कविताएँ ::
गोसिया बानो
1. आजकल मैं प्रेम में हूँ
आजकल मैं प्रेम में हूँ
अपनी माँ की उन चूड़ियों के
जिनके नग झर गए हैं,
और झर गए नग के नीचे का गोंद—
भद्दा लग रहा है लोगों को।
आजकल मैं प्रेम में हूँ
अपने बाबा के उन सुफ़ेद बालों के
जिन्हें डाई करते समय नहीं रंगा जा सका उनसे,
जो बाबा के बुढ़ापे की आने वाले
लम्हों की तस्दीक़ कर रहे हैं।
आजकल मैं प्रेम में हूँ
उन अनेक पुरुषों के जो दुखी होने पर
सुबुक-सुबुक रोने लगते हैं,
रोने के लिए कोई कंधा ढूँढ़ने लगते हैं,
जो उनकी मर्दानगी पर सवाल खड़ा करता है।
आजकल मैं प्रेम में हूँ
उन औरतों के जिन्हें खाना पकाने से ज़्यादा
खाना खाना अच्छा लगता है
जो उन्हें एक बेकारियत के खेमे में डालता है।
आजकल मैं प्रेम में हूँ
उन पुरुषों के जो केवल कमाने के लिए
नहीं कमा रहे हैं!
जिनके अर्थ में शामिल है उनका शौक भी
जिसकी वजह से वो माली हैसियत में थोड़े कमतर हैं।
आजकल मैं प्रेम में हूँ
अपने से तेरह साल छोटे भाई की कहानियों के
जिसका न सिर होता है न पैर,
जिसमें मासूमियत ही पात्र है,
मासूमियत ही कथानक है,
मासूमियत ही संवाद…
जो औरों को बहुत ऊबाऊ लग सकता है।
आजकल मैं अमूमन उन सभी चीज़ों के प्रेम में हूँ
जो लोगों को नागवार गुज़रता है
जो लोगों को खार भी लग सकता है।
2. जैसे
जैसे
भँवरा बात करता है
फूलों से
जैसे
माँ गाँव की सारी हाल-ख़बर
बताती है परदेस से
कई सालों बाद लौटे
बेटे से
जैसे
एक बच्चा स्कूल के पहले दिन
कई बातें बताता है
घर आकर
अपनी माँ से
जैसे
तोता कहता रहता है
कुछ-न-कुछ
मैना से
जैसे
नव-नव प्रेमी बतलाता है
ढेर सारी बातें
अपनी प्रेमिका से
ठीक वैसे ही!
तुम कुछ कहते रहो
और मैं सुनती रहूँ
चुपचाप चुप्पी साधे
जब तक तुम
सब कुछ न कह दो
3. महान दिखने के रूप
मुझे प्रेम पर बातें करना बहुत पसंद है
लेकिन प्रेम करते लोग नहीं
मुझे छुआछूत से बेपनाह नफ़रत है
लेकिन मेरे चाय पीने का कप और घर आए किसी दलित का कप एक नहीं
मुझे स्त्री-विमर्श पर विचार और चर्चा करना बहुत पसंद है
लेकिन कोई स्वतंत्र और अपने मन मुताबिक़ जीने वाली स्त्री नहीं
मुझे प्रकृति में रहना बहुत पसंद है
लेकिन पर्यावरण को बचाने वाली सावधानियाँ नहीं
मुझे गाँव बहुत पसंद है
लेकिन धूल-मिट्टी नहीं
मुझे किसानी करना बहुत पसंद है
लेकिन खेतों में नहीं
(बालकनी पर होने वाली एस्थेटिक किसानी)
मुझे दूसरों की ज़िंदगी में दख़ल देना—
राय बनाना और देना दोनों ही बहुत पसंद है
लेकिन ख़ुद के लिए नहीं
क्या करूँ!
मुझे बस महान दिखना पसंद है
महान होना नहीं।
4. भ्रामक मान्यता
हम मुसलमान बच्चों को बताया जाता रहा
कि हिंदू हमें खाने में गाय का मूत मिलाकर देते हैं
हमारे हिंदू दोस्तों को भी कुछ ऐसा ही भ्रम रहा
कि हम मुसलमान खाने में थूक मिलाकर देते हैं
एक दिन हमने एक-दूसरे से पूछा
क्या सच में है ऐसा?
