प्रतिसंसार::

पत्र : आदित्य शुक्ल

आदित्य शुक्ल

[प्रियम्बदा.]
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सितम्बर का महीना. एक भारी बारिश का दिन. मेरे स्कूल की बस छूट गयी है. चौराहे पर बहादुर की दुकान में मैं अकेले खड़ा हूँ.

एक सवाल जो बाबा ने मन में डाल दिया था– तुम क्या करना चाहते हो!

भारी बारिश का दिन. सड़कें पूरी गीली. सड़कों के किनारे जगह-जगह पर मेंढ़क. बीच-बीच में टर्र-टर्र की आवाज़. स्कूल की बस अब तक तो स्कूल पहुँच गयी होगी.

सितम्बर के महीने का ही एक और दिन. भारी से ज्यादा भारी बारिश का दिन. आज मैंने स्कूल बस छोड़ दिया बजाए इसके कि स्कूल बस मुझे छोड़ देती.

भारी बारिश में भीगते हुए मैं पापा की साइकिल पर उनके साथ स्कूल जा रहा हूँ. बारिश हमारे जाने की दिशा से हम पर गिर रही है. साइकिल चलाना भी मुश्किल हुआ जाता है. फिर भी पूरे जोर आजमाइश से पापा साइकिल चलाते चले जा रहे हैं. बीच–बीच में ये बताते हुए कि अच्छी पढ़ाई कितनी जरूरी है. बीच–बीच में कोई जीप, ऑटो या बस तेजी से चलते हुए हॉर्न ठोंकते हुए हमसे आगे निकल जाते. बारिश और हवा के दबाव में हम पीछे पड़ते हुए सड़क किनारे की झाड़ियों में जा टकराते और फिर किसी तरह से संभाल कर सड़क पर साइकिल ले आते तब तक कि कोई दूसरा वाहन आकर हमें पुनः उसी हालत में कर जाता.

क्या जीवन की राह भी कुछ ऐसी ही नहीं है प्रियम्बदा?

और तभी पीछे से स्कूल की बस आती है. मैं दूर आवाज़ से ही पहचान लेता हूँ बस को. बस जैसे–जैसे पास आती जाती है मैं बस की उस भीड़ में तुम्हें देखने की कोशिश करता हूँ. तुम अपनी नियमित सीट पर बैठी हो अपनी बहन के साथ. पापा कुछ कह रहे हैं और पलटकर एक निगाह बस को देखते फिर से साइकिल संभालने में लग जाते. मैं सोचता हूं काश हमारे पास एक–एक रेनकोट होता. पापा ठीक से बैठने को कहते हैं साइकिल संभालते हुए. मुझे लगता है जैसे तुमने मुझे देखा होगा. एक ओर मैं यह भी चाहता हूँ तुम मुझे देखो और दूसरी ओर यह अपमानजनक भी लगता है. साइकिल पर बैठकर स्कूल जाना. बस हमें पार करके कब की निकल गयी है और पीछे के शीशे पर पानी की बूंदे जमा हो गयी हैं. पीछे की सीट पर बैठे बच्चे अंताक्षरी खेल रहे हैं.

तुमने पलटकर नहीं देखा है.

हमें पार करने में बस को कमोबेश कुछ सेकंड ही लगे होंगे लेकिन ऐसा लगता है मानो सदियाँ बीत गयीं हो. अपमान का भी एहसास होता है. पश्चाताप भी होता है. ख़ुशी भी होती है. दुःख अपार होता है. विनोद कुमार शुक्ल अपनी एक कविता में लिखते हैं:

आदत से अधिक दुःख की बाढ़ आती है.

सितम्बर का महीना है. यूं तो अक्सर इस महीने में बारिश उतर जाती है लेकिन लोग कह रहे हैं कि इस साल हथिया लग गया है. सो अभी कुछ दिन तक बारिश होगी. बारिश के इस मौसम में जो चीज सबसे ज्यादा परेशान करती है मुझे वह है हर ओर पनैले साँपों का दिखाई देना.

और ऐसे ही एक और दिन के बाद एक और बारिश का भारी दिन बीत गया. जो अपने जाने के साथ–साथ लज्जा और अपमान की एक और खुराक दे गया.

क्या बाकी का यह पूरा जीवन इस बिल्कुल अनावश्यक घटना के आलोक में ही बीत जाएगा?

बरसों बाद मैं तुमसे पूछता हूं कि क्या तुम्हें वह दिन याद है प्रियम्बदा? ओह, तुम्हें तो उस दिन की कोई स्मृति ही नहीं है. तो क्या हमारी स्मृति कभी–कभी किसी बिल्कुल ही व्यर्थ चीज के भार में हमें दबो देती है? क्या स्मृतियाँ इतनी क्रूर होती हैं प्रियम्बदा? तुम किस स्मृति के भार में दबी हुई हो? तुम कल क्यों रो रही थी?

मेंढ़क और साँप. साँप और मेंढ़क.

कभी–कभी कोई एक साँप किसी मेंढ़क को मुंह में दबाए भागता दिख जाता है.

तुम्हें साँप से डर लगता है या मेंढ़क से?

चौराहे पर बहादुर की दुकान में मैं खड़ा हूँ. एक धूप उजाला दिन है. गाँव के सभी बच्चे स्कूल बस का इंतजार कर रहे हैं.

बस आती दिखती है. सभी बच्चे कतार बना रहे हैं बस में चढ़ने के लिए. सबको अपने–अपने सीट की फ़िक्र है. मुझे नहीं है. मैं अक्सर खड़े ही चला जाता हूँ. या कभी कभी तुम अपने सीट पर थोड़ी सी जगह दे देती हो. जहाँ मैं एक बार फिर अपमान और लज्जा के साथ किसी तरह सिकुड़ कर बैठ जाता हूँ.

विनोद कुमार शुक्ल अपनी एक कविता में बारिश के किसी दिन छाता लेकर निकलना भूल जाते हैं.

हर बात को बीते एक लम्बा, बहुत लंबा वक़्त बीत जाता है.

अहस्ताक्षरित.

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आदित्य शुक्ल कवि-गद्यकार हैं.  उनके कॉलम ‘प्रतिसंसार’ के अंतर्गत चिट्ठियों की एक श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है. उसी क्रम में यह चौथी चिट्ठी है.  ये चिट्ठियाँ प्रेयसियों को और अपने वजूद को सम्बोधित हैं – आप चाहें तो ऐसा मान सकते हैं. आदित्य से shuklaaditya48@gmail.com पर बात हो सकती है. फीचर्ड तस्वीर – एड्वर्ड मंच की पेंटिंग, आई इन आई. आरम्भ  के अन्य पत्र यहाँ से पढ़े जा सकते हैं : हल्कापन और भार | सब दृश्य रैंडम हैविदाई की भी एक रस्म होती है

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