सबके दरवाज़े देखता हुआ

नए पत्ते::
कविताएँ :
रौशन पाठक

ढूँढती हूँ तुम में, तुमको।

जब भी तुमसे मिलता हूँ,
तुम मेरी कमीज़ पर
कुछ ढूँढती हो।
कुछ रेशे, कुछ धागे,
उलझे सवाल
और कुछ रौशनी के दाग़।

दूर बैठकर
निहारती हो मेरा चेहरा
और पास बैठे
ढूँढती हो मेरे स्वेटर में
अधबुने, टूटे, काटे गए धागे।

जैसे ढूँढती है एक बंजारिन
बारिश में सूखी लकड़ियाँ।
जैसे कुम्हारिन चुनती है
माटी से कंकर,
और बाशिंदे
पौधों से कपास।

चुनती हुई तुम, भर पेट मुस्कुराती हो।
कसकर पकड़ लेती हो हाथों को।
जैसे मेरी काली कमीज़ पर कोई दाग़ हो।
एक सुन्दर दाग़।

मेरे हाथों को पकड़ते वक्त
शायद
कहीं किसी किनारे पर
चिपक गयी होगी तुम्हारी बिन्दी
और उसे हटाने की बर्बरता में
तुम मशक्कत करती
किसी हल चलाती हुई किसान सी लगती हो।

जैसे खेतों में
खड़ी होती है धान की बालियाँ
माथे पर सफेद दूधिया मुस्कान लिए,
कास की लंबी-लंबी धारियों के बीच
लालटेन सी चमकती पुरवईया हवा
और ठंड में, जैसे अलाव पर भुनते हैं
छोटे-छोटे मिश्री आलू।

बिल्कुल उसी तरह।
सारा जहाँ पसरा होता है,
तुम्हारे उन्हीं हाथों में
फिर क्या ढूँढती हो…
क्या चुनती हो…

वो हौले मुस्काती कहती,
ढूँढती हूँ
तुममें,
तुमको।

चुनती हूँ,
छोटे-छोटे धागे,
रेत में एक मिट्टी का बुलबुला
तुम्हारी उँगलियों में
छोड़ जाती हूँ
मेरे घुंघराले, काले बाल।

हौले से बिन्दी को
लगा जाती हूँ, बालों के पीछे

तुम्हारे केश को
हाथों से सहलाते हुए
चूम लेती हूँ तुम्हारा माथा,
जैसे चूमती है एक बंजारिन
सूखी हुई लकड़ियाँ।
जैसे भर लेती है कुम्हारिन
बाहों में मिट्टी के पुतले।
और जैसे
छोड़ जाते हैं बाशिंदे
अपनी महक, अपनी खुशबू, अपना रंग
कपास के बदले।

दूर होती गली

लोहे के मोटे पोल के सामने ही मेरा घर है।
टूटी सड़कें, गड्ढे, दीवारों पर इश्तिहार की शर्तों,
और उस पोल से गुजरती
मोटी -पतली झिलमिलातीं, रौशनी की तारें,
जो कहीं -कहीं से लचक गयी हैं।
पंछियों के झूलने से, हवाओं की थर्राहटों से या फिर
किसी बदमाश बच्चे की हमजोली संग
किए गए कारनामों से।

उन तारों पर
लाल धब्बे हैं, पीक पान की।
खिड़कियों से छोड़े गए फ़व्वारों के
छतों से गिराए गए होली के रंगों के,
और दिवाली पर किए गए
गुलाबी रंग के…

मैं नहीं जानता था कि मेरी गली
इतनी रंगीन थी।
इतनी चमकदार थी, कि उसपर कविताएँ लिखी जा सके।

मुझे उसका सिर्फ पीपल का छोटा पेड़ याद था।
जो, काजल कॉस्मेटिक के गेट पर विद्यमान था।
याद था मुझे मेरी गली में बड़े-बड़े बर्तनों का गर्जना
जो शादी-दावात पर खिलखिलाते थे
केटरर् की आँखों में।
कभी-कभार दूध वाले की
चिपकी बाल्टी भी याद आती थी
जो वो मेरे किवाड़ सटे हर रविवार छोड़ जाता था,
किसी अपरिचित आवाज़ को ढूँढते हुए।

