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नैतिक

हमें हमेशा से ये बताया गया है की एक वक्त पर एक ही चीज़ सही हो सकती है। और अगर एक सही है तो दूसरी का गलत होना लाज़मी है, ज़रूरी है। पर यह बात उन दिनों की है जब नैतिकता का सृजन हो रहा था और समाज को अपने नैतिक मूल्य सेट करने थे। उस वक्त विकेन्द्रीकरण या decentralization (सत्य का post-modernist रूप) की कोई कल्पना नहीं थी। एक समय पर एक ही सत्य हो सकता था। पर आज एक साथ दो सत्य हमारे सामने मौजूद हैं। शाह का शासन क्रूर था, और उसके जाने से शायद ईरान आज़ाद हुआ (सांकेतिक रूप से यही नैरेटिव चला)। और शाह को मारने वाली पश्चिमी ताकतें क्रूर हैं और शाह के जाने से ईरान ग़ुलाम हुआ। आज ये दोनों विरोधाभासी बातें एक साथ सत्य हैं। प्रथम विश्व युद्ध ने दुनिया से आवाज़ छीन कर उसे सिसकियों में तब्दील कर दिया था—

“This is the way the world ends/Not with a bang but a whimper” (टी. एस. ईलियट, 1925)

इतने बड़े स्केल का वाइलेन्स दुनिया (कम से कम पश्चिमी दुनिया) ने कभी नहीं देखा था। पर द्वितीय विश्वयुद्ध ने हिंसा का प्रारूप सदा के लिए बदल दिया। हिटलर ने दुनिया को वाइलेन्स को normalize करना सिखाया, जहाँ हिंसा तड़के किसी शॉक की तरह नहीं आती, बल्कि हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी बन जाती है। यहाँ तक कि हम क्रूरतम हिंसाओं को नैतिक मूल्यों जैसे न्याय, राष्ट्रवाद, धर्म आदि का चोला पहना कर न्यायसंगत करार दे सकते हैं।

कायदे से पचास साल के अंतराल पर एक और युद्ध होना था जिसे क्रूरता और इंसानियत के तमाम मायने बदल देने थे– जहाँ से या तो हम क्रूरता की और हदें पार कर दुनिया खत्म कर देते या फिर एक शांत, हिंसा–मुक्त समाज बनाने की ओर अग्रसर होते। पर कोई तीसरा विश्वव्यापी युद्ध नहीं हुआ। लेकिन अगर मैं कहूँ कि वो तीसरा विश्व युद्ध तकरीबन तीन दशक पहले ही शुरू हो चुका है, जिसकी नींव द्वितीय विश्वयुद्ध के समझौतों की टेबल पर रख दी गई थी और जिसका परिणाम हम आज देख रहे हैं, तो?

1990 की शुरुआत में सोवियत संघ टूट चुका था। बाज़ारवाद और पूंजीवाद (capitalism) का आधिकारिक शत्रू दुनिया से खत्म हो चला था। 1945 के बाद से ही दुनिया सैन्य गुटों में बँटना शुरू हो चुकी थी—नाटो और वारसा उनमें सबसे मुखर नाम हैं। इन नए धड़ों ने दुनिया भर में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया था। हिरोशिमा के बाद इन्हें इतना तो समझ आ गया था कि अब सैन्य-स्तर पर विश्वव्यापी युद्ध बड़े से बड़े ताकतवर देश के लिए भी घातक साबित होने वाला है। तो नए युद्ध दूसरे जहानों में शिफ्ट कर दिए गए। ये युद्ध अब बाज़ार, स्पेस टेक्नोलॉजी, हथियारों के उत्पादन और उनके प्रदर्शन, सैटेलाइट और संचार पर नियंत्रण की दुनिया में होने लगे। इन धड़ों में शामिल कुछ देशों ने भूखे-नंगे रह कर भी हथियार, स्पेस, और संचार पर निवेश करना चुना (और कुछ ने मजबूरन चुना)। अंतत: इस अंधी दौड़ में उसे हारना था जो बाज़ार की निर्मम शर्तों से समझौता नहीं करेगा। वही हुआ। बाज़ारवाद का शत्रू हारा, जो खुद भी अपनी भूखी जनता को दाना छोड़ हथियार और लैब पकड़ा रहा था। दुनिया ने तानाशाही के अंत का जश्न भी मनाया।

तानाशाही हार गई। पर दुनिया की क्रूरतम व्यवस्थाओं में एक, बाज़ारवाद इस युद्ध में जीत चुका था। एक तरफ़ उसने अफ़ग़ानिस्तान में मज़हबी उन्मादियों को नए युग का राजा बना दिया, वहीं दूसरी तरफ़ अरब देशों को मज़हबी उन्मादी करार देकर उन्हें वैश्विक खलनायक बना दिया, जिसे दुनिया की कोई भी बड़ी ताकत (अमरीका, इज़राइल, रूस) कभी भी अपना playing ground समझ कर वहाँ खेलने आ सकती है, कभी दोस्ती के नाते, तो कभी दुश्मनी के। अब आलम है कि अरब के कुछ देशों की हैसियत इतनी भर समेट दी गई कि अब वो बस चंद पश्चिमी देशों के खिलौने भर हैं।

