अपने-अपने वक्त पर सभी चले जाएँगे

कविताएँ ::
अमन त्रिपाठी

1.

नगरपालिका चुनाव का वोट मांगने
विधायक की सुंदर तन्वंगी बहू का
घर में जब उल्लसित उमंगित प्रवेश हुआ
उसकी हँसी से आंदोलित होकर
घर की स्त्रियाँ यूँ खड़ी हो गईं मानो
अपने ही बीच के मनुष्य का उनको
इतनी ऊंचाई पर छुआ जाना
नागवार लग रहा हो और ईर्ष्या ने
उनको सीधा खड़ा कर दिया हो या फिर
वे एक प्रसन्न कौतूहल से उस दुष्प्राप्य आदर्श को
ज़रा-सा निहार पाने की अदम्य आकांक्षा लेकर
एक कोने में खड़ी हो गई हों

2. एक क्षण की याद

कैसे करूँगा अपनी ईमानदार लेकिन
कटु उक्तियों का प्रायश्चित

अपने-अपने वक्त पर सभी चले जाएँगे मैं भी चला जाऊँगा
पिता देखेंगे पास आते हुए बहनें देखेंगी दूर जाती हुई
माँ साथ खड़ी रहेगी सबको देखेगी
घर के बुज़ुर्ग नहीं देखेंगे वे इंतज़ार करेंगे
सभी एक-दूसरे के जाने की प्रतीक्षा में हैं
ऐन इसी वक्त मुझे याद आएँगी अपनी कटूक्तियाँ जिन्हें मैंने इस अहंकार में बोला था कि यह क्षण
यहीं रुक जाने वाला है
कोई कहीं नहीं जाने वाला है
मेरे वाक्-कौशल और तीक्ष्णता का साक्षी यह क्षण
कहाँ जाएगा मेरी इच्छा के विरुद्ध लेकिन अब देखो
इस क्षण को जैसे तैसे बिताता हुआ
सोचता हूँ
अच्छा हुआ वह क्षण बीत गया
अच्छा हो यह क्षण भी जल्दी बीते
पिता को आता हुआ देखूँ
बहनों को दूर जाते हुए देखता हुआ देखूँ
और सबके एक-न-एक दिन चले जाने की याद को
देखूँ याद में गर्क होता हुआ

कैसा है जीवन
हाय!
पश्चातापों का मेला

3. बन्नी कर लो आज सिंगार बन्ना तुझे ब्याहन आएगा

तुमने कहा कि ब्याह की सबसे बड़ी ख़ुशी
तुम्हें यह है
कि तुम्हें यहाँ से किसी दूसरी जगह
जाने का अवसर मिलेगा

इससे सच्ची बात
इस घर में तुम नहीं कह सकती थी

तुम पता नहीं जानती या नहीं
बाहर का संसार केवल सदिच्छाओं में सुखी है
वहाँ पर भी आते ही हैं
मृत्यु, अवसाद और विलाप के मौसम

तुम पता नहीं जानती हो या नहीं
इससे झूठी बात अभी
मैं नहीं कह सकता

वहाँ पिता भी हैं भाई भी
बहन भी माई भी
एक विस्तृत संसार भी
जहाँ जाने की इच्छा तुमने कभी की नहीं
बस एक अमूर्त दूर रहा तुम्हारी इच्छा

तो सहानों से उकताना करो बंद
और कर लो सिंगार पूरे मन से
सँवर कर जाओ
और कभी-कभी लौट भी आओ
बहुत ऊँची दीवारों वाले इस घर में
अच्छा?

4. प्यार करने में असमर्थ

बचपन ज़रूर कुछ कटु रहा
बाद के जीवन में भी दुनिया और लोग अपनी
क्रूरताओं के साथ
लगातार उपस्थित रहे ही हैं
लेकिन यह जीवन प्यार से रिक्त रहा हो अबतक
ऐसा भी नहीं

अभी-भी जीवन में वर्तमान हैं नदियों को हर सुबह हर शाम यूँ ही निहार आने वाले
हर फिरके के असहाय लोग
अत्यंत भ्रष्ट और मूर्ख विधायक नदी को या नदी के सिल्ट को देखकर हाथ जोड़ता है या अफसोस के साथ कुछ बुदबुदाता है,
जिसका वे कुछ नहीं कर सकते जो करेगा ईश्वर करेगा ऐसा मानने वाले भले लोग

अब उसे प्यार कहूँ दूरदर्शिता कहूँ एक वृहत्तर कन्सर्न कहूँ कि अधिकारी या‌ बड़े आदमी एक पुराना तालाब तो क्रमशः पाट देते हैं लेकिन अफसोस के साथ
और प्रतिबद्धता के साथ एक नया तालाब एक‌ नया मॉल‌ एक नयी सड़क सड़क के किनारे नये पेड़ नयी बेंचें नयी सुंदरताएँ आदि की क़सम उठाते हैं

हेंहें कहकर‌ लोग विरोध जताते हैं
विकास के पक्ष में लोलुप मुंडी हिलाते हैं

पर इस प्रसंग में ऐसा सामान्यीकरण नहीं होगा कि दुनिया में सिर्फ दो लोग हैं अफसर और हम
और भी लोग होंगे
जीवन को भरने के बारे में जिनके प्यार की चर्चा की जाती रही है

संसार में जो कुछ भी घटता है उसमें अंततः कुछ अच्छा ही होने को है
और सारे लोगों की हर तरह की बातों में और कामों में अंततः प्यार और लगाव का ही हाथ है
ऐसा मानने वाली सकारात्मकता की सनातन भारतीयता
मेरे‌ पहलू से उठकर किधर चली जाती है आजकल
मैं घबराकर उसे लोगों जानवरों वृक्षों और नदियों में खोजने लगता हूँ

जो लोग बहुत क्रूर रहे और आत्मा पर जिनकी क्रूरता के कभी न भरने वाले घाव हैं
वे जीवन-व्यापार में अत्यंत असहाय और उनकी सीखें अक्सर मुश्किलों से उबारने वाली
नितांत साधारण और खीझ दिलाने वाले लद्धड़ लोग और हिन्दी में प्रचलित प्रेम के सिद्धांतों के हिसाब से अत्यंत शुष्क लोग दरअसल इतने पके और मीठे और मुलायम फल हैं
कि उन सिद्धांतों में उनकी समाई नहीं है
प्रेम कविताओं से बाहर के यह लोग
बिना कुछ साबित करने की लालसा के
और साबित करने की महत्वाकांक्षी संभावनाओं से अपरिचित लोग
नदियों को निहार आएँगे विधायक को गरियाएँगे
कभी तालाब का पाटा जाना देखकर असहायता से
सामने मुस्कुराएँगे पीछे रोएँगे
पेड़ को देखकर आश्वस्त होंगे जानवरों को कभी नहीं मारेंगे
और प्यार का नाम सुनकर
उसे करने में अपने आप को मानेंगे सर्वथा असमर्थ

•••

अमन त्रिपाठी हिंदी के चर्चित युवा कवि हैं। उनसे laughingaman.0@gmail.com पर बात हो सकती है। इंद्रधनुष पर उनके पूर्व-प्रकाशित कार्य के लिए यहाँ देखें : तुम बहुत वर्षों की मेरी पृथ्वी

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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