संपादकीय ::
प्रभात प्रणीत

आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ। एक लंबे अंतराल के बाद आज पुनः आपसे रू-ब-रू हो रहा हूँ। इंद्रधनुष के माध्यम से पिछले कुछ समय से हमारा सीधा संवाद नहीं हो सका। वजह शायद हमारी अघोषित चुप्पी ही थी। हम चुप हैं, और हमारी यह चुप्पी किसी निजी निराशा की उपज नहीं है, बल्कि यह उस समय की देन है जहाँ सत्य बोलना धीरे-धीरे निषिद्ध होता जा रहा है। हमारे भीतर जो मौन बसा है, वह कायरता का नहीं, बल्कि समय के उग्र शोर में शब्दों की असमर्थता का मौन है। यह चुप्पी सिर्फ होंठों पर नहीं, आत्मा की गहराइयों में बैठती जा रही है, जैसे किसी पुराने जर्जर घर में बुझता हुआ अंतिम दीपक—जो अभी भी टिमटिमा रहा है, पर हवा हर क्षण उसे अंतिम बार बुझा देने को बेचैन है।

हमने बोलना इसलिए नहीं छोड़ा कि हमारे भीतर भाषा का स्रोत सूख गया है; बल्कि इसलिए कि भाषा के अर्थ का केंद्र टूटने लगा है। शब्द अब वैसा भार नहीं सँभालते जैसा सभ्यताएँ सँभालती थीं। शब्दों की गरिमा बिखर रही है, और यह टूटन इतनी व्यापक हो चुकी है कि सबसे गहरे, सच्चे, जरूरी शब्द भी एक भीड़ के शोर में अपना प्रभाव खो देते हैं। इतनी तेज़ी से घटनाएँ बदलती हैं कि भाषा का स्वभाव धीमा पड़ जाता है। समय अपनी रफ्तार में हिंसक हो चला है, और भाषा—जिसे कभी मनुष्य की चेतना का सहारा माना गया—उसकी लंगड़ाती हुई परछाई की तरह पीछे रह जाती है। हमारे समय पर एक गाढ़ा, काला धुआँ जमा है, जिसमें विचार साँस लेने की कोशिश करते हैं, संघर्ष करते हैं, और फिर धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाते हैं। हमारे भीतर जो कोना है जहाँ कभी उजाला सहजता से प्रवेश कर जाया करता था, वह अब अँधेरे के स्थायी निवास में बदल रहा है। हम उसे देखते नहीं, क्योंकि देखने का साहस अब एक विलासिता हो गई है।

नींद अब विश्राम नहीं, एक आसरा है। जागना अब सिर्फ एक दैनिक क्रिया नहीं, एक संघर्ष है। हर सुबह अपनी ही परछाईं से लड़ना है, हर शाम यह स्वीकार करना है कि हम फिर वह नहीं कर पाए जो हम कर सकते थे। हर रात यह डर कि कल फिर वही शोर होगा, वही हिंसा होगी, वही असहमति पर हमले होंगे, और वही आत्मा को घायल करने वाला वातावरण। पर यह अँधेरा सिर्फ हमारा निजी नहीं; यह एक वैश्विक युग का अँधेरा है, एक ऐसा समय जहाँ दुनिया अपनी सबसे बड़ी तकनीकी ऊँचाइयों पर पहुँचकर भी भीतर से सबसे अधिक खोखली हो चुकी है।

दुनिया का नक्शा अब देशों का नहीं रहा, बल्कि बेचैनियों का नक्शा बन चुका है। अमेरिका अपने ही लोगों से डरने लगा है। यूरोप भविष्य से डरता है क्योंकि अतीत उसे चैन नहीं लेने देता। चीन नियंत्रण से भी अधिक नियंत्रण चाहता है, एक ऐसे स्तर तक जहाँ मनुष्य सिर्फ एक संख्या रह जाए। रूस एक ऐसे साम्राज्य का सपना देख रहा है जिसका भार उसकी जनता उठाते-उठाते थक चुकी है। मध्य-पूर्व आग और धुएँ में इतना स्थायी हो चुका है कि अब वहाँ शांति एक कल्पित कहानी लगने लगी है। अफ्रीका संसाधनों की लूट और राजनीतिक अस्थिरता में बिखरी हुई आत्मा की तरह है। लैटिन अमेरिका अपनी ही अशांति से लड़ते-लड़ते थक चुका है। और इन सबके बीच, दुनिया का नागरिक अकेला हो गया है, इतना अकेला कि भीड़ में भी वह अकेला है और अपने घर में भी। दुनिया के इस बदलते नक्शे और वैश्विक बेचैनियों के बीच, भारत का नागरिक भी अपनी एक विशिष्ट और अधिक घातक पहचान की लड़ाई में उलझा है। जहाँ वैश्विक स्तर पर तकनीकी खोखलापन है, वहीं हमारे यहाँ यह खोखलापन हमारी भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों पर प्रहार कर रहा है। यह केवल सरकारों या सीमाओं का संकट नहीं है, बल्कि उस ‘भारतीय ग्रामीण और कस्बाई मानस’ का संकट है, जो सदियों से अपनी सहज सहिष्णुता के लिए जाना जाता था, पर आज वह डिजिटल नैरेटिव और सांप्रदायिक विभाजन की प्रयोगशाला बन गया है। वैश्विक नागरिक की यह ‘अकेली भीड़’ दरअसल हमारे अपने ही समाज का वह हिस्सा है, जो अब अपनी क्षेत्रीय अस्मिता और साझा विरासत को भूलकर एक प्रायोजित शोर का हिस्सा बनने को विवश है। सोशल मीडिया ने उसे एक ऐसी भीड़ में फेंका है जहाँ सब देखते हैं, सब बोलते हैं, सब चीखते हैं, पर कोई समझता नहीं। हर विचार अब पोस्ट होने से पहले मरा-मरा सा लगता है। एक डर भीतर से उठता है कि कौन आहत होगा, कौन हमला करेगा, कौन गलत अर्थ निकालेगा। सत्य अब सिर्फ सत्य नहीं, एक विवाद है। सवाल अब सिर्फ सवाल नहीं,  एक खतरा है। और असहमति अब सिर्फ विचार नहीं, एक अपराध मानी जाने लगी है।

