मुझमें अभी दुःख की बहुत संभावनाएं हैं

कविताएँ::
अमित तिवारी

अमित तिवारी

परिचय

मैं बहुत थोड़े से लोगों को जानता था
लेकिन बहुत सारे लोग मुझे जानते थे
यह असंतुलित दिखने वाली एक प्रचलित व्यवस्था थी
बाम की डिबिया की तरह प्रेम समय पर ढूंढे नहीं मिलता था
प्रत्यक्ष औपचारिक सम्मान ने बहुत अधिक जगह घेर ली थी
यह ज़्यादा से ज़्यादा एक घाटे का अर्थशास्त्र था
मेरी बंधी हुई तनख़्वाह में बढ़ोत्तरी
नाखून की तरह होती थी
जिसकी खरोंच अंततः मुझ पर ही लगी
मैं लगातार मध्यमवर्गीय शहरी बना हुआ था
मेरे गिरेबान में बहुत सारी रसीदें ठुंसी हुई थीं
और झाँकने के लिए केवल ज़ेब बच रही थी
नमस्कारों पर संदेह करते करते भी
लोगों से मिल आना होता ही रहा
तैरना सीखने के लिए गहरे पानी में कूदने की मूर्खता का
मैं अत्याधुनिक उदाहरण था.

उजाला

उजाले की ओर नहीं
उजाले की ओर से देखो
जहाँ वो जा रहा है
जहाँ वो नहीं जा रहा है
जहाँ उसका अँधेरे से लड़ने का दिखावा है
जहाँ वह अवरोधों से मिला लेता है हाथ
उजाले पर गर्व से देखो तो
उजाले के दर्प को भी देखना
उसके साम्राज्य का उल्लास देखो तो
देखना उसके प्रायोजक भी
जो उजाले में हैं उनको देखना
देखना जो उजाले में चले जा रहे हैं
और पीछे रख रहे हैं अँधेरा
प्रकाशमानों को अच्छे से देखना
और देखना उनसे क्या कुछ है प्रकाशित
देखना उस ओर जहाँ उजाला अलभ्य है
वहीँ से है उजाले का महात्म्य
वहीँ छिपाया जा रहा है सारा भ्रष्टाचार.

धीरज धरना प्रिय

यह जीवन को लोभी मृत्यु की नकार का आश्यर्च है
यह गहरे पानी से बचा लिये जाने के बाद की हाँफ है
अविश्वास की जकड़ छुड़ा कर बढ़ा कदम है यह
लड़खड़ाहट रहेगी, थोड़ा धीरज धरना प्रिय!
मुझमें अभी दुःख की बहुत संभावनाएं हैं
मैं अब भी साहसिक मूर्खताएं कर सकता हूँ
मेरा प्रेम चुक जाने में अभी समय है.

स्पैनिश समर

मेरी टेबल पर एक बड़ा पीला फूल रखा हुआ है
खिड़की की घास में आने लगा है भूरापन
हवा रह रह कर चल रही है
जैसे अलसाई नवयौवना की उच्छ्वास
टाइम स्पेस कन्टीन्युअम तोड़ कर निकल भागी है
मेरे सस्ते हवाइयन गिटार की धुन
ऐसे में जब सब कुछ धीमे-धीमे डोल रहा है
तुम्हारे होंठों का कम्पन कहाँ है?
ऐसे में जब तितलियाँ अपने पंख खोल रही हैं
कहाँ है फ्रिल्स वाली तुम्हारी सफ़ेद पोशाक?
हज़ारों मील और सात समुन्दर पार से भी
ये स्पैनिश समर मुझको छू-छू जा रहा है
ऐसे में तुम कहाँ हो? कहाँ है तुम्हारी लम्बी, पतली उँगलियों का स्पर्श?

●●●

अमित तिवारी हिन्दी के सुपरिचित कवि हैं. उनकी कविताएँ सभी प्रमुख पत्र पत्रिकाओं से प्रकाशित हैं.
वे व्यंग्य भी लिखते हैं जो लगातार अखबारों मे आते रहते हैं. उनसे amit.bit.it@gmail.com पर बात हो सकती है. 

 

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

1 comment