हमारा एक-दूसरे को उत्तर था—
अरे!
ना-ना!!
फिर हमने एक-दूसरे का खाना खाया
और इनकी भ्रामक मान्यताओं पर हमने
थूककर मूत दिया…
5. समय परिधि के इतर
जब सारे फूल
उठा लिए जाएँगें
और धरती पर नही होंगे एक भी फूल
मैं उस दिन लाऊँगी
तुम्हारे लिए फूलों का गुलदस्ता
जब क़लम जकड़ी होगी
सत्ता की हथकड़ियों में
और स्याही को बंद कर दिया जाएगा
ताबूत में,
मैं उस दिन लिखूँगी
तुम्हारे लिए एक लयात्मक कविता
जब घर से
निकलने की होगी सख़्त मनाही
और सबको घर बंद कर दिया जाएगा
मैं उस दिन आऊँगी
तुमसे मिलने के लिए बेपरवाह
जब समय होगा
प्रेम के विपरीत
और नफ़रत करना सब पर होगा लाज़िम
मैं उस दिन करूँगी
तुमसे प्रेम
जिस दिन
संभावनाएँ न हो—
न मिलने की,
न बिछड़ने की
उसी दिन मिलना है मुझे।
6. घोषणापत्र
कल जा रही थी मंदिर के रास्ते
कि आँख मिल गई उससे
एक कौंध सी फूटी जैसे किरण कोंपल अंकुआया फूल सा हिये में
ये धूप, ये फूल, ये संगीत, सब सही,
पर क्या उधर भी?
लगती थी मिट्टी सौंधी,
सींची थी जल के छींटों से,
थी कोई किरण गिरती हुई मन के दर्पण पर?
था कोई मन जो ठहरे तान पर इकटक?
सोचकर शांत!
क्या कहूँ?, क्या जानूँ?
सहमा अनखिला फूल,
सिमट गई धूप,
टूटी तान, लगा मिलन से पहले ही
विलग हो गया रस्ता!
7. एक अच्छी कविता न लिख पाने का दुख
सुबुकते हुए काग़ज़ पर
जैसे ही स्याही ख़ुद को बिखेरती है
वो बह जाती है
उस अनंत आकाश की ओर
उसी आकाश की पीठ पर
लिख जाती है ख़ुद-ब-ख़ुद
एक अच्छी कविता
जिसे फिर से नीचे लाना
अपराध लगता है
उड़ते हुए शब्दों को
काग़ज के कारावास में क़ैद करने की इच्छा
अपराधबोध से भर देती है मन को
चूँकि मेरे पास नहीं हैं मेरे पसंदीदा शब्द
तो एक अच्छी कविता लिखने में
हर बार चूक जाती हूँ
एक दिन पिता की शर्ट पर
बटन टाँकते वक़्त अचानक से उभरी थी
एक अच्छी कविता
जिसे मैंने पिता की शर्ट पर ही
धागे में पिरोकर, सुई से टाँक दिया था
मन में वो अचानक से उभरी
एक अच्छी कविता
अलग ही जतन करके पिता के शर्ट पर टँक गई
और मेरे हाथ आते-आते रह गई
एक अच्छी कविता
सूरज की चिलचिलाती किरणें आँखों पर पसर गईं थीं
एक राहगीर बड़ी रफ़्तार में चला जा रहा था
अपने मरकज़ की ओर
मुझे लगा आज तो टपक ही जायेगी आँखों से
एक अच्छी कविता
लेकिन वो पहर भी मेरे ख़िलाफ था
जिसने सब कुछ भाव शून्य कर दिया
भावों की शून्यता में भी बहुत चाहा
कि टपक ही जाए आँखों से आज
एक अच्छी कविता
लेकिन नहीं टपकी…
एक अच्छी कविता
मुझे यक़ीन है
तुम्हारी कंजी आँखों की पुतलियों में,
या
तुम्हारी मुस्कुराहटों के घरौंदे में छुपी है मेरी
एक अच्छी कविता
‘एक अच्छी कविता’ को
तुम्हारी कंजी आँखों की पुतलियों में,
तुम्हारी मुस्कुराहटों के घरौंदें में
ढूँढते समय शायद
चली जाएगी तुम्हारी दीद
और ढह जाएँगें तुम्हारे मुस्कुराहटों के घरौंदें
महज़ इसी कारण से बचती हूँ पाने से
एक अच्छी कविता
अब संपादक को ख़ुश करने और छपने की
लालसा में तो
नहीं नोंच सकती अपने पिता के शर्ट का वो बटन
जिसमें ‘एक अच्छी कविता’ टाँक दी थी
क्योंकि उस बटन के टूट जाने से
मेरी साँसों के टूट जाने का ख़तरा है
न ही सुआरत कर सकती हूँ तुम्हारी दीद
तुम्हारे मुस्कुराहटों के घरौंदें तो
बिल्कुल भी नहीं सकती ढहा
क्योंकि इन्हीं के सहारे तो मनाते आई हूँ
कई सालों से,
दीवाली और ईद
इसी क्रम में शायद मेरे हाथ
नहीं आ सकेगी कभी भी
एक अच्छी कविता !