विसंगतियों और अपभ्रंशों से टुकड़ों-टुकड़ों में टूटे इस संसार को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं हमारी सभ्यता के स्ट्रक्चर, उसके संस्थागत ढांचे में, उसके मौलिक खाके में ही कोई भारी भूल अंतर्निहित है। हम चाहे जितनी भी ऐतिहासिक परतें उलटें, कितने भी विमर्शों के आधार पर इसे विश्लेषित करें, यह अवस्था किसी ठोस, तार्किक निष्कर्ष की ओर बढ़ने से पहले ही धुंध की तरह हाथ से फिसल जाती है। उद्भेदन, उत्पत्ति, विकास और स्थापना, मानव इतिहास के ये क्रमिक पड़ाव, जिन्हें हम प्रगति के अध्याय मानने के आदी हो चुके हैं, दरअसल किसी अदृश्य विकृति के अधूरे रूप हैं। ऐसा लगता है कि किसी बिंदु पर सभ्यता ने एक गलत मोड़ पकड़ लिया, और वही मोड़ आज तक हमारे सारे सामाजिक-राजनीतिक ढाँचों में प्रतिध्वनित हो रहा है।

पाषाण युग में कबीले की संरचना और खेती के लिए किए गए श्रम विभाजन ने स्वामित्व की जो प्रारंभिक भावना जन्मी, वह सिर्फ एक आर्थिक परिवर्तन नहीं थी, बल्कि मानव चेतना की दिशा-रेखा को बदल देने वाला निर्णायक क्षण था। मनुष्य जब जमीन का मालिक बना, तो उसने अनजाने में मनुष्यों का भी मालिक बनने का सामर्थ्य हासिल कर लिया, जैसे स्वामित्व की संरचना ने नैतिकता के स्थान पर अधिकार को सर्वोच्च बना दिया हो। स्त्रियों और गुलामों पर अधिकार, पितृसत्तात्मक व्यवस्था की स्थापना, और सत्ता के पहले संविधान की लिखावट, ये सब इतिहास की अनिवार्य परिणतियाँ नहीं थीं, बल्कि एक ऐसे ‘चयन’ के परिणाम थे जिसे सभ्यता ने अपनी ही परिस्थितियों से संचालित होकर किया। इसी चयन की कीमत आज तक चुकाई जा रही है। फ्रेडरिक एंगेल्स का यह कहना कि “परिवार, निजी संपत्ति और राज्य मानव इतिहास की वह त्रिवेणी हैं, जिनमें समाज की संरचना रची जाती है, मानव संबंधों की जटिलताओं का उद्भव होता है, और जीवन की संघर्षपूर्ण यात्रा की दिशा निर्धारित होती है” दरअसल सभ्यता के आरंभिक मोड़ में छिपे उस दोष की ओर संकेत करता है जो आज भी हमारे ढाँचों में जीवित है।

ताम्रयुग में मनुष्य ने जब स्वयं को प्रकृति का सर्जक और नियंत्रक घोषित किया, तब वह केवल तकनीकी प्रगति का उद्घोष नहीं था; यह मनुष्य द्वारा प्रकृति और अंततः मनुष्य पर प्रभुत्व के आधिकारिक काल का प्रारंभ था। यह वही क्षण था जब स्वतंत्रता ने धीरे-धीरे स्वायत्तता का रूप लिया और स्वायत्तता ने धीरे-धीरे वर्चस्व का। मानव इतिहास इस संकुचित होती नैतिकता और फैलते हुए अधिकार का दस्तावेज बनता गया। और इसी संदर्भ में अल्बर्ट कामू की चेतावनी आज भी उतनी ही सार्थक है—“सभ्यता का असली संकट यह है कि हम साधनों को अधिक महत्व देते हैं और उद्देश्यों को भूल जाते हैं।” यह वही संकट है जिसमें आधुनिक मनुष्य गले तक डूब चुका है।

ऐतिहासिक भौतिकवाद ने हमें ढाँचागत असमानताओं को देखने की दृष्टि तो दी, पर वह स्वयं भी अपनी सीमाओं में बँधा रहा। आर्थिक मनुष्य केवल एक रूप है; मूल समस्या कहीं अधिक गहरी, कहीं अधिक आदिम है। यही कारण है कि हमारी सभी आधुनिक संस्थाएँ—राज्य, पूँजी, धर्म, ज्ञान-व्यवस्था, एक साथ विकसित होते हुए भी किसी बुनियादी विसंगति को ढोती प्रतीत होती हैं। मानो सभ्यता एक ऐसे पुल पर खड़ी है जिसकी नींव ही किसी अनपहचानी भूल से बनी हो।

सभ्यता के उसी आदिम ‘अनपहचानी भूल’, ‘गलत मोड़’ ने, जिसने स्वामित्व को नैतिकता से ऊपर स्थापित किया, आज एक ऐसा विकराल रूप ले लिया है जहाँ सत्ता और बाज़ार का गठबंधन अब केवल ज़मीन का नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना का मालिक बनना चाहता है। यह वही स्वामित्व की भूख है जो पाषाण युग में ज़मीन के छोटे टुकड़ों से शुरू हुई थी और आज ‘सत्तावादी पूंजीवाद’ के रूप में जंगलों, पहाड़ियों से लेकर कोयला खदानों तक को निगल जाने पर आमादा है। जब हम आज के बिकाऊ मीडिया और समझौतावादी संस्थाओं को देखते हैं, तो यह अनायास नहीं है; बल्कि यह उसी हज़ारों साल पुराने ‘वर्चस्व के चयन’ की आधुनिक परिणति है, जहाँ मनुष्य की गरिमा को मुनाफे के आँकड़ों में बदल दिया गया है।

एक ओर दुनिया का कोलाहल आत्मा को चोट पहुँचाता है, और दूसरी ओर अपने घर की हलचल उसे भीतर से चीर जाती है। इंद्रधनुष की हमारी यात्रा सात साल पहले शुरू हुई थी, और इन वर्षों ने हमारे चारों तरफ के वातावरण को सिर्फ बदला नहीं, उसकी भावनात्मक, वैचारिक, सांस्कृतिक रचना को गहराई से बदल दिया है। पहले आवाज़ें थीं; आज शोर है। पहले सवाल थे; आज आरोप हैं। पहले बहसें थीं; आज युद्ध हैं। पहले असहमति लोकतंत्र का सहज हिस्सा थी; आज असहमति देशभक्ति की परीक्षा है। सार्वजनिक संवाद अब संवाद नहीं, एकतरफा घोषणाएँ हैं। इतिहास शोध का विषय नहीं, घोषणापत्र का यंत्र है। संस्कृति संरक्षण का नहीं, प्रदर्शन का विषय बन गई है। पत्रकारिता सूचना का माध्यम नहीं, नैरेटिव का हथियार है। विश्वविद्यालय बहस की जगह नहीं, अनुशासन की प्रयोगशाला हैं। नागरिकता अधिकार नहीं. पहचान का बैज है। धर्म निजी नहीं, राजनीति का औज़ार है। भीड़ नागरिकों का समूह नहीं, नया न्यायालय है। और सत्ता प्रशासन नहीं, भावनात्मक नियंत्रण का विस्तृत तंत्र बन चुकी है।