कुछ ख़ास नहीं है
मेरे मोहल्ले में।
सबके घर, घर से हैं।

दीवारें, सारी पेंट से नहीं पुतीं
किवाड़, दरवाज़ा रह गया है।
घरों के आगे नाम, वकालत की ख़ातिर है।
सूरज देरी से उगता है।
चाँद दिखते ही, रौशनी बढ़ सी जाती है छतों पर।

पसर आते हैं लोग आए दिन मेरी गलियों में
बिखर जाते हैं जमा किए हुए
सूखे पत्ते, सिगरेट का आखिरी कश, टूटी दीवारों की पपड़ियाँ
और कुत्तों द्वारा घसीट कर लाए गए
बासी भात की प्लास्टिक।

कुछ नया नहीं होता मेरे मुहल्ले में,
भारत जैसे बड़े मुल्क की
एक सिपाही प्यादे की जन्मभूमि मात्र ,
लड़ाईयाँ होती हैं, मंदिर में शाम को
झांझर बजाने को लेकर बच्चों में।
औरतों में बतकही होती है
लहसून और आलू बेचने वाले से।
बहुओं को चूड़ियाँ पहनाते हुए
उस चूड़ीवाले को गालियाँ मिलतीं हैं।
सुननी पड़ती है सौ बातें,
धब्बे, टूटे, फीके रंग, महंगे दाम और ना जाने
क्या क्या….

शाम को बैठते हैं चाय पर, कुछ गली-नेता,
टूटी हुई कुर्सियाँ लेकर।
किसी यूक्रेनियन के लिए
एक शांत जगह बनाने की बात होती है।

चिल्लाते हुए, जगा देते हैं, बिल्लियों को।
फिर नज़रें चुराए,भाग जाते हैं
किसी गली में,
दो घूंट चाय सुड़क कर,गाली देते हुए।

मगर, रहती है एक आस।
एक आशा, एक तृष्णा, लोभ
जो मेरी गली को, किसी का घर बनाती है।
एक कप चाय भर, जगह देती है।

उसी गली में, कुछ दूर
मेरा प्यार भी रहता है।
जिसे देखते हुए, मैं अपनी गली में ही
सड़क बन, पसर जाता हूँ।
हो जाता हूँ किनारे पर उगा
अरकंच का पौधा, अमर बेल की जाल, और मनी प्लांट की लटें।

फिर उसी पोल से सटे,मेरे दोस्त आवाज़ लगाते हैं
मैं उनके कंधों पर हाथ रख,
सबके दरवाज़े देखता हुआ
दूसरे हाथ से, दिनों पड़ी,
होंडा की धूल साफ करता हुआ
दूर निकल जाता हूँ, अपनी गली से।

लेकिन फिर भी, गली मुझसे
दूर नहीं होती।

•••

रौशन पाठक पटना के सबसे कम उम्र के कवियों में से हैं और यह उनके लिए कविताओं के प्रथम प्रकाशन के अवसरों में से है। उनकी कविताओं में सम्भावना दिखाई देती है पर उन्हें अभी हिंदी कविता में लम्बा रास्ता तय करना है। इंद्रधनुष उनकी यात्रा के लिए उन्हें शुभकामनाएँ प्रेषित करता है। उनसे pathakroushan2004@gmail.com पर बात हो सकती है। 

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

6 comments

  • दोनों ही कविताएँ लाज़वाब हैं। ‘दूर होती गली’ कविता में काफी महसूसियत है। ऐसे विषयों पर लिखना कवि को उत्साही तो बनाता ही है, पाठकों को भी उत्साहित कर देता है।
    इसके लिए रौशन पाठक को बधाई!

  • बहुत गूढ़ अर्थ लिए हैं रौशन पाठक की ये कविताएँ, साहित्यिक दृष्टि से काफी सराहना मिलेगी! कलम की धार बहती रहे…