उद्धरण : टॉम स्टॉपर्ड
अनुवाद, चयन और प्रस्तुति : राकेश कुमार मिश्र

टॉम स्टॉपर्ड [जन्म : टोमाश स्ट्राउसलर, 3 जुलाई 1937 – 29 नवम्बर 2025] एक चेक और अंग्रेज़ी नाटककार तथा पटकथा-लेखक थे। उन्होंने फ़िल्म, रेडियो, रंगमंच और टेलीविज़न—सभी माध्यमों के लिए लिखा, परंतु वे विशेष रूप से अपने नाटकों के लिए प्रसिद्ध हुए। उनके नाटकों में मानवाधिकार, सेंसरशिप और राजनीतिक स्वतंत्रता जैसे विषय प्रमुख रहे, और वे अक्सर समाज की गहरे दार्शनिक आधार-भूमियों की पड़ताल करते थे। रॉयल नेशनल थिएटर के नाटककार के रूप में स्टॉपर्ड अपने समय के सबसे अधिक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेले जाने वाले नाटककारों में से एक थे, और उनकी तुलना आलोचकों ने विलियम शेक्सपीयर तथा जॉर्ज बर्नार्ड शॉ से की। उन्हें 1997 में इंग्लैंड के राजशाही परिवार की वंशज क्वीन एलिज़ाबेथ द्वितीय द्वारा रंगमंच में योगदान के लिए नाइट की उपाधि दी गई, और 2000 में ऑर्डर ऑफ मेरिट प्रदान किया गया।

चेकोस्लोवाकिया में जन्मे स्टॉपर्ड एक यहूदी शरणार्थी के रूप में नाज़ी कब्ज़े के खतरे से निकले और 1946 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वे अपने परिवार के साथ इंग्लैंड में बस गए। टॉम स्टॉपर्ड का जुड़ाव भारत से भी रहा है। उन्होंने तीन वर्ष (1943–1946) भारत के दार्जिलिंग में एक आवासीय विद्यालय में बिताए थे। नॉटिंघम और यॉर्कशायर के विद्यालयों में शिक्षा लेने के बाद स्टॉपर्ड पत्रकार बने, फिर रंगमंच समीक्षक और अंततः 1960 में एक नाटककार।

स्टॉपर्ड के प्रमुख नाटकों में रोज़ेनक्रैंट्ज़ एंड गिल्डेनस्टर्न आर डेड (1966), जम्पर्स (1972), ट्रैवेस्टीज़ (1974), नाइट एंड डे (1978), द रियल थिंग (1982), आर्केडिया (1993), द इन्वेंशन ऑफ़ लव (1997), द कोस्ट ऑफ़ यूटोपिया (2002), रॉक ‘एन’ रोल (2006) और लिओपोल्डस्टाट (2020) शामिल हैं। उन्होंने ब्राज़ील (1985), एम्पायर ऑफ़ द सन (1987), द रशिया हाउस (1990), बिली बाथगेट (1991), शेक्सपीयर इन लव (1998), एनीग्मा (2001) और अन्ना कैरेनिना (2012) जैसी फ़िल्मों की पटकथाएँ लिखीं, साथ ही BBC/HBO की सीमित श्रृंखला परेड्स एंड (2013) की पटकथा भी लिखी। उन्होंने अपनी ही रचना पर आधारित फ़िल्म रोज़ेनक्रैंट्ज़ एंड गिल्डेनस्टर्न आर डेड (1990) का निर्देशन भी किया, जिसमें गैरी ओल्डमैन और टिम रॉथ मुख्य भूमिकाओं में थे।

स्टॉपर्ड को अनेक पुरस्कार और सम्मान मिले, जिनमें शेक्सपीयर इन लव के लिए सर्वश्रेष्ठ मौलिक पटकथा का एकेडमी अवॉर्ड, तीन लॉरेंस ऑलिवियर अवॉर्ड और पाँच टोनी अवॉर्ड शामिल हैं। 2008 में द डेली टेलीग्राफ ने उन्हें “ब्रिटिश संस्कृति के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों” की सूची में 11वाँ स्थान दिया। उनका अंतिम नाटक लिओपोल्डस्टाट (2020), जो 20वीं सदी के आरंभिक वियना की यहूदी बस्ती पर आधारित है, जनवरी 2020 में विंडहैम्स थिएटर में मंचित हुआ। इसने सर्वश्रेष्ठ नए नाटक के तौर पर पहले लॉरेंस ऑलिवियर अवॉर्ड और बाद में 2023 का टोनी अवॉर्ड फॉर बेस्ट प्ले जीता।