इन वर्षों में बहुत कुछ बुनियादी तौर पर बदलने लगा है। लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्य व व्यवस्था एकाएक हाशिए की तरफ बढ़ते दिखाई देने लगे हैं, या कम से कम उपेक्षित और गैर-जरूरी घोषित होते जरूर प्रतीत हो रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे आवरण के भीतर सब कुछ परिणामी तौर पर बदल गया हो। बुद्ध, महावीर और गांधी के देश में हर रोज नाथूराम गोडसे को महिमामंडित करने की बात अब सामान्य हो चुकी है। अपरोक्ष रूप से समूचे तंत्र को कब्जे में ले चुके एक संस्था प्रमुख का बयान मैं अभी थोड़ी देर पहले पढ़ रहा था जिसमें वे कह रहे थे कि भारत हिंदू राष्ट्र है और इसके लिए किसी संवैधानिक अनुमति की आवश्यकता ही नहीं है। पिछले दिनों एक सरकारी चैनल का महंगा एंकर बड़ी सहजता से अपने दर्शकों को बता रहा था कि दिल्ली का खतरनाक प्रदूषित वातावरण सिर्फ इसलिए है क्योंकि इस देश में लोकतंत्र है और सरकार मनमुताबिक तरीके से काम नहीं कर पाती। वहीं एक निजी चैनल का मालिक खुद एंकरिंग करते हुए कह रहा था कि दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला ‘अरावली’ की वजह से दिल्ली की हवा जहरीली है। उसका निहितार्थ यह था कि इस क्षेत्र की प्राणवायु अरावली पर्वत को नष्ट हो जाना चाहिए। स्वाभाविक तौर पर उसे नष्ट करने का सबसे बेहतर तरीका यह है कि उद्योगपतियों को खनन की बेरोकटोक अनुमति मिल जाए।

अरावली वाले राजस्थान की वादियों में न्याय और पूँजी के संघर्ष का एक क्रूर प्रहसन अभी हाल ही में घटा। आरोप है कि अडानी समूह ने रेल लाइन बिछाने के अनुबंध को धता बताकर ट्रकों से कोयला ढोया और परिवहन शुल्क के नाम पर सरकारी खजाने पर 1,400 करोड़ का डाका डाला। जब जयपुर की कमर्शियल कोर्ट के जज दिनेश गुप्ता ने इस कॉरपोरेट लूट के विरुद्ध फैसला सुनाया, तो आश्चर्यजनक रूप से तत्काल न्यायाधीश का तबादला कर न्याय की उस गूँज पर ‘स्टे’ का ताला जड़ दिया गया। क्या यह केवल एक तबादला नहीं, बल्कि तंत्र द्वारा न्याय की आत्मा को दी गई सीधी चेतावनी नहीं थी?

क्या उपर्युक्त सारी घटनाएं अनायास हैं? क्या इनके बीच कोई संबंध नहीं है? क्या सब कुछ बिना किसी प्रयोजन के स्वतः घटित हो रहा है? यह दरअसल उस ‘नैतिक गलन’ का साक्षात प्रमाण है, जिसका ज़िक्र मैंने शुरुआत में किया था। यह उस ‘जर्जर घर में बुझते हुए अंतिम दीपक’ पर पड़ने वाली एक और क्रूर फूँक है। जब सत्ता और पूँजी का गठजोड़ इतना नग्न हो जाए कि वह देश की सर्वोच्च संस्थाओं की मर्यादा को धूल धूसरित करने लगे, तो वह केवल एक वित्तीय घोटाला नहीं रह जाता, बल्कि वह हमारी सामूहिक चेतना का ‘एपिस्टेमिक क्राइसिस’ यानी ज्ञानमीमांसा का संकट बन जाता है। जिस तरह शब्द अपना अर्थ खो रहे हैं, उसी तरह अब नियम और कानून भी केवल ‘हाइपर-रियल’ शोर का हिस्सा बनकर रह गए हैं। कोयला ब्लॉकों का आवंटन हो या संवैधानिक संस्थाओं की चुप्पी, या फिर मीडिया का सत्ता का पालतू हो जाना, ये सब उस ‘सर्वेलांस कैपिटलिज्म’ के औज़ार हैं जो मनुष्य को नागरिक से बदलकर केवल एक ‘डेटा’ और ‘उपभोक्ता’ बना देना चाहते हैं। यह हमारी आत्मा की गहराइयों में बैठने वाला वह मौन है, जो अब चीखकर पूछ रहा है—क्या हम वाकई एक लोकतांत्रिक समाज हैं, या हम केवल पूँजी के विज्ञापनों में जी रहे मृत शब्द?

अधिनायकवाद और बाज़ार के बीच का संबंध एक सामरिक ‘लेन-देन’ पर टिका है, जहाँ राजनीतिक निरंकुशता ही आर्थिक सुगमता का मार्ग प्रशस्त करती है। सत्तावादी शासन बाज़ार को त्वरित निर्णय और नीतिगत स्थिरता का वह सुरक्षित परिवेश देता है, जहाँ श्रमिक आंदोलनों या लोकतांत्रिक विरोधों का भय नहीं होता। इसके बदले, समृद्ध बाज़ार शासक को वह धन और तकनीकी शक्ति प्रदान करता है जो उसकी सत्ता को टिकाए रखने और उसे ‘विकास पुरुष’ सिद्ध करने के लिए आवश्यक है। जब सत्ता और बड़े व्यापारिक घराने एकाकार होते हैं, तो यह ‘सत्तावादी पूंजीवाद’ का रूप ले लेता है, जहाँ तथाकथित आर्थिक समृद्धि के बदले नागरिकों की राजनीतिक वफादारी खरीदी जाती है।

