आलेख::
श्रीकृष्ण नीरज
पहाड़ी क्षेत्र में जन्मे मंगलेश डबराल अपनी कविताओं में जितना पहाड़ी जीवन की स्मृतियों को रचते हैं उससे कहीं ज्यादा मैदानी और शहरी जीवन में व्याप्त विद्रूपताओं को। मंगलेश डबराल के नए काव्य-संग्रह ‘पानी का पत्थर’ (2023) में उनकी स्मृतियों की सघनता और पत्थर की तरलता की कविताएँ हैं। यह संग्रह उनकी मृत्यु बाद प्रकाशित हुआ। आजादी के बाद के भारत को कई रंग में देख चुके मंगलेश इस संग्रह में भी नए रंग के आजमाइश में हैं। भाषा की सरलता और बोध की तरलता से मंगलेश एक नक्शा बनाते दीखते हैं। इस संग्रह में उनकी कविताएँ जीवन के अलग-अलग समय की हैं, कुछ तो वे कविताएँ हैं जो लिखकर छोड़ दी गई, कुछ वह हैं जो लिखने की प्रक्रिया में रहीं हैं, कुछ वे कविताएँ हैं जिनमें सुधार की प्रक्रिया लगातार चलती रही है। यह संग्रह मंगलेश डबराल की रचनात्मकता को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है। उनकी दर्जन भर शीर्षक विहीन कविताएं हमें उनकी रचनाशीलता से परिचय कराती हैं। कविता को मंगलेश ‘संवेदना, मानवीय आवेग और सघनता तथा गहराई और विचलित करने वाली कोई वैचारिक भावना’ से जोड़ते हैं। इस संग्रह में उसी वैचारिक और राजनीतिक पक्षधरता को देखा जा सकता है जैसा पिछले संग्रहों में देखा गया है। मंगलेश डबराल अपने अंतिम समय में अपनी स्मृतियों को कलम देते हैं तथा अपनी नजर उस पत्थर और पानी पर ले जाते हैं जिनकी आवाज हमेशा उनके हृदय में तरलता पैदा करती रही है। उनकी स्मृतियों में कई पत्थर हैं, कभी वे सभ्यता से पत्थर का तार जोड़ते हैं, कभी घास और पत्थर के अनुराग को देखते हैं, कभी उन्हें पत्थर पानी का बना दिखाई देता है तो कहीं उस पत्थर को याद करते हैं जिससे घर बना है। उनकी सभ्यता में पत्थर कुछ इस तरह है—
पत्थर ने अपना आकार बढ़ाया और पहाड़ बन गया
ताकि लोग उसके भीतर रह सकें
इस तरह एक सभ्यता शुरू हुई
(घास और पत्थर)
हिंदी गीतों और कविताओं में पत्थर को कठोरता के प्रतीक के रूप में देखा गया है लेकिन मंगलेश डबराल पत्थर को तरल रूप में देखते हैं। मंगलेश का भाव-बोध उनके बचपन और लोक स्मृतियों से जुड़ा है। उनके लोक में पत्थर ही सर्वेसर्वा है। उन्हें प्रकृति से प्रेम है और प्रकृति पहाड़ों पर पत्थरों से जुड़ी है। मंगलेश तमाम विलुप्त होती हुई वनस्पतियों पर नजर डालते हैं, काफल के फलों को याद करते हैं जिनकी जड़ों से होकर बहता पानी मिठास से भरा होता था। इन सभी स्मृतियों के बीच उनकी नजर पत्थर पर बनी रहती थी। आज पत्थर मारने के दौर में वे पत्थर की कोमलता कुछ इस तरह देखते हैं—
पानी इस पत्थर को मुलायम बना चुका है
इस हद तक कि इसे भी पानी कह सकते हैं
ग़ौर से देखिए तो यह बहता हुआ दिखाई देगा।
(पानी का पत्थर)
इस संग्रह में मंगलेश डबराल के आंतरिक अभ्यांतिकरण की कविताएं भी देखने को मिलती हैं। भौतिक संसार की विकृतियों से उदास कवि अपने अंदर झांकता है तो वहां भी उदासी बढ़ती जाती है। यह ऐसा समय है कि लोग अपने गांव को बहुत पीछे छोड़ आए हैं और उन्हें अपने प्रियजनों से मिले वर्षों हो गए हैं। जीवन के भाग-दौड़ में तमाम घर बदलते रहे। ‘मेरी जन्मभूमि मेरी पृथ्वी’ कविता में मंगलेश अपनी मातृभूमि को याद करते हैं जहां नदिया शोक मना रहीं हैं, चिड़िया विलुप्त हो रहीं हैं, पेड़ हवा देना बंद करते रहें हैं, हवाएं खत्म हो रहीं हैं, मातृभूमि पर कोई और कब्जा कर रहा है। बाजार के शोर को कवि शंखनाथ-सिंहनाद से तुलना करता है। मंगलेश डबराल को जितनी हूक प्रकृति के स्मृतियों की उठती है उतनी ही वेदना प्रियजनों से दूर जाने से होती है—
बहुत से घर बदलने के बाद
आख़िर मैं आया एक शान्त घर में
