगे, हो सकता है कुछ असंतुष्टियाँ फिर भी रह गयी होंगी, लेकिन जब तक जीवन है, सुधार की सम्भावना बनी हुई है. फिर भी, मुझे संतुष्टि है कि कुछ प्रयोजनों में तो हम सफल रहे. लगातार गम्भीर नए लोगों को जगह दे पाए, कुछ बैठिकी पटना में हो पायी, कुछ पुरानी किताबें फिर से पढ़ी गयीं, कुछ गरमी पैदा हुई- एक अलाव की तरह कुछ कुछ हमलोग रहे होंगे, यह ख़्याल ख़ुश करता है.
आगे बढ़ने का हौसला भी देता है.

आनेवाले समय को ज़ाहिर है, पहले से गम्भीर होना है. विघटनों की सम्भावना इतनी बलवती कभी नहीं थी. सूरज बरछियों की तरह इतना पहले कभी नहीं चुभ रहा था. समाज के तौर पर, हम इतने झुके हुए कब थे? इतना शोर कब था? इतनी आवाज़ें कब एक साथ हिंसा के पक्ष में उठ रही थीं? भीड़, सत्ता केंद्रों के हाथों की तरह  कब काम कर रही थी? समाज के तौर पर, हमारे चरित्र की परीक्षा का अवसर यही है, यह भी मुझको लगता है. भय, अभिव्यक्ति के रास्ते में पड़ने वाली खाई की तरह है और इंद्रधनुष उस खाई को पार करने का पुल बने, यही आकांक्षा है. इसी के साथ आगे बढ़ना है.

डाइयलेक्टिकल पक्षों के बीच संवाद के रास्ते ना भी बनें, उनके बीच का विरोध बना भी रहे तो कोई भी समाज अपनी मनुष्यता से अपनी और अपने आने वाली पीढ़ियों को बचा लेता है- मनुष्यता, शायद आस्था की छलाँग की तरह. जो समुच्चय इस दिशा में काम कर रहा है, उसी का आंशिक, यह छोटी संस्था भी बने यह भी हमारा लक्ष्य है . “मुक्ति का स्वप्न” उस आदर्श की तरह जिसकी चाह लिए, निरंतर परिश्रम आवश्यक है, जिसपर भरोसा कर अपनी निष्ठा को एकाग्र किया जाना चाहिए, हमलोग भी कोशिश करते रहना चाहते हैं.

बहुत प्रेम,
अंचित.

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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