वैश्विक स्तर पर चीन का ‘बीजिंग कंसेंसस’, सिंगापुर का मॉडल और रूस की ‘ओलिगार्की’ इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के बजाय आर्थिक लाभ को ही राजनीतिक वैधता का आधार बनाते हैं। किंतु यह तंत्र तब और भी विनाशकारी हो जाता है जब इसमें ‘धार्मिक विभाजनकारी नीतियों’ का विष घुल जाता है। अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए जब सत्ता समाज को सांप्रदायिक आधार पर बांटती है, तो जनता शिक्षा और रोज़गार जैसे बुनियादी मुद्दों को भूलकर पहचान के छद्म संकट में उलझ जाती है। धार्मिक उन्माद न केवल सामाजिक सौहार्द को भस्म करता है, बल्कि अविश्वास का वातावरण पैदा कर आर्थिक विकास की नींव भी खोखली कर देता है। अंततः इस गठबंधन में आम जनता घृणा की वेदी पर अपनी शांति और भविष्य की संभावनाओं की बलि चढ़ाने को विवश हो जाती है। लेकिन क्या यह सब एक दिन में घटित हो जाता है? क्या इस पर किसी की नजर नहीं जाती? एक देश का चरित्र, सामाजिक व्यवहार और व्यवस्था एक दिन में बदलने वाली चीजें नहीं हैं। ऐसा होने में वर्षों लगते हैं और इसका एक प्रमुख वाहक बनती है—आम जन की विवश चुप्पी, समर्पित चुप्पी या प्रायोजित चुप्पी।

कर्कगार्द ने कभी कहा था—“मनुष्य तब सबसे कमज़ोर होता है जब उसके भीतर सत्य जीवित हो, लेकिन उसे कहने का साहस मर चुका हो।” हम उसी कमज़ोरी में जी रहे हैं। पर सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह संस्था, जिसे इस अँधेरे के खिलाफ खड़ा होना था—सबसे पहले टूट गई। वह है—हिन्दी साहित्य। हिन्दी साहित्य कभी भारत की आत्मा था। प्रतिरोध की ध्वनि था। चेतना का प्रहरी था। वह स्थान जहाँ शब्द सत्ता से नहीं डरते थे बल्कि सत्ता शब्दों से डरती थी। लेकिन आज हिन्दी साहित्य एक विशाल, सुरक्षित, चमकदार, दिखावटी नगर है, जो भीतर से खोखला है। आज का लेखक शब्दों को सजाता है, पर जहाँ जोखिम हो, वहाँ चुप हो जाता है। आज का आलोचक विवेक की बात करता है, पर जहाँ सत्य की आवश्यकता हो, वहाँ तटस्थता का कंबल ओढ़ लेता है। प्रकाशक साहित्य नहीं, उत्पाद छापते हैं। साहित्य–परिसर महोत्सवों का प्रबंधन है, विचारों का नहीं। नीत्शे की चेतावनी—“संस्कृति का पतन तब होता है जब बुद्धिजीवी लोकप्रियता को सत्य से अधिक महत्व देने लगते हैं”, आज अक्षरशः सही सिद्ध हो रही है। साहित्य लोकप्रियता का सुरक्षित क्षेत्र बन चुका है, जहाँ शब्द सुंदर हैं पर कमज़ोर, वाक्य चमकते हैं पर काटते नहीं, भाषा बहती है पर जगाती नहीं, अर्थ हैं पर गहराई नहीं, मंच हैं पर साहस नहीं।

इस नैराश्य और वैचारिक शून्यता के बीच पुराने साहित्यकारों का नैतिक साहस आज एक मशाल की तरह स्मरण हो आता है। सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जब नेहरू की माँ वृद्ध सेनानी स्वरूप रानी पर पुलिसिया लाठियां बरसाई गईं, तो प्रेमचंद की साहित्यिक अंतरात्मा तड़प उठी थी और उन्होंने हुकूमत को ललकारते हुए अपने ‘जेल से बाहर होने’ पर शर्म व्यक्त की थी। यही वह परंपरा थी जिसे आगे चलकर नागार्जुन ने और भी तीखा विस्तार दिया। जब नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल में ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ का भारत आगमन हुआ, तो नागार्जुन ने सत्ता की आंखों में आंखें डालकर पूछा था— ‘आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी!’ यह एक प्रधानमंत्री के सामने खड़ा होकर व्यवस्था की दासता पर किया गया ऐसा प्रहार था जिसने साहित्य को सत्ता के समानांतर एक बड़ी शक्ति के रूप में स्थापित किया। प्रेमचंद की वह ‘शर्म’ और नागार्जुन का यह ‘व्यंग्य’ आज के उस डरे हुए बौद्धिक वर्ग के गाल पर एक तमाचा है, जो जोखिम उठाने के बजाय विभिन्न सत्ताओं की चाटुकारिता और तटस्थता में ही अपना भविष्य सुरक्षित देखते हैं।

हिंदी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य एक अजीब विडंबना से भरा है, जहाँ शब्दों का संसार विस्तृत है, पर दृष्टि आश्चर्यजनक रूप से सिकुड़ गई है। मीडियॉक्रिटी यहाँ कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित सांस्कृतिक व्यवस्था है, जिसने साहित्य को उसके मूल साहस, उसकी नैतिक बेचैनी और उसके बौद्धिक ताप से वंचित कर दिया है। यह वर्ग, जो स्वयं को साहित्य का प्रहरी मानता है, असल में भाषा के सबसे साधारण दरवाज़े पर बैठा एक ठेकेदार है, जो आने वाली हर नई, असुविधाजनक, अनियंत्रित आवाज़ को रोक देने में ही अपनी सफलता देखता है। इनकी सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि ये लेखन नहीं, साहित्य का अभिनय करते हैं, एक ऐसा अभिनय जिसमें मंच की रोशनी है, पर भीतर चरमराती शुष्कता; जिसमें शब्दों की भीड़ है, पर अर्थ का निर्वासन; जिसमें संबंधों की ऊष्मा है, पर विचार की मृत्यु। इनके उत्सवों में तालियाँ अधिक बजती हैं, पर आत्मा कम बोलती है; पुरस्कारों की संख्या बढ़ती है, पर सत्य की गूँज लगातार क्षीण होती जाती है। साहित्य से इनकी दूरी उसी क्षण शुरू हो जाती है जब यह लोग अपने समय की पीड़ा से मुँह मोड़ लेते हैं। ये संकटों का सामना नहीं करते, बल्कि सौंदर्य की एक सतही चादर ओढ़कर जीवन की असल आँच से बच निकलते हैं। जब किसी समाज का साहित्य ऐसे लोगों के हवाले हो जाता है, तो भाषा चमकदार तो दिखती है, पर भीतर से खोखली हो जाती है। वह शब्दों से सजी एक ऐसी नाव बन जाती है जो तैरती तो है, पर दिशा और गहराई दोनों खो चुकी है।

