धूल की तरह बिखरी हुई रहती है स्मृति

कविताएँ ::
तनुज

तनुज

औदात्य

फूल मुझे जब तक मिला
मैं गंध को भूल चुका था

भाषा तक अभी पहुंचा भी नहीं
कूच कर चुके थे कालिदास

असाध्य मिर्गी के दौरे
हर एक प्रसव से पहले
बिगाड़ देते हैं
औदात्य का संतुलन

मेरा पीछा छोड़ो पितामह…

पहले मैं भूलूंगा

पहले मैं भूलूंगा तुम्हारा स्पर्श
फिर मैं भूलूंगा तुम्हारी ख़ुशबू
धीरे-धीरे भूलता जाऊंगा फिर
तुम्हारी देह की कसावट

शब्द जो तुमसे मिले मुझे
प्रिय-अप्रिय
जिसे सोचकर तैयार किया था हमने
प्रेम का यह भव्य अंतःस्थल
उसे बिखरते हुए देखूंगा मैं स्तब्ध

जब कोई हैरानी नहीं होंगी तुम्हें
और तुम खाली पाँव दिखोगी

विदा यहाँ से सदा के लिए
पतझर का कहीं एक टूटकर बिखरा पत्ता तक नहीं
जिस के चरमराने की आवाज़ भी आएगी तुम्हारे
आस-पास से…

सड़क

सब्जी ख़रीदकर
घर लौटते समय
कोहरे से लिपटी हुई
इस  सुनसान सड़क के ऊपर
कुछ देर अचेत होकर
सड़क के बारे में
क्या-क्या नहीं सोचा जा सकता है?

यह सड़क-
अधनींद की वजह से धूसर हो चुके
सपने की तरफ़ भी जा सकती है

या यह सड़क समय की देहरी
को आर-पार कर
ले जा सकती है मुझे
इतिहास में, कवियों के द्वारा ठनी गई
भूल-गलती वाले क्षण के पास

ये सड़क ले जा सकती है
मुझे उन सभी
प्रेमिकाओं के उर्वर अन्तःस्थल के भीतर
कामनाओं से आच्छादित होकर जहाँ
सुंदर वाटिकाओं में सब हो चुकी हैं परिणत

मैं मानता हूं
यह सड़क जहाँ कहीं भी जाए
किसी भी समय की तरफ़
किसी भी स्थान के  ‘गोल घेरे’ के ऊपर

काव्य-देवी से एक विनम्र प्रार्थना,
बस दिल्ली तक न जाए ये सड़क!

एक चितेरिन प्रेमिका के लिए

वह पनीली लाल लाल
गांजे के नशे में-
नशे में धुत्त तुम्हारी आंखें

फ़र्श पर फैले हुए रंग बेतरह
लिजलिजे से जैसे तुम्हारे स्पर्श
तुम्हारी देह अचेत होकर
थके हुए दिमाग के साथ
सो गई बस गल कर, मीलों दूर
मेरी देह के ऊपर

अभी तुमने मुझे नहीं बनाया
पूरा का पूरा

सुना है!
तुम एक्सप्रेशनिस्ट हो
क्रोचे के सिद्धांतों के पक्ष में खड़ी
प्रतिबद्ध चितेरिन

तुम्हारा मन अभी
किसी भी कौंध के साथ, कर सकता था प्रिय प्रवास
तुम किसी भी रंग के साथ
जाग सकती हो एक पूरी रात
या एक-एक कर कई रंगों के साथ
या एक साथ कई रंग

तुमने कहा था हर एक रंग की अलग-अलग गंध होती है
और हर गंध का अलग चरित्र
दुनिया में कुछ भी एब्सट्रेक्ट नहीं जाता

भींगी हुई तूलिका पर इस तरह फेरती हो ऊँगली
सहसा याद आता है हृदय
हृदय के सबसे खाली जगह पर
धूल की तरह बिखरी हुई रहती है स्मृति
स्मृति जहां ठंडी पड़ चुकी है
उसे सिकोड़कर, दुःख ले लेता है पूरी जगह
वहीं पर अंकित है तुम्हारा चुम्बन

इस तरह अब माना जा सकता है
दो कैनवास थे
अभिव्यक्ति में हम हुए तमाम
तुमने उस रात, मुझे सबसे अधिक उदास किया…
(तुमने उस रात मुझे सबसे अधिक प्रेम किया)

छोड़ो भी अब…मैं बनाता हूँ अब अगला जॉइंट.

“तुम नहीं समझोगे, तनुज”

“तुम भी नहीं समझोगी, आत्म-पुष्पा”

•••

तनुज हिन्दी कविता की सबसे नई पीढ़ी से आते हैं। इधर उनकी कविताएँ ध्यान खींच रही हैं। उनसे tanujkumar5399@gmail.com पर बात हो सकती है। इन्द्रधनुष पर उनके पूर्व-प्रकाशित कार्यों के लिए देखें : भूलने के लिए स्मृतियों का यातना-शिविर | मेरे होंठों पर स्वाद है परछाईयों की धूल का

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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