टॉम स्टॉपर्ड उन दुर्लभ नाटककारों में से हैं, जिन्होंने भाषा, दर्शन, इतिहास और मानवीय भावनाओं को बिल्कुल नए ढंग से मंच पर रखा। उनके बचपन का विस्थापन, अलग-अलग देशों में रहना और बाद में पत्रकारिता का काम—इन सबने उनके लेखन को खास बनाया। उनके नाटकों में भाषा का अद्भुत प्रयोग और तरह-तरह के दार्शनिक–वैज्ञानिक सवाल बड़े खूबसूरत ढंग से मिलते हैं, जिससे उनका काम बौद्धिक और बेहद विशिष्ट बन जाता है। उनके शुरुआती नाटकों में भाषा का कमाल, व्यंग्य और अस्तित्व से जुड़े सवाल ज़्यादा दिखते हैं, जबकि बाद के नाटकों में राजनीति, इतिहास, निजी भावनाएँ और स्मृति पर उनकी पकड़ गहरी बनती जाती है। उनका नाटक आर्केडिया (1993) विज्ञान, गणित और कविता को खूबसूरती से जोड़ता है, जबकि लिओपोल्डस्टाट (2020) उनके अपने यहूदी अतीत और इतिहास की त्रासदी से जुड़ी एक बहुत व्यक्तिगत नाटक है। कुल मिलाकर, टॉम स्टॉपर्ड की नाटककार के तौर पर यात्रा दिखाता है कि थिएटर सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि विचार, हास्य और भावना—तीनों का संगम हो सकता है। उनकी रचनाएँ बताती हैं कि भाषा कैसे दर्शन बन जाती है, संवाद कैसे मानवीय अनुभवों की गहराई तक पहुँचते हैं, और नाटक कैसे सच और कल्पना के बीच नई जगहें खोजता है। उनकी यह पूरी यात्रा आधुनिक रंगमंच को समृद्ध करती है और उन्हें हमारे समय के सबसे नवाचारी और प्रभावशाली नाटककारों में शामिल करती है। यहाँ प्रस्तुत उद्धरण brainyquote और goodreads से लिए गए हैं।

टॉम स्टॉपर्ड

अगर तुम अपना बचपन अपने साथ लेकर चलो, तो कभी बूढ़े नहीं होगे।

थिएटर असल में आगे आने वाली मुसीबत की राह में खड़ी कई ऐसी रुकावटों की कड़ी है, जिन्हें पार करना कई बार नामुमकिन सा लगता है।

परिपक्वता के लिए उम्र एक बहुत बड़ी कीमत है जो चुकानी पड़ती है।

ज़िंदगी एक जुआ है, वो भी बहुत खराब बाज़ी के साथ—अगर ये सचमुच कोई दांव होता, तो तुम इसे कभी न लगाते।

हम अभिनेता हैं — हम आम लोगों के ठीक विपरीत होते हैं।

अपनी पूरी ज़िंदगी तुम सत्य के इतने क़रीब रहते हो कि वह तुम्हारी आँखों के कोने में एक धुँधली-सी स्थायी परछाईं बन जाता है। और जब कोई चीज़ उसे साफ़ आकार में ढकेल देती है, तो वह मानो किसी विकृत आकृति के अचानक हमले जैसा लगता है।

जनवरी 1962 में, जब मैं दो अमंचित नाटकों का लेखक था, मैंने ब्रिस्टल के विक्टोरिया रूम्स में ‘द बर्थडे पार्टी’ की एक छात्र प्रस्तुति को देखा। नाटक शुरू होने ही वाला था कि मुझे एहसास हुआ कि मेरे ठीक सामने अंग्रेज़ी रंगमंच के अत्यंत प्रभावशाली नाटककार, पटकथा लेखक और निर्देशक हैरॉल्ड पिन्टर (1930–2008) बैठे हैं।