आलोचना से इनका भय किसी बच्चे के अँधेरे के डर जैसा है, अकारण, पर अटल। ये अपने चारों तरफ़ एक नाजुक काँच का घेरा बना लेते हैं, जिसमें सत्य प्रवेश नहीं कर सकता। इसलिए हिंदी साहित्य में सबसे अधिक अपमानित वस्तु आज आलोचना ही है, वह आलोचना जो साहित्य को जीवित रखती है, जो लेखक को उसके अहंकार से बाहर निकालती है, जो भाषा को नयी आँखें देती है। पर यहाँ आलोचना को शत्रु माना जाता है, और चाटुकारिता को शिल्प।

इस निरंतर गिरावट का असर यह है कि साहित्य धीरे-धीरे अपनी सामाजिक भूमिका, अपने नैतिक साहस और अपने ऐतिहासिक महत्व से वंचित होता जा रहा है। यह अब जीवन का दर्पण नहीं, बल्कि मंचों पर टंगा हुआ एक सजावटी फ्रेम बनता जा रहा है, जिसमें चमक है, पर चेहरा नहीं; आकार है, पर आत्मा नहीं।

यदि हिंदी साहित्य को इस आत्ममुग्ध मीडियॉक्रिटी से मुक्त होना है, तो सबसे पहले उसे उस साहस को पुनर्जीवित करना होगा जो कभी इसके केंद्र में था—सवाल पूछने का साहस, असहमति का साहस, और उस सच्चाई को लिखने का साहस जिससे भाषा और समाज दोनों काँपते थे। साहित्य तभी जीवित होता है जब उसे जोखिम पसंद होता है; और वही दिन हिंदी साहित्य के पुनर्जन्म का दिन होगा जब वह इस सौम्य, चापलूस, सुविधाजनक दलदली मीडियॉक्रिटी को अस्वीकार कर देगा और फिर से अपने सबसे कठिन प्रश्नों का सामना करेगा। लेकिन आज का सच सिर्फ साहित्यिक पतन है, अपभ्रंश है। हर तरफ से फैला, बिखरा, छिछला।

और इसी पतन के बीच सात साल पहले हमारी छोटी-सी यात्रा शुरू हुई, सिर्फ एक जिद के साथ कि शब्दों का अंतिम धर्म सत्य है।  इंद्रधनुष की सात साल की यह यात्रा केवल हमारी अपनी नहीं, बल्कि उन अनगिनत अनसुनी आवाज़ों की साझी विरासत है जो आज के शोर में दब गई हैं। हम खुद को सत्य का एकमात्र प्रहरी घोषित करने का दावा तो नहीं कर सकते, क्योंकि हम भी इसी ‘एपिस्टेमिक क्राइसिस’ और विद्रूप समय के घेरे में हैं। हमारा प्रयास ‘मैं’ की संकीर्णता से ऊपर उठकर ‘हम’ की उस सामूहिकता को खोजने का है, जहाँ साहित्य केवल एक संस्थागत उपलब्धि न रहकर मनुष्य की मुक्ति का साझा घोषणापत्र बन सके। यह सात साल किसी व्यक्तिगत जीत का उत्सव नहीं, बल्कि अपनी सीमाओं को पहचानते हुए उस ‘असुविधाजनक सत्य’ को पकड़े रहने की एक छोटी-सी वैचारिक जिद है, जिसे आज का बाज़ार और मठ मिलकर मौन कर देना चाहते हैं।  ये सात साल उत्सव नहीं, अकेलेपन, असहमति, अपमान, थकान, दबाव के बीच की संघर्ष की डायरी हैं। इसी अनुभव ने हमें भारत की वर्तमान स्थिति को देखने का दृष्टिकोण दिया, एक ऐसा भारत जहाँ ध्रुवीकरण पहले से गहरा है, राजनीति आक्रामक है, मीडिया पक्षपाती है, विश्वविद्यालय नियंत्रित हैं, भीड़ हिंसक है, और सत्य अत्यंत महँगा हो चुका है। इसी समय साहित्य का कर्तव्य सबसे बड़ा था—पर वह छोटा निकला।

हम चुप रहें, तो यह हमारी हार होगी। हमारी चुप्पी हमारे समय के खिलाफ अपराध होगी। हम उस अपराध का हिस्सा नहीं बनेंगे। शब्दों का भविष्य आज तय हो रहा है। अगर आज शब्द डर गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ गूँगी पैदा होंगी। अगर साहित्य समझौता कर गया, तो समाज अपनी आत्मा खो देगा। अगर लेखक चुप रहे, तो मनुष्य अपनी आवाज खो देगा। हम शब्दों की अंतिम लौ को बुझने नहीं देंगे। भले ही छोटी हो, अकेली हो, थकी हो, यही लौ भविष्य का पहला सूरज बनेगी।

हमारे आसपास आज जो भय है, वह दिखावटी नहीं, बल्कि गहरा मानसिक संस्कार है जो अब जा कर भयावह रूप से दिखने लगा है। यह जो सामने है वह दरअसल हमारे अंदर सदियों से घुलती हमारी लघुता  का और अधिक अंधकारपूर्ण, अधिक संक्षिप्त, और लगभग चुभन जैसी तीक्ष्ण रूप में रूपांतरण है, एक ऐसा संस्करण जो सबकुछ नष्ट करने की क्षमता रखता है, जो आज सारे मखमली आवरण को राख करने को तत्पर है।

भारतीय राजनीतिक–सामाजिक–साहित्यिक परिदृश्य अब उस गहरी दरार पर टिक गया है जहाँ लोकतंत्र की भाषा मेकार्थीवादी भय से भीतर ही भीतर सड़ रही है। यहाँ संदेह ही सत्य का स्थानापन्न है, असहमति ही अपराध का पूर्वाभास; सत्ता अपने आख्यानों से विचारों की हड्डियाँ मोड़ती है और समाज उन्हें दोहराते-दोहराते अपनी ही चेतना भूल जाता है। साहित्य, जो कभी बेचैनी का मूल-स्रोत था, अब चुप्पियों के घने जंगल में अपने ही स्वर की राख ढूँढता है। इस समय में लिखना एक घाव खोलना है—एक घाव जो हर पंक्ति से पूछता है: क्या तुममें अभी भी इतना प्रकाश बचा है कि अँधेरे को नाम दे सको?

