बहुत शर्म आती है

कविता ::
बहुत शर्म आती है : मुक्तिबोध
स्वर : आसिया नक़वी

बहुत शर्म आती है मैंने
खून बहाया नहीं तुम्हारे साथ
बहुत तड़पकर उठे वज्र से
गलियों के जब खेत खलिहानों के हाथ
बहुत खून था छोटी छोटी पंखुरियों में
जो शहीद हो गई किसी अनजाने कोने
कोई भी न बचे
केवल पत्थर रह गए तुम्हारे लिए अकेले रोने.
किसी एक
वीरान गाव के
भूरे अवशेषों के रखवाले बरगद के
चरण तले की धूल
मैंने मस्तक पर लगा तुम्हें जब याद किया
देखी मैंने वो सांझ
जमा था जिसके लंबे विस्तारों में
केवल मौन तुम्हारा खून!!
बहुत खून था कोमल कोमल पंखुरियों में
बूढे पीले पात में
जो हुई रक्त से लाल
खेतो खलिहानों की मिटटी
उसकी भूख प्यास
अपने अन्तर में धारण कर
जब मैंने ले-लेकर नाम पुकारा बहुत जोर से
आस पास के पहाड़ शील
से आई गूंज या आवाज़
जिसने बतलाया वह ज्वलंत इतिहास
मानव मुक्ति यास का!!
सुनकर जिसे
बहुत शर्म आती है
मैंने खून बहाया नही तुम्हारे साथ!!

●●●

आसिया नक़वी कवि हैं और हिंदी, अंग्रेजी तथा उर्दू में समान रूप से सृजनशील हैं। उनसे aaasiya.naqvi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। 

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

Add comment