इसके इतर जिस तीसरे विश्व युद्ध की मैं बात कर रहा था, पश्चिम ने उसे एक euphemism दिया- “Globalization” या “वैश्वीकरण’ जहाँ अमेरिका और उसके दोस्तों ने फिर से “white man’s burden” उठाया कि अब दुनिया को हम एक “Global Village” बनाएँगे। 1991 में भारत ने भी इसका स्वागत किया। जैसे आर्थिक हालात थे, शायद उस वक्त इसे अपनाए बगैर रहा भी नहीं जा सकता था। विदेशी निवेश, कॉल सेंटर बूम, ब्रांडस, शोरूम और मिडिल क्लास का विस्तार। साइबर कैफै, कलर टीवी और मोबाइल फ़ोन। साथ ही साथ मजदूरों का पलायन, आदिवासियों की ज़मीन, नदियों का प्रदूषण, हवा में ज़हर, अस्मितावाद और राजनीतिक अशान्ति। ये तीसरा विश्वयुद्ध शुरू से पश्चिम ही जीतता रहा क्योंकि सारी गोटियाँ उसने ही सेट की थीं। वैश्विक सैन्य लड़ाई वो पहले जीत चुका था, अब दोस्ती और उदारवाद (liberalism) के नाम पर उसने फिर से एक औपनिवेशिक परियोजना (Imperial project) शुरू किया जिससे ग्लोबल साउथ और पूर्व के तमाम बाज़ार, निवेश और संचार, टेक्नोलॉजी, इत्यादि पर कब्ज़ा जमाया जा सके।

ठीक उसी क्रम में, ईरान पर व्यापारिक बैन लगा कर पहले उसकी अर्थव्यवस्था तोड़ दी गई। आसमान चढ़ती महँगाई के बीच लोग सड़कों पर आने लगे। हिजाब-विरोधी आंदोलन और महासा अमीनी की मौत ने यूँ भी एक बड़े समूह का खून उबाला हुआ था। दोनों आंदोलन साथ मिलकर खड़े हुए और ठीक वेनेज़ुएला की तरह जब अमेरिका को लगा कि देश अंदर से टूट चुका है, तब उसने गीली लकड़ी पर दे मारी कुल्हाड़ी। कुल्हाड़ी का नाम था—इज़राइल, जिसको बनाया ही गया है लॉबीबाज़ी की राजनीति दुरुस्त करने के लिए।

तो क्या हमें पूरी तरह से ये नहीं मान लेना चाहिए कि वैश्वीकरण एक धोखा था? एक औपनिवेशिक प्रोजेक्ट जिसे इस दिन के लिए ही तैयार किया गया था कि अमेरिका उसका इस्तेमाल कर पूर्व के देशों का आयात-निर्यात निर्धारित करे, उनकी अर्थव्यवस्था को तोड़ सके, और फिर उन्हें कमज़ोर कर उन पर सैन्य कार्रवाइयाँ कर सके। और जिनपर वो सीधी सैन्य कार्रवाइयाँ नहीं कर सकता, उनको किसी न किसी रूप से अस्थिर करता रहे। क्या यही इसने इराक के साथ नहीं किया था? क्या यही वेनेज़ुएला के साथ नहीं हुआ? क्या अफ़ग़ानिस्तान में उन्मादियों को शक्ति देने का काम इन्हीं पश्चिमी ताकतों का नहीं?

क्योंकि अगर हम इस नई विश्व व्यवस्था के दीर्घकालिक परिणाम देखें, तो शक्ति का असंतुलन साफ़ दिखता है। अपनी अर्थव्यवस्थाएँ खोलने के बाद एशिया में चीन ने खुद को एक वैश्विक फैक्ट्री के रूप मे साबित किया और एक बड़ी ताकत बन कर उभरा। वहीं दूसरी ओर भारत भी खुद को नए एकोनॉमिक हब की तरह स्थापित करने की दिशा में अग्रसर हो रहा है। एशिया महादेश अपनी दो उभरती हुई शक्तियाँ देख रहा है जो अंतर्राष्ट्रीय विकेन्द्रीकरण की नींव डाल सकती हैं। मगर इससे अमेरिका की नव-औपनिवेशवादी राजनीति को गहरा धक्का लगेगा। अतः वो कभी नहीं चाहेगा कि BRICS और SAARC जैसे संगठन कभी विकसित हों। अफ़गानिस्तान को तालिबों के हवाले करने के बाद, म्यांमार और फिर बांग्लादेश का अस्थिर होना – इन सबसे सीधा फ़ायदा तो पश्चिमी लॉबी का ही दिखता है। आंतरिक अशान्ति के बावजूद, इन देशों में पश्चिम की कोई रुचि नहीं थी- ये बिल्कुल नहीं कहा जा सकता।