लोग अब लिखने से पहले नहीं, सोचने से पहले डरने लगे हैं। यह भय भीड़ से आता है। इतिहास गवाह है, सत्ता से अधिक खतरनाक सत्ता-समर्थित भीड़ होती है। यह भीड़ हर जगह है, सड़कों पर, दफ्तरों में, सोशल मीडिया पर, और धीरे-धीरे मनुष्य के भीतर भी। जब मनुष्य अपने भीतर भीड़ को जगह दे देता है, यही समाज का पतन है। यहीं से साहित्य का वास्तविक कार्य शुरू होता है। साहित्य मनोरंजन नहीं, मानसिक मुक्ति है। पर हिन्दी साहित्य ने जनता को सुविधा दी, सच्चाई नहीं। सुरक्षा दी, साहस नहीं। आराम दिया, तड़प नहीं। इसी से पतन तेज़ हुआ। क्योंकि आमजन को सबसे अधिक जिस चीज़ की ज़रूरत थी, वही साहित्य ने नहीं दी: असुविधाजनक सत्य।

हिंदी साहित्य में मठ संस्कृति और जातिगत वर्चस्व लंबे समय तक ऐसे छिपे हुए शिल्पकार बने रहे जिन्होंने शब्दों की उड़ान को भी सीमित कर दिया और उनकी दिशा भी तय कर दी। खासकर गहरा जातिगत भेदभाव, एक ऐसी छाया, जो शब्दों की धूप पर भी अपना अँधेरा फैलाती रही। साहित्यिक मठों ने प्रतिष्ठा और वैधता के ऊँचे किले तो खड़े किए, पर इन किलों के दरवाज़े उन्हीं के लिए खुले रहे जिनके पास सत्ता और जातिगत वर्चस्व का चिरंतन पासपोर्ट था; बाकी सब, विशेषकर उपेक्षित जाति से आने वाले लेखक, किले की खुरदुरी बाहरी दीवारों पर ठोकर खाते रहे, उनके अनुभव “कच्चे”, उनकी भाषा “कटु”, और उनका दर्द “असाहित्यिक” ठहराया जाता रहा। हिंदी साहित्य में प्रतिभा का सूरज आज भी वहीं उगता है जहाँ सदियों से ठेकेदार हाथों ने उजाले का हक़ बाँट रखा है; मंचों और पुरस्कारों पर जाति को ‘बीता हुआ सच’ बताने वाले ही उसकी ताज़ा परतें चढ़ाते हैं, स्याही को वंशावली जितनी पवित्र मानते हैं, और शब्द चाहे जितने विद्रोही हों, उन्हें अब भी उसी कुलनाम की चौकी से होकर गुजरना पड़ता है; जबकि हाशिये पर लिखने वाले ‘लेखक’ नहीं, केवल ‘उदाहरण’ समझे जाते हैं, ताकि हाशिया कभी केंद्र न बन सके।

पूरे बाज़ार और तंत्र पर कब्जा कर रखे गिनती के कुछ प्रकाशक, मीडिया और वहां फन फैलाए बैठे नकली मुस्कुराहट ओढ़े लोग जिन्हें ईश्वर हो जाने का भ्रम है किस हद तक इस शोषण के ऐतिहासिक पोषक हैं इसे जानना अब कोई रहस्य की बात भी नहीं रह गई है। फिर जन्मगत संघर्षों से लड़ता, मरता एक इंसान जब हज़ारों साल के बोझ से लड़कर कुछ लिखने का साहस भी कर पाता है तो फिर उसके लिए कितनी जगह बचती है। साहित्यिक मठ, प्रकाशक और मीडिया के सुनहरे त्रिकोण के मध्य उसके साँस ले पाने की कितनी संभावना बचेगी। टॉल्स्टॉय का सत्य— “जहाँ सत्ता होती है, वहाँ भ्रष्टाचार भी होता है”—यहाँ एक भयावह सटीकता के साथ लागू भर नहीं होता है बल्कि निर्दयता, शोषण की रोज एक नई इबादत लिख रहा होता है, क्योंकि साहित्यिक सत्ता ने भी जाति को अपनी अघोषित धुरी बनाए रखा। प्रश्न यह है कि हिंदी साहित्य क्या सच में उस अन्याय को देखना चाहता है जिसे वह सदियों से अनदेखा करता आया?  आज जब हाशिये की आवाज़ें मठों की दीवारों पर दस्तक नहीं, बल्कि उनमें दरारें पैदा कर रही हैं, हिंदी साहित्य के सामने अंतिम और निर्णायक प्रश्न यही है: क्या वह सच के पक्ष में खड़ा होगा, या फिर अपनी ही छाया से डरता हुआ इतिहास के कोने में सिमट जाएगा? आश्चर्यजनक हठ और निर्लज्ज आग्रह यह कि इस संबंध में बात करना भी अश्लील और ग़लीज़ घोषित है। जब भी कोई इस संबंध में खुले शब्दों में बात करेगा सबसे पहले उसकी ही लिंचिंग की जाएगी और ऐसा करने वाले मठों की सीमा को तोड़कर एकत्रित होंगे, अपने हज़ारों सालों के दोहन से एकत्रित किए महंगे डिटर्जेंट से साफ सफेद कपड़ों को पहनकर। और यह इसी तरह निरंतर रहेगा जबतक कि हमें ब्रायन स्टीवेन्सन की यह बात समझ में नहीं आ जाती कि “गरीबी का विलोम धन नहीं है; गरीबी का विलोम न्याय है।” अब चाहे वह गरीबी, अभाव, उपेक्षा किसी भी क्षेत्र में हो, किसी भी चीज की हो। निदान न्याय है, हिस्सेदारी है, समानता है।

समकालीन जगत जिस ‘अटेंशन इकॉनमी’ के कुचक्र में फँसा है, उसने मनुष्य की चेतना को एक कमोडिटी बना दिया है। वैश्विक परिदृश्य पर यह ‘पोस्ट ट्रुथ’ का वह भयावह दौर है, जहाँ सूचनाओं का अधिशेष सत्य की हत्या कर रहा है। समाज का हर क्षेत्र इसके गिरफ्त में है। दुर्भाग्यवश साहित्य जगत जिसे खुद को बचाए रखना था वह सरल समर्पण करने को उतारू है। पटना पुस्तक मेला जैसे आयोजनों की वर्तमान दशा महज़ एक अव्यवस्था नहीं है, बल्कि यह उस बाज़ारी संस्कृति का हिस्सा है जहाँ ज्ञान और विमर्श को भी ‘फास्ट फूड’ की तरह परोसा जा रहा है। यहाँ मुक्तिबोध की वह  खोज अनुपस्थित है, जो अँधेरे में परम अभिव्यक्ति की तलाश करती थी; आज उसकी जगह विज्ञापनों की कृत्रिम रोशनी ने ले ली है।