ईमानदारी कम ही किसी को खुश करती है और अक्सर असहज कर देती है।

जहाँ से तुम निकलते हो, वहीं से किसी और जगह की शुरुआत होती है।

क्योंकि थिएटर कहानी सुनाने वाली कला है, इसलिए हमें लगता है कि नाटककार वहाँ हमसे पहले ही पहुँच चुका होगा।

काफ़ी लंबे समय तक मैं एक साथ दो बातें सोचता रहा—कि मैं सच में एक अच्छा नाटककार हूँ, और यह भी कि अगली बार जब मैं कोई नाटक लिखूँगा, तब पता चल जाएगा कि मैं बिल्कुल भी अच्छा नहीं हूँ।

मुझे ऐसा नहीं लगता कि मैं कहीं का हूँ। या यूँ कहूँ, अगर कोई जगह है, जहाँ मैं सचमुच का हूँ, तो भी मुझे महसूस नहीं होता कि मैं वहाँ हूँ।

मैं अपने भीतर झाँककर यह समझने में बिल्कुल ही कमज़ोर हूँ कि चीज़ें कैसे और क्यों चल रही हैं।

वह कहता है कि उसका लक्ष्य कविता है। कविता पर निशाना पिस्तौल से नहीं साधा जाता।

जीने का सबसे अच्छा समय वही है, जब लगभग हर वह चीज़ गलत साबित हो जाए जिसे आप सही समझते थे।

मेरा मतलब है, अगर बीथोवन बाईस साल की उम्र में किसी हवाई जहाज़ दुर्घटना में मारे गए होते, तो संगीत का इतिहास बिल्कुल अलग होता। और, बेशक, विमानन का इतिहास भी।

शब्द… वे मासूम होते हैं, निष्पक्ष, बिल्कुल सटीक—किसी चीज़ का प्रतिनिधित्व करते हुए, किसी और चीज़ का वर्णन करते हुए, किसी तीसरी का अर्थ देते हुए। इसलिए यदि आप उनकी देखभाल करें, तो आप गलतफ़हमियों और अराजकता के पार पुल बना सकते हैं। लेकिन जब उनके कोने घिस जाते हैं, तो वे फिर किसी काम के नहीं रहते…मैं नहीं मानता कि लेखक पवित्र होते हैं, लेकिन शब्द होते हैं। वे सम्मान के योग्य हैं। यदि आप सही शब्दों को सही क्रम में रख दें, तो आप दुनिया को थोड़ा-सा बदल सकते हैं, या ऐसी कविता रच सकते हैं जिसे बच्चे आपके मरने के बाद भी दोहराएँगे।

शब्द, शब्द और शब्द—बस इन्हीं के सहारे हम आगे बढ़ सकते हैं।

लोकतंत्र सिर्फ़ वोट डालने में नहीं, बल्कि गिनती में होता है।

जब हम सारे रहस्यों को पा लेंगे और सारे अर्थ खो देंगे, तब हम एक सूने किनारे पर बिल्कुल अकेले रह जाएँगे।

मैं नाटक इसलिए लिखता हूँ क्योंकि संवाद ही अपने आप का विरोध करने का सबसे सम्मानजनक तरीका है।

कला सिर्फ अपने विषय के अधीन नहीं हो सकती; यदि वह अधीन हो जाए, तो वह कला नहीं रहती—सिर्फ़ जीवनी बन जाती है।

तुम्हारी राय ही तुम्हारे लक्षण हैं।

मैं साहित्य से प्यार कर बैठा और ज़िंदगी भर उसी मोह में डूबा रहा।

जिन किताबों को मैं पढ़ना चाहता हूँ, उन्हें पढ़ने से पहले ही शायद मैं मर जाऊँगा।

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राकेश कुमार मिश्र हिंदी के कवि और गद्यकार हैं। हाल के दिनों में उन्होंने किताबों और लेखकों की विशिष्टाओं पर कई लेख भी लिखे हैं और साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना नाम बना रहे हैं। उनसे rakeshansh90@gmail.com पर बात हो सकती है।  

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