और पिछले कुछ दिनों से जिस तरह का आर्थिक रवैया और सनक अमेरिका भारत के प्रति दिखा रहा है, क्या ये उसी क्रम में भारत को अपनी औपनिवेशिक संपत्ति (Imperial property) बनाने की कवायद नहीं? भारतीय माल पर अचानक से काफ़ी ऊँचा टैरीफ लगाना, भारत तेल का व्यापार किससे करेगा, कितना करेगा , ये सब कुछ निर्धारित करना या अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ये दोहराना कि भारत और पाकिस्तान के आंतरिक मसलों पर उसकी लागतर पकड़ और हस्तक्षेप है- ये है globalization project का ulterior motive।

ऐसे में भारत में भी दो धड़े बँटे हुए हैं: एक जो ख़ामेनेई की मृत्यू को “शहादत” का दर्जा दे कर बिलख रहा है ,जिसमें बुर्कानशीं महिलायें भी हैं (आश्चर्य) वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे अच्छी खबर मान कर अमरीका की पीठ थपथपा रहे हैं और शहादत मनाने वालों को राष्ट्रद्रोह की नजरों से देख रहे हैं, (फिर से, आश्चर्य)। ज़ाहिर है, दोनों में किसी धड़े को मानवता और हूकूक की नहीं पड़ी है , बल्कि दोनों ही धड़े मरने वाले का मजहब देख कर अपने अपने हिस्से के दुख या सुख चिन्हित कर रहे हैं। अब एक मिनट के लिए मामले को उल्टा मान लीजिए। मानिए कि ईरान ने अमेरिका या इज़राइल पर एक बड़ा मिसाइल हमला कर दिया और अमेरिका मे बच्चियों के स्कूल पर बम गिराए। अभी जो धड़ा शाह की शहादत मना रहा है, वो इसे आज़ादी की लड़ाई मानेगा (जबकि शाह के शासन में खुद कोई आज़ादी नहीं है- अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में हिजाब-विरोधी महिलाओं के रेप और क्रूर रूप से मारने तक की रिपोर्ट है)। वहीं दूसरा धड़ा जो आज अंदर ही अंदर खुश है- वो ऐसे हमले को एक आतंकवादी घटना बताएगा। ज़ाहिर है, हमारे दौर की तमाम नैतिकताएं , हमारे तमाम values और हमारे सच और झूठ – सब कुछ महज़ identity, सिर्फ अस्मितावाद पर आधारित हो कर रुक चुके हैं।

सोशल मीडिया opinions से भरा पड़ा है। सबकी एक राय है। ऐसे में स्लोवेनियन दार्शनिक स्लेवॉय ज़ीज़ेक याद आते हैं जो कहते हैं कि संवेदनशील मामलों में हर विषय पर एक उत्तेजित, सतही एक्शन लेने के बजाय हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम कुछ न करें। ऐसा कर के हम इंसानियत का ज़्यादा भला कर पाएंगे। ठीक उसी तरह चाहिए कि हम अतिवादी टिप्पणियों से बचें और बस देखने, और समझने की कोशिश करें कि हम एक पीढ़ी के नाते इन सबसे क्या सीख सकते हैं।

वेनज़ुएला और ईरान की परिस्थितियों से पूरी दुनिया के हुक्मरान, तमाम सरकारों और संगठनों को भी इतना तो जरूर सीख लेना चाहिए कि अगर आप अपनी आवाम, अपने लोगों को नहीं सुनेंगे, उन्हें दबाएंगे और उनके साथ न्याय नहीं करेंगे, तो बाहरी ताकतों के लिए आपको बर्बाद करना आसान हो जाएगा, क्योंकि वो इसी परिस्थिति के लिए आप पर घात लगाए बैठे हैं। राष्ट्र, धर्म, विश्व, इतिहास, और संस्कृति के नाम का महिमामंडन बहुत दिनों तक नहीं चलने वाला है- अपने लोगों की असल समस्या का मानवीय इलाज करें, और अपने देशों को टूटने से बचाएं। साथ ही एशिया में प्रभावशाली होते देशों को परिपक्वता दिखानी होगी और उन्हें साथ बैठकर अपने आपसी मामलों को समझदारी से सुलझा कर एक लॉबी बनाने की कोशिश करनी चाहिए जो सिर्फ़ एशिया ही नहीं, बल्कि यूरोप के कुछ देशों को भी अमेरिकी दबाव और अमेरिकी प्रभाव का एक विकल्प दे : बाज़ार/ अर्थव्यवस्था के स्तर पर भी और अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक मंचों पर भी।

बुज़ुर्ग कह गए हैं- “संगठन में शक्ति है”।

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नैतिक भारतीय सिनेमा पर आई. आई. टी. रूड़की में शोध कर रहे हैं। शोधार्थी होने के साथ-साथ फिल्म बनाने में उनकी रुचि है। वे सिनेमा, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और देशज संस्कृतियों के बारे में लिखते–पढ़ते रहते हैं। उनके पूर्व प्रकाशित कार्यों के लिए यहाँ देखें : इरफ़ान, दूब और दोस्तोएवस्की | व्यक्ति नहीं व्यवस्था का दस्तावेज़

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