लगभग समाप्त सफ़ेद रातों के बीच

कविताएँ ::
तनुज

ज्योति के लिए

वसंत आँखों को चुभता हुआ पार हो रहा है,
एक भारी दरार आ चुकी थी
मेरे माथे के ऊपर
तुमने फेरी थी
जिस दिन
दुनिया की सबसे मुलायम उंगलियाँ

बहुत कम उम्र में बहुत अधिक कमरा है
बहुत अधिक कमरे में
बहुत अधिक अंधेरा हैं

एक चिड़िया भून रहा हूँ तवे पर,
जो मेरी परछाईं है,
उसके गोश्त का स्वाद कैसा होगा?

त्रासदी को,
और कौन दे सकता है
सकल पदार्थ?

ख़राब कवियों से सीख

कवि खड़ा है!
कहाँ खड़ा है?
इस महानगर के सबसे ऊंचे टैरिस पर!

कवि को पता है,
सब कुछ पता है,
क्योंकि इतनी ऊंचाई तक पहुंचने के बाद
कवि को दिखते हैं
नगर के सारे यथार्थ!

“प्रधानमंत्री अपनी पत्नी से प्रेम नहीं करते!”
“किसको मिली फाँसी और कठघडे में खड़ा हो गया लोकतंत्र?”
”तुम मुझसे झूठ बोल कर किससे मिला करती हो?”

कवि को इससे अधिक भी पता होता
यदि उसके पास होती भाषा सघन
और वह उगा सकता घास का हरा
और आकाश का नीला
हर एक शब्द से,

एक सफल कविता पाठ के लिए इतना काफ़ी नहीं है;
कवि को सब कुछ का रहे इलहाम!

एक सफल कविता पाठ के लिए काफ़ी है,
पता होना उसे सब कुछ, पता होने की तमीज़ के भीतर
और न पकड़ा जाए प्रिय कवि,
किसी सुकवि की जेब काटते हुए उस महान क्षण में…

हर पाँच बीड़ी पर
एक कविता
और
आदमी बने रहने का नर्क ही है शालीनता भरा लोकतंत्र!

हर पाँच बीड़ी और एक गांजे की टान पर,
मैं रूबरू होता हूँ तुम्हारी सीमाओं से,

छत से शहर जितना-जितना होता है पास
और स्पष्ट
चाँद होता है उतना-उतना दूर…

किसी के लिए नहीं थी यह कविता

हृदय की देह हुई है आहत
गिर रहे हैं छतों से बच्चे
तुम्हारी आँखों के घने जंगल में
खो गयी हैं मेरी हरे रंग की गेंदें

सुना है हो जाता है आभास
भाषा की आत्मना का
कविता के लिए
नष्ट हो जाने के बाद

आदमी के एक कोने में सो रही हैं थपकियाँ,
नींद किसी इनकार की तरह मुँह फुलाई बैठ गईं,

उस रानी से तुम कभी मत
असहमतियाँ
करना प्रकट!

पोलर बियर के लिए

यह इन दिनों की बात है
जब हमें लगता है,
हम शहर बदल कर
अपने पुराने विलापों से, चुतियापों से,
बहुत दूर आ चुके होते हैं!

नई ऋतुओं ने, भाषा से
भारी रिश्वत लेकर
अपना ही मुँह नोंच लिया है।

अचानक रिस रही देह पर ओस
कवि का
कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती!

लगभग समाप्त सफ़ेद रातों के बीच
एक तन्हाई
मुझे
मुक्त करती है!

बेहद साधारण लगते हैं,
अपने हाथों के भीतर गूँजते तमाम हाथ
अंधेरे में भी
साथ निभाती पुरानी गलियाँ
पिता के ताने
माँ की शिकायतें
भाई से मिल रहा इंफेरिओरिटी काम्प्लेक्स
और काशी-विश्वविद्यालय-अब-तो-खुल-जाए की
आपातकालीन प्रतीक्षा इस जिले में।

हारना एक पुरानी कला है,
सुनना ध्वनियों से एक सफल सौदा है;
….
जिले की नई रंगीन दीवारें
और उसके आस-पास
सयानी हुईं पुरानी लड़कियाँ
जो सब अपने ख़राब प्रेम में जीवन बर्बाद कर रही हैं,

कोई नई महक मेहता,
माल फूँकते अपने तमाम ज़ुनूनी आशिक़ों के लिए
नए दुःख की कारण;

(उन सब ने भी
दूषित कर दिया महक को
ख़राब विशेषणों से
और
आज-कल तो
उन्हें प्रधानमंत्री के लौंडों का भी संरक्षण मिला है)

बीच इन व्यक्तिगत कुहासों के
जब अपराधबोध और मनुष्य बने रहने की
नैसर्गिक आत्मीय मांग से
बाहर निकलता हूँ तो
कोई एक तिनका भर ठेस टकराती है
इस विकल सूनेपन में
बेंच रगड़ते हुए —
उभारती हुई दो आदिम पहचानें,
सुबह के पहले दुखिया संगीत की तरह।

इस हादसे को गुजरे हुए सिर्फ़ सात साल तो हुए हैं,
डियर पोलर बियर!

तो फिर बताओ इतनी असहाय शांति में भी
तुमसे कितनी दूर भागा जा सकता है!

मैं चाहूँ तो स्मृति-हीन हो जाऊँ,
पर तुम्हारे मुँह पर रटी हुईं
इन तिथियों को
कैसे भूल सकता हूँ?

बाबू,
एक दिन
मैं साईकिल चलाना भी भूल जाऊँगा
तुम बताओ,
फिर भी अपनी पहली प्रेमिका को
कैसे भूल पाऊँगा कभी?

इंतज़ार

चंद्रमा की उम्र नहीं बढ़ती
सूर्य जलकर राख नहीं हो जाता
फिर भी अनंत काल से
वे दो गोल-मटोल प्रेमी करते रहे हैं इंतज़ार
अपने हिस्से के एकांत का
जिसके भीतर
प्रकाशित होती रही
उनकी अपनी-अपनी पृथ्वी.

प्रिय,
फिर क्यों टूटता जाता है
मेरा धीरज!

क्यों पक कर झड़ने लगते हैं
आत्मा के मस्तिष्क पर उभरे केश?

जब-जब करता हूँ तुम्हारा
इंतज़ार !

क्यों कुछ-भी-नहीं-छूटता-है  के भीतर
अनायास ही सब कुछ छूटता हुआ लगता है?

हर रोज़
मैं तुम्हारी बेवफ़ाई के झूठे किस्से गढ़ते हुए
लौट जाता हूँ काम पर..

और
उस शिला के ऊपर
जहाँ मैं बैठ कर, कर रहा होता हूँ
तुम्हारा इंतज़ार
(जहाँ हम पहली बार साथ बैठे थे कभी)
वहाँ नहीं पाती हो तुम मुझे;

तब,
किसके पास
लौट जाती हो तुम?

•••
तनुज हिन्दी कविता की नई पीढ़ी से आते हैं। वे इन दिनों बी.एच. यू. से हिन्दी में स्नातकोत्तर कर रहे हैं। तनुज खूब पढ़ते हैं, खूब लिखते हैं, खूब अनुवाद करते हैं। उन्होंने अपनी कविताओं से लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है। उनसे संपर्क करने तथा इंद्रधनुष पर पूर्व-प्रकाशित उनकी और कविताओं को पढ़ने के लिए देखें : धूल की तरह बिखरी हुई रहती है स्मृति | भूलने के लिए स्मृतियों का यातना-शिविर

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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