फ्रांसीसी मनीषी गाय डेबॉर्ड के ‘सोसाइटी ऑफ द स्पेक्टेकल’ की अवधारणा यहाँ पूरी तरह चरितार्थ होती है। समाज अब यथार्थ अनुभवों से विमुख होकर केवल दृश्यों और प्रदर्शन का बंधुआ बन गया है। इस बार मेले के प्रांगण में जो घटा, वह इसी का एक प्रदर्शनकारी प्रकटीकरण था—जहाँ पुस्तकों की मौन पुकार पृष्ठभूमि में खो गई और ‘सेल्फी-संस्कृति’ मुख्य विमर्श बनकर उभरी। यह एक ऐसी वैश्विक त्रासदी है जहाँ मेधा की मौलिकता को एल्गोरिदम और ट्रेंड्स की बेड़ियों में जकड़ दिया गया है। यहाँ शोशना ज़ुबौफ़ का ‘सर्वेलांस कैपिटलिज़्म’ स्पष्ट दिखता है, जहाँ हमारी रचनात्मकता को डेटा संचयन के कच्चे माल की तरह बरता जा रहा है।

लेखन की वह आदिम प्रक्रिया, जो कभी जापानी बोध ‘इकीगाई’ की तरह अस्तित्व का अर्थ खोजने का माध्यम थी, अब ‘पर्सनल ब्रांडिंग’ के हिंसक दबाव में दम तोड़ रही है। दुनिया भर के साहित्य-उत्सव अब ‘कॉर्पोरेट कार्निवल’ में रूपांतरित हो चुके हैं, जहाँ लेखकों को दृष्टा के बजाय ‘इन्फ्लुएंसर’ के रूप में सजाया जाता है। पटना में भी इस बार इसी ‘पॉपुलिज्म’ और सतही चमक का वर्चस्व रहा। यह ‘कॉग्निटिव कैपिटलिज्म’ का वह चरम है, जहाँ हमारी संज्ञानात्मक क्षमताओं को बाज़ार के मुनाफ़े के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसा कि मुक्तिबोध ने सचेत किया था— “अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे, तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब”—पर विडंबना यह है कि आज अभिव्यक्ति के खतरे उठाने के बजाय, लोग डिजिटल मठों और बाज़ारी गढ़ों में सुरक्षित मुनाफे तलाश रहे हैं।

यह एक सुनियोजित वैश्विक षड्यंत्र है कि मनुष्य की प्रतिरोधक चेतना को विज्ञापनों और उथले मनोरंजन की अफ़ीम से सुला दिया जाए। जीन बॉड्रिलार्ड जिसे ‘हाइपर-रियलिटी’ कहते हैं, वह दरअसल हमारे समय का वह सघन कोहरा है जिसमें असली चेहरा खो गया है और केवल मुखौटों की नुमाइश बाकी है। युवल नोआ हरारी ने जिस ‘हैक होने वाले मनुष्य’ की चेतावनी दी थी, यह मेला उसी का एक प्रायोगिक केंद्र बनता दिखा, जहाँ संवेदनाओं को बाज़ार ने पूरी तरह अधिकृत कर लिया है। यह स्थिति मुक्तिबोध के ‘ब्रह्मराक्षस’ की उस त्रासदी जैसी है, जहाँ ज्ञान और सूचना का अंबार तो है पर वह लोक-कल्याण से पूरी तरह कटा हुआ है। यह वास्तव में हमारी समझ और विवेक पर आया वह संकट है, ‘एपिस्टेमिक क्राइसिस’ है जहाँ केवल सूचनाओं के ढेर ने आत्मिक प्रज्ञा के भेद को ही मिटा दिया है। एंटोनियो ग्राम्शी के ‘कल्चरल हेजेमनी’ सिद्धांत के अनुरूप, सत्ताएँ अब बल से नहीं, बल्कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से एक ‘हल्की और रीढ़विहीन संस्कृति’ को सामाजिक स्वीकृति दिला रही हैं। बौद्धिक चेतना का यह क्षरण दरअसल उस छद्म सांस्कृतिक परिवेश  को जन्म दे रहा है, जहाँ साहित्य की गंभीरता का केवल स्वांग रचा जाता है।

पटना पुस्तक मेले के इस वैचारिक पतन के दौर में, सबसे ज़्यादा जवाबदेही उन लोगों की है जिन्होंने अपनी चुप्पी या मिलीभगत से इस अराजकता को फलने-फूलने दिया। उन संरक्षकों और दिखावटी बुद्धिजीवियों पर सवाल उठना लाज़मी है, जिन्होंने बाज़ार की माँग का बहाना बनाकर साहित्य की मर्यादा को बेच दिया और इस ओछेपन को ‘समय की ज़रूरत’ या ‘आधुनिकता’ बताकर पेश किया। बाज़ारवाद का तर्क देकर इस सांस्कृतिक गिरावट को बढ़ावा देने वाले इन लोगों ने आने वाली पीढ़ियों के बौद्धिक भविष्य के साथ एक अक्षम्य अपराध किया है। उनकी यह चालाकी भरी तटस्थता और बाज़ार के साथ उनकी यह सांठगांठ, इतिहास में एक बौद्धिक विश्वासघात के रूप में दर्ज की जाएगी।

यह समय केवल विलाप का नहीं, बल्कि इस बौद्धिक शून्यता के विरुद्ध एक सांस्कृतिक मोर्चेबंदी का है। हमें उस ‘डिजिटल फीड’ के विरुद्ध खड़ा होना होगा जो हमारी मौलिक मेधा को लील रही है। यदि हमने शब्द की शुचिता और संवाद की गरिमा को पुनः स्थापित नहीं किया, तो पटना पुस्तक मेला जैसे पवित्र स्थल भविष्य में केवल एक व्यावसायिक ‘थीम पार्क’ बनकर रह जाएँगे। जैसा कि पाश ने आह्वान किया था, हमें उस सबसे  खतरनाक शांति को भंग करना होगा जो हमारी संवेदनशीलता को पत्थर बना रही है। यह आत्म-साक्षात्कार की अंतिम घड़ी है कि हम ध्वनि के इस कोलाहल में कहीं ‘ध्वन्यार्थ’ को पूरी तरह न खो दें।

पर कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। यह सिर्फ हमारे समय का विलाप नहीं—हमारी सामूहिक जिम्मेदारी की याद दिलाता हुआ घोषणापत्र है। क्योंकि सभ्यता सिर्फ तकनीक पर नहीं टिकती, न ही अर्थव्यवस्थाओं पर, न ही राजनीतिक प्रणालियों पर। सभ्यता का वास्तविक आधार, उसकी नैतिक चेतना होती है। वह चेतना, जो शब्दों में जन्म लेती है, विचारों में पनपती है, साहित्य में आकार पाती है, और समाज में फैलती है। जब यह चेतना कमजोर होती है, सभ्यताएँ गिरती नहीं, धीरे-धीरे गलती हैं। हम आज उसी गलन के समय में हैं। हम टूट नहीं रहे, हम घिस रहे हैं। यह टूटन दिखाई देती है; यह घिसावट नहीं दिखती, लेकिन जड़ें आगे चलकर इसी से मरती हैं।