एक जगह मैंने किताबें सजाईं
बचा-खुचा जो संगीत था उसे रखा
एक कोने से पूरे घर में जिसकी गूंज सुनाई दे
तस्वीरें टाँगी प्रियजनों की
ताकि मैं उनको भूल ना जाऊँ।
(शीर्षकहीन : दस)
महानगरों में रहते हुए किराए के तमाम घर बदलते हुए मंगलेश डबराल अपने गांव के घर को कविता का विषय बनाते हैं। उनके सपने में तमाम घर आते रहे हैं और घर की यादें भी । कहीं से लौट कर घर को आना ही जीवन की सबसे मधुर संगीत हुआ करती है। इस सूचना और प्रौद्योगिकी के समय में अफवाहों का इतना बोलबाला है कि सच का जायजा ले पाना मुश्किल है। मंगलेश लिखते हैं कि “अफवाहों के पीछे उड़ता हुआ देश/ अचानक एक सामयिक पोस्टर होकर/हवा में हिल रहा है।” इस पूंजीवादी सभ्यता में घर छीने जा रहे हैं, आए दिन घरों पर बुलडोजर चला दिए जा रहे हैं, तो कवि की चिंता जायज ही है कि कब कोई आए और घर को हड़प ले जाए। मंगलेश डबराल यह लिखते हुए ‘उनका कहा हुआ सच निकला कि एक दिन सब खत्म हो जाएगा’ तमाम चीजों का जिक्र करते हैं। उनकी यादों में जो सबसे करीब है, वह अकेलापन, अंधकार, हर जगह एक सी चट्टानें, एक सी धुंध, एक सी खामोशी नहीं, वह है सूर्यास्त की छाया, ढेर सारा कोहरा, काठ की संदूक और तमाम यादें। वे बेघर होने के डर को व्यक्त करते हैं—
पिता एक दिन घर को ताला लगाएँगे
और चल देंगे जंगलों की ओर
माँ की साँस निकल जाएगी एक दिन
लकड़ी ढोते हुए
बहने एक दिन जा चुकी होगी
ससुराल रो-पीटकर
एक दिन कुछ लोग कहीं से आएंगे
और घर में बस जाएंगे
(घर के बारे में दो कविताएं)
हिंदी कविता में भारतेंदु युग से अंधविश्वास पर चोट की गई लेकिन मंगलेश डबराल इस संग्रह में अंधविश्वासों की गहरी पड़ताल करते हैं। वे भूत बनने की प्रक्रिया के तह में जाते हैं। उसकी खोजबीन में कक्षा में सबसे पीछे बिठाया जाने वाला, गांव के पेड़ों से सेब और नाशपाती चुराकर बेचकर घर के लिए राशन ले जाने वाले लड़के की कहानी मिलती है जिसे मरने के बाद भूत बनना पड़ा। वह हमेशा का कमजोर, देवता बनते-बनते रह गया। मंगलेश ‘भूत’ कविता में व्यंग्य के सहारे देश में व्याप्त गरीबी को दिखाते हैं। भारतीय परिवेश में ओझाओ-तांत्रिकों की दहाड़ पर खेलती औरतें को तो सुना ही होगा। यह कुछ और नहीं सताई गई औरतों की अभिव्यक्ति का अपना तरीका है। मंगलेश डबराल लोक कथाओं को कविता का विषय बनाने में भी सिद्धहस्त रहे हैं। ‘चाची का भूत’ कविता में ऐसे ही भूत की पड़ताल करते हैं जिसमें यह भूत सिर्फ उन महिलाओं पर लगता है जिन्हें घर में चक्की की तरह पीसा जाता है या उनका दुख दर्द सुनाने वाला कोई नहीं होता। इस सब के कारण ‘चाची का भूत’ जन्म लेता है–
बैठी हुई चाची का बदन देर तक ऐंठता रहता साँप की तरह
भूत धमकी देता मैं दैत्य हूँ दैत्य नाम है मेरा कुचील
मैला-कुचैला मैं चट कर जाऊँगा तुम्हें और तुम्हारे ढोर-डंगर
चाची का भूत खरी-खरी सुनाता वह सब
जिसे चाची कभी कह नहीं सकती थी भूत के बस में हुए बगैर
(चाची का भूत)
यह संग्रह स्त्रियों को विद्रोही बनाता है, उन्हें उनके अधिकारों के लिए जागरूक करता है। ‘एक स्त्री के कारण एक स्त्री बची रही तुम्हारे भीतर’ पंक्तियां लिख चुके मंगलेश डबराल इस बार वे प्रेम के बदले अधिकार के साथ प्रेम मांगने वाली स्त्री की रचना करते हैं। उन्हें स्त्रियों की कायरता पर चिढ़ है। पितृसत्तात्मक समाज की तमाम खामियों को आहिस्ता-आहिस्ता झेलने वाली स्त्रियां उनकी नजर में कायर हैं। हमारे समाज की स्त्रियां अपनी स्थिति को किस्मत का रोना रोती हैं और ईश्वर से वरदान मांगती है। मंगलेश ऐसी किस्मत और वरदान को ही खारिज करते हैं—
पर मुझे उस कायर स्त्री से चिढ़ है
जो कहती है मुझे प्यार के बदले प्यार चाहिए ही नहीं
…….