8. लूँगड़ियाँ और नाना
(सहेली लता मीना के लिए)
मेरी सहेली बताती थी
मैं अपने नाना से वैसे ही करती हूँ प्रेम
जैसे मेरे गाँव की औरतें करती हैं प्रेम
रंग-बिरंगी लूँगड़ियों से।
लूँगड़ियाँ हैं,
गाँव में लूँगड़ियों से प्रेम करती औरतें हैं,
लेकिन अब नाना नहीं हैं,
अब लूँगड़ियों का नाता प्रेम से,
ख़त्म हो चुकने के साथ,
विषाद से जुड़ने का समय है।
9. अम्मी और धरती
वसंत के आते ही धरती
फूलों पर रंगत बिखेर देती है
जैसे रमज़ान के आते ही अम्मी
सीनीपोश निकाल देती हैं
इसलिए मुझे,
रमज़ान और वसंत में,
अम्मी और धरती में,
कोई फर्क़ नज़र नहीं आता…
10. माँ मज़दूर औरत है
मेरी माँ किसी शादी की
महफ़िल में बैठी रहती हैं जब
तो लोग उन्हें महंगे पोशाक और
ज़ेवर पहनने के कारण,
ग्राम पंचायत के चुनावों में
उम्मीदवार होने के कारण (जो केवल नाममात्र तक ही सीमित है)
और पिता की हैसियत से
मालिक औरत है, कहते थे
जबकि मैंने माँ को
मालिक होते हुए नहीं देखा
और देखा रातों को कोठरी पर
लालटेन के उजाले में ओपले बनाते हुए
सरसों और राई की पकी फ़सल को पीटते हुए
धान को धनकुट्टी में डालकर
चावल निकालते हुए
गेहूँ को जाँता पर पीसकर
आटा निकालते हुए
दालों को चकिया पर दरते हुए
पछोर-फटक कर अनाज साफ़ करते हुए
सालभर फ़सल की बीज जुहारते-सहेजते हुए
आँधी आने पर तिरपाल ढूँढ़ते हुए
क्योंकि उन्होंने दहलीज़ के अंदर
किए हैं ये सारे काम
बीघा भर ज़मीन की फ़सल
आँगन में पीटा है
और दहलीज़ के बाहर गईं सलीके से
इसी भ्रम में लोग उन्हें
“मालिक औरत” समझते हैं
लेकिन माँ मज़बूर औरत है
और आज भी वो मज़दूर औरत है
आख़िर ये लोग!
माँ को ‘मालिक औरत’ कहने के बजाय
‘पर्दे की किसान औरत है’
क्यों नहीं कहते ?
गोसिया बानो (जन्म: 23 अक्टूबर 2003) हिंदी की नई पीढ़ी से संबद्ध कवयित्री हैं। वे अमेठी, उत्तर प्रदेश की रहनेवाली हैं और वर्तमान में हिंदी परास्नातक (दिल्ली विश्वविद्यालय) की छात्रा हैं। उनकी रचनाएँ पूर्व में सदानीरा पर प्रकाशित हो चुकी हैं। उनसे gosiyabano34@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।