और यहीं हमारी जिम्मेवारी आरंभ होती है। सभ्यता के इस मोड़ पर हमारा संघर्ष अब केवल वर्तमान को बचाने का नहीं, बल्कि आने वाली सदियों की ‘सोचने की क्षमता’ को संरक्षित करने का है। जब मशीनें शब्द गढ़ने लगेंगी और डेटा ही सत्य का पैमाना बन जाएगा, तब मनुष्य की वह मौलिक ‘त्रुटि’ और ‘छटपटाहट’ ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी होगी जिसे कोई एल्गोरिदम कभी नहीं समझ पाएगा। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और भाषा का क्षरण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं—यदि हम अपने अस्तित्व के मूल आधारों को नहीं बचा सके, तो हमारी शब्दावली भी अपना आधार खो देगी और हम एक ऐसे निर्वात में पहुँच जाएँगे जहाँ मनुष्य केवल एक ‘जैविक सॉफ्टवेयर’ बनकर रह जाएगा। अनिवार्यता एक ऐसी जवाबदेही की है जो वर्तमान के पुरस्कारों और मंचों से ऊपर उठकर भविष्य के उन नागरिकों के प्रति हो, जिन्हें हम एक गूँगी और विचारहीन दुनिया सौंपने के कगार पर हैं। न्याय की असली परिभाषा अब केवल भौतिक संसाधनों का बँटवारा नहीं, बल्कि उस ‘मानवीय चेतना’ की पुनर्स्थापना है जो तकनीकी और वैचारिक दासता से मुक्त हो। अंततः, इस अँधेरे समय में हस्तक्षेप का साहस ही वह एकमात्र विरासत है, जो यह सिद्ध करेगी कि जब पूरी दुनिया एक कृत्रिम मायाजाल में खोई थी, तब भी कुछ आवाज़ें ऐसी थीं जो सत्य की आदिम आँच को अपनी हथेलियों में छिपाकर भविष्य के सूरज का इंतज़ार कर रही थीं।

‘मैं’ और ‘हम’ सभी को जीवित होना होगा, जीवित रहना होगा। यह समझना होगा, स्वीकारना होगा और घोषित रखना होगा कि साहित्य मनोरंजन नहीं, मन की मुक्ति है। साहित्य उपाधि नहीं, उत्पत्ति है। हमारी घोषणा स्पष्ट है—हम चुप नहीं रहेंगे। हम भाषा को फिर से असरदार बनाएँगे। हम शब्दों को फिर से जीवित करेंगे। हम सत्य को फिर से ऊँचा उठाएँगे। हम साहित्य को मनुष्य की तरफ मोड़ेंगे। और सबसे महत्वपूर्ण—हम उस ऐतिहासिक विडंबना को स्वीकार नहीं करेंगे कि “जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, साहित्य सबसे कम मौजूद था।” हम मौजूद रहेंगे।

हम स्पष्ट हैं—हम इस ‘हाइपर-रियल’ शोर के सामने आत्मसमर्पण नहीं करेंगे। हम ‘मैं’ की संकीर्णता से निकलकर ‘हम’ की सामूहिकता में लौटेंगे। हम भाषा को सत्ता का विज्ञापन बनने से रोकेंगे और शब्दों को उनका खोया हुआ ‘ध्वन्यार्थ’ लौटाएँगे। स्थापित करेंगे कि साहित्य मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य की मुक्ति का घोषणापत्र है। हम चुप नहीं रहेंगे, क्योंकि हमारी चुप्पी ही उस तंत्र की सबसे बड़ी जीत है जो हमें जड़ बनाना चाहता है।

हमारी यह मौजूदगी केवल विरोध का स्वर नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक संस्कृति का निर्माण होगी। हम उन युवाओं के साथ मिलकर संवाद के नए, स्वतंत्र गलियारे बनाएंगे जो बाज़ारी चमक और ‘अटेंशन इकॉनमी’ के शोर से ऊब चुके हैं। साहित्य का पुनर्जन्म तभी होगा जब हम मठों की दीवारों से बाहर निकलकर सीधे जन-चेतना से जुड़ेंगे, जहाँ शब्द केवल छपते नहीं, बल्कि जिए जाते हैं। हम तकनीक और डिजिटल माध्यमों के विरोधी नहीं हैं, बल्कि उसके उस ‘चरित्र’ के विरोधी हैं जिसने मनुष्य को केवल एक ‘उपभोक्ता’ में बदल दिया है। हमारे लिए डिजिटल मंच ‘एल्गोरिदम की दासता’ का केंद्र नहीं, बल्कि ‘लोकतांत्रिक हस्तक्षेप’ का एक खुला गलियारा होंगे। हम इन मंचों का उपयोग बाज़ारी विज्ञापनों और सतही विमर्श के समानांतर एक ऐसी ‘साहित्यिक संस्कृति’ खड़ा करने के लिए करेंगे जो मनुष्य की अस्मिता और संवेदना की रक्षा कर सके। जहाँ तकनीक हमें चुप कराना चाहती है, हम उसी तकनीक को अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता का विस्तार बनाएंगे। हम डिजिटल मंचों का उपयोग उन ‘असुविधाजनक सत्यों’ और ‘साहित्यिक मेधा’ को साझा करने के लिए करेंगे जिन्हें व्यावसायिक प्रकाशक और संवेदनहीन मठ अपनी उपेक्षा से मौन कर देना चाहते हैं। यह हस्तक्षेप ही वह कार्ययोजना है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सोचने और महसूस करने की ज़मीन बचाए रखेगी।

हम मौजूद रहेंगे—हस्तक्षेप की तरह, सवाल की तरह और सत्य की अंतिम गूँज की तरह।

हम मौजूद रहेंगे।

[मुझे आशा है कि मैंने जितनी बार ‘हम’ शब्द का प्रयोग किया है, इसमें उन सभी के स्वर शामिल हो गए होंगे जो इस विकट परिस्थिति में साहित्यिक गरिमा, मानवीय चरित्र और समावेशी निष्कर्ष हेतु मुझसे और ‘इन्द्रधनुष’ से कहीं अधिक संघर्षरत हैं—चाहे वे पहचाने हुए चेहरे हों या अब तक अनजाने; वे जिन्हें मैं जानता हूँ और वे भी जिन्हें मैं व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता।]

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[फ़ीचर्ड तस्वीर: पाब्लो पिकासो, ग्वर्निका, 1937]

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