मुझे उसका चेहरा बताता है वो हार मान चुकी है
कायर है वो और उस स्त्री से मुझे उतनी ही चिढ़ है जितनी कि कापुरुष से
और हाँ यदि किसी को यहाँ फाँसी हो तो उस ‘क़िस्मत’ को हो
जो स्त्री और पुरुष की क़िस्मत अलग-अलग गढ़ती है।
(कायर स्त्रियों से मुझे चिढ़ है)
लेकिन मंगलेश यह भूल जाते हैं कि यह पितृसत्तात्मक समाज स्त्रियों की उन्नति से डरता है उन्हें मुख्य धारा में आने नहीं देता है, तमाम षड्यंत्र रचता है।इस संग्रह की कविताओं में समय की बर्बरता और हत्याओं की निरंतरता का उत्कर्ष दिखाई देता है। मंगलेश की कविताएं शहर की आहत गोद की ओर ध्यान आकृष्ट कराती हैं। समय की धुंध में नकली मुखौटा पहने लोग चले जा रहे हैं, राजा की मुस्कुराहट और इतिहास को लुढ़काने की उसकी चाल फेके गए पांसे की तरह है। यह मंगलेश की कविताएं ही हैं जो इस चाल के पीछे की हँसी को प्रतिबिंबित करा रहीं हैं, फड़फड़ाते शहर की वेदना को शब्द दे रहीं हैं। इस संग्रह में हिटलर पुनर्जीवित होकर लौटा है। उसकी यौन इच्छाएं घृणा पैदा करती हैं। मंगलेश प्रतिरोध के लिए जाने जाते हैं। रोटी, कपड़ा और मकान जो जरूरी भी रहा है और प्रतिरोध ही रहा है, इसकी मांग करने वाले मारे गए, मंगलेश इसी रोटी जमीन की बात करते हैं। मंगलेश अपनी अधिकार की वस्तुएं छीन लेने के पक्षधर रहे हैं। रोटी, जमीन और कविता उनकी धरोहर है वे उसे आने वाली पीढियों को सौंपते हैं—
यह एक रोटी है
जमीन का टुकड़ा है
जिसे हम छीनकर लाए हैं
और जिस पर बन्दूक से कविता लिखी गई है
मैं तुम्हें सौंपता हूँ
संगीन की तरह
यह कविता।
(शीर्षकहीन : नौ)
आजादी भारत के लिए एक सपना थी, सुंदर सपना। आजादी के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनकर उभरा। लोगों के सपने वहीं के वहीं रहे, रोटी की भूख बढ़ती गई। जरूरी स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया नहीं हुई, लोगों के चेहरे पर भूख और बीमारी के दाग बढ़ते गए। इस संग्रह की कविताएं इशारा करतीं हैं “आजादी/ मेरे चेहरे पर/ पूरी चौबीस कीलें/ ठोक कर चली गई।” मंगलेश डबराल आजादी के बाद भारत के कई रंग देखें, लेकिन पिछले दशक से मजबूत होते फाँसीवाद को महसूसा और उभरती तानाशाही को भी देखा है। उनकी कविताओं में बढ़ती सूचना-क्रांति का वह दृश्य दिखता है जिसमें तानाशाह के मुताबिक खबरें चलती हैं। लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ कहे जाने वाली पत्रकारिता की वर्तमान दशा और दिशा भी उनकी कविताओं में देखने को मिलती है। सत्ता के मुताबिक पत्रकारिता की चाल को कुछ इस तरह दिखाते हैं “तानाशाह को पता है कि सवाल ख़बरों को लाँघकर इतिहास में चले जाते हैं। तानाशाहों को इतिहास बहुत परेशान करता है। वे ख़बरों से खुश और इतिहास से परेशान रहते हैं। इतिहास में उनके काले कारनामे हैं लोगों की कराहें और विलाप हैं क़ब्रें हैं खून के धब्बे और मारे गए लोग हैं। इसीलिए वह अकेले में इतिहास को पोंछने में लगा रहता है। ….. हमारे समय का इतिहास यह है कि इतिहास को पोंछने वाले तानाशाह लम्बे समय तक ख़बरों में बने रहते हैं। और उनकी मृत्यु के बाद उनके बड़े से परिवार के लोग भी इतिहास को पोंछने के कारोबार में लगे रहते हैं।”
