अच्छा साहित्य अपने समय की सबसे तीक्ष्ण विवेचना होता है

पाठकों के नाम ख़त ::

प्रिय पाठक,

पिछले कुछ समय में इंद्रधनुष कई बड़ी चुनौतियों से जूझता रहा. कई तरह के हमले हुए और लगातार कामों में व्यवधान आते रहे. तकनीक के समय में कई बार नुक़सान पहुँचाना आसान हो जाता है -ख़ास कर ऐसे समय में जब आपकी तर्कशक्ति और आपका विवेक, भीड़तंत्र को सबसे बड़ा शत्रु लगता है. हमारे कंटेंट ने कई लोगों को परेशान तो किया ही तभी हमले हुए- यही हमारी सफलता भी है, ऐसा मुझको लगता है. लेकिन अच्छा साहित्य वही होता है जो अपने समय की सबसे तीक्ष्ण विवेचना हो – इस विचार को ध्यान में रखते हुए, अपनी विचारधारा से समझौता भी नहीं किया जा सकता. टीम इसके लिए तैयार भी थी और यह व्यक्तिगत तौर पर मेरे लिए गर्व का भी विषय है कि सदस्य फिर वहीं से शुरू करने को तत्पर रहे- जहाँ हमें ज़बरन रोक दिया गया था. हिंसा का उत्तर हिंसा नहीं हो सकती- मैं ऐसा मानता हूँ – इसमें निहित शौर्य को समझना और उसके लिए खूद को तैयार करना बड़ी बात है और हमारी जीवन यात्राओं में यह अनुभव ज़रूरी सीख की तरह शामिल हो गया है.

गांधी हमें सिखाते हैं कि जब हिंसा और उसके ढाँचे-संस्थान आप पर हमला करें तो बिना विचलन के, बिना हिंसा किए, आपको निरंतर मज़बूती से और निष्ठा से अपना काम करते रहना चाहिए. पूरी टीम पिछले तीन महीनों में यह करती रही है और एक बार फिर हम आगे बढ़ कर तमाम मुश्किलों से लोहा लेने के लिए तैयार हैं.

इस बीच इंद्रधनुष पटना में काफ़ी सक्रिय रहा. हम कुछ कविता पाठ आयोजित करवा पाए, रामकृष्ण पांडेय की जयंती में उनकी कविताओं के ज़रिए उनको याद किया और गाहे-बगाहे साहित्यिक बहसें करते रहे. इन सब के बीच रुकावटों ने हमारे हिस्से कुछ शिकायतें भी ज़रूर भेजी हैं जिन्हें हम सर-माथे लेते हुए क्षमा-प्रार्थी हैं. रास्ता केवल बेहतरी की ओर जाना चाहिए और सकारात्मक ऊर्जा के साथ ही कार्य किए जाने चाहिए. इंद्रधनुष की निर्मिति के पीछे सबसे बड़ा लक्ष्य शहर में साहित्य की बेहतरी के लिए काम करने के साथ साथ इसका अभिव्यक्ति का एक ज़रिया बन पाना भी रहा है – इतने दिनों के विराम के बाद उम्मीद है कि हमलोग पुन: इस रास्ते लौट गए हैं.
बेहतरी के जो प्रयास चल रहे हैं, व्याप्त हिंसा के ख़िलाफ़ जो युद्ध चल रहे हैं, हर तरह के भेदभाव के ख़िलाफ़ जो विमर्श स्थापित हैं, इंद्रधनुष फिर से इस काम में अपनी जगह लेकर निरंतरता से आगे बढ़े और चलता रहे, यहीं आकांक्षा और कोशिश रहेगी.

बहुत प्रेम
अंचित

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फीचर्ड तस्वीर गूगल से साभार प्रस्तुत. तस्वीर का शीर्षक है- द प्रोमिस ऑफ ए न्यू बिगनिंग.

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इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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