इस संग्रह में मंगलेश डबराल की विश्व-दृष्टि का भी परिचय मिलता है। रूस, यूक्रेन, वियतनाम आदि तमाम देशों के युद्ध में मारे गए लोगों के प्रति उनकी संवेदना है। इनके विवरण में छर्रा बंदूक से छलनी हुई शरीर, तोप से मकान के खंडहर, सड़क पर विकलांग शरणार्थी और यहां-वहां भटकते घायल बच्चे हैं। मंगलेश युद्ध में बेचे जाने वाले हथियार और उस देश की चालबाजियों पर इशारा करते हैं—
युद्ध छेड़ने वाला मुस्कुराता है….
वह अपने हथियारों से घायल हुए लोगों के लिए नये
अस्पताल खोलने की घोषणा करता है
उसके हवाई जहाज़ जान लेने के एवज में बचे हुए लोगों के लिए
चिप्स और बिस्किट के पैकेट और बोतलबन्द पानी गिराते हैं धरती पर
ठीक उसी वक़्त
एक दूसरे जहाज से उसकी फ़ौजें उतरती हैं किसी दूसरे देश में।
(युद्ध)
इस संग्रह की कविताएं अनकहे भावों को भी लफ्ज देती हैं। मंगलेश प्रेम को बड़ी खूबसूरती से रचते हैं। लेकिन इनके प्रेम में भी क्रांति होती है। उनके यहां प्रेम देह से अलग नहीं है। “एक दिन मैं तुम्हें/चूमूँगा और चल दूँगा/ अपने रास्ते पर तुम्हारी तेईस साल की/ ख़ामोशी लेकर मैं लौट जाऊँगा उस स्वप्न में/ जहाँ से मैं आया था” इतना ही नहीं वे प्रेमियों को फटकार भी लगाते हैं। वे प्रेम में बराबरी के पक्षधर हैं। वे उन लड़कों पर तंज कसते हैं जो रसोई में सर झुकाई और मेज पर सिर टिकाई लड़की में फर्क नहीं कर पाते। मंगलेश स्त्री के प्रेम की अनुभूति इस तरह व्यक्त करते हैं—
सुनो प्रेमियों! स्त्री का प्रेम मन जीतने से शुरू होता है
देह में थोपी सभ्यता वो नहीं चाहती
वो थोड़ा सकुचाकर शुरू करती है प्रेम
विश्वास पक्का चाहती है और मग्न हो जाती है प्रेम में
(प्रेमियों)
मंगलेश डबराल जनवादी कवि रहे हैं। उनकी कविता का उद्देश्य समाज के हित में रहा है। वे समाज की तमाम विद्रूपताओं को अपने कविता का विषय बनाते हैं और काव्य में अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं वे लिखते हैं “हां क्रूर समय में रस भरी कविता मैं नहीं लिख सकता/ तुम देखो रस, छंद, अलंकारों में स्त्री का चेहरा।” इनकी भाषा बहुत सरल है, इस दौर के तमाम विकृति के लंबे-लंबे ब्यौरे के साथ उनकी कविताओं में बिंबों और प्रतीकों का नयापन देखने को मिलता है। इस संग्रह की कुछ कविताएं गद्य रूप में भी हैं।
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श्रीकृष्ण नीरज कविता और समीक्षा के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। उनकी कविताएँ पाखी, वनमाली कथा, वागर्थ , पक्षधर, आजकल, कृति बहुमत, रचना उत्सव, हाशिए की आवाज़ आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। वे मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में शोध छात्र हैं। उनसे shrikrishnahin1935@gmail.com पर बात हो सकती है।
