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कविताएँ: सत्यव्रत रजक

भूखे बच्चे का कथन

है एक परछाईं रोटियों पर
उभर रही है
गिट्टी डालते मजूर के बच्चे से
टकराती है तमाचे की तरह

बच्चा चिल्लाता है :
“भूख चुप रहने की क्रिया नहीं है
शोर भूख की संज्ञा है

मामूली नहीं है
भूखे की तरह मरो
कि मरो पानी-पानी पीते हुए
मामूली नहीं है

मामूली होना
मामूली नहीं है!”

मुक्तिबोध का मुक्ति-बोध

एक मरणभत्सर्ना सी देह
समय की तीक्ष्णता में बेडौल विरक्त
स्मृति में अक्षरित स्याही की ऊँची मीमांसा में
कैद किसी मुक्त आदमी को कह रही
ये अनमुक्त आदमी
कलम, कविता, स्मृति के गुलाम का चित्र
हाथ में तीली लिए
फूँक रहा है।

बीड़ी से खींच रहा बाहर का आदमी
अंतर की जिजीविषा धुएँ में आ रही
अतीत अप्रसन्न आसन्न ये आदमी
कविताओं से थका लग रहा।

जैसे किसी कविता की मार में खुद चिक गया
यह कवि बीमारी से नहीं, कविता से पीड़ित पक रहा

ये द्वंदों में अनिमेष खड़े विभाजन को भूलने का दु:ख है
या मारे गए मौसम में बारिश चयन की चेतना?

यह ग्रसित आदमी है
आदमी में आदमी ही आदमी है
यह आदमियों से पीड़ित आदमी है
ये जला रहा है फेंफड़ों में अटी तृषा
और प्रार्थना से दूर के हलफनामें भर की गवाही।

कुछ भी हो
ये आदमी, ये कवि, ये चेतन
खुद की क्रिया से थका है।

ये मुक्तिबोध
मुक्ति-बोध की माँग में
खुद को हड़ताल में खड़ा किए खड़ा है

सुनो मुक्तिबोध!
मैं तुम्हारे चित्र पर तुम्हें मुक्त होते कम
व्यथाएँ पीते देख रहा हूँ
मैंने सही देखा न?
क्यों मुक्तिबोध?
तुम तो कविताओं में फँस गए

तुम्हारे गाल दाँतों में धँस गए
शरीर सूख गया है
आँखें गप गईं
(मलेरिया, पीलिया में चुके लग रहे
लेकिन तुम स्वस्थ हो)
(तस्वीर में मरे-मरे जिंदा चिपके हुए हो?)

तुम क्यों छटपटाहट पर लड़ रहे हो?
हे पतले आदमी
इधर बहुत लड़ाकूबाज हैं
बचो
तुम तो उमर भर लड़ते रहे
उसी से बचने के लिए लड़ रहे हो?

मिला मुक्ति-बोध?
या बस बोध मुक्ति से परे
या मुक्ति मुक्त बोध से?
ओ मुक्तिबोध!

ओह!
ओ मुक्तिबोध!
कितने मुक्त-बोध?

तुम्हें देखते हुए

सब घड़ी-घण्टे घुप मौन में
मैं तुम्हारी ओर मान्यताओं को मारकर देख रहा हूँ।

घास-धूप-धूम-धान चुपचाप
निर्जन आलाप में देख रहा हूँ
धरती की भुजाएँ रस भर देने को झुक रही हैं।

इस बीमार मौसम में
जब कि हवा देहात की ओर उड़ गई
इस अ-शहर देहली पर बैठे देस में
तुम्हें देख रहा हूँ।

मैं तुम्हारी ओर अपनी व्यंजना से परिहार्य अपनी आँख भर रहा हूँ
स्थिर देह, स्थिर अर्थ में अधीर
दुनिया गोल घूम रही है
सारी दीवारें, जँगले, किताबों के रुके रैक सरीखे।

यह मौन का सन्नाटा जहाँ सब कुछ रुका है
मैं अधीरता से आँखों में आवारा हो रहा हूँ।

जूता पक्ष

जूते के बूते पर कुचले गए युद्ध
उलीची गई त्रासदियाँ,

आजादी के अक्षत हुए अरण्य,
राजमार्ग के सत्र हुए भृत्य
जूते के बूते पर।

कहीं अधजला बुझाया गया,
ठंडी देह से खींची गई आँतें
और खड़ी की गई तथाकथित फसलों की लंतरानी
जूते के बूते पर।

द्वितीय विश्व युद्ध की सीढ़ियों पर
लड़खड़ाती रही आवाम की सल्तनत
हिटलर के पाँवों में
खड़खड़ाती रही जूतों की सतह।

कुचले गए लोग कह रहे थे—
जूता गुनहगार है
जबकि आदमी की नीयत की नग्नता से
कोई ताल्लुक नहीं था फीता बंद जूतों का।

ये जूता जात की विडंबना है
जूता बँधा था स्वामी के तलवे से
नहीं बँधा नहीं, बाँधा गया था।

और एक दिन हड़प्पा की हरियाली पर मिली

उखड़े हुए जूते की कुचली हुई जुबान
जिसे इस नाजुक गुनाह पर कुचला गया
कि उसने माँगा अपना हक
उसने माँगा अपना हक कि
परिवार पर सिले घरों,
परिस्थितियों के वज्र विघ्नों,
और भूख की तोतलाहट
का वजन भले ही आदमी उठाता है
पर आदमी को उठाता तो जूता ही है
यहीं हक माँगने की खातिर
कुचली गई उसी जूते की जुबान
जूते के बूते पर।

त्रस्त ऊब की डूब

मैं थक गया हूँ
दुनिया की सुंदरताओं से
और खोज रहा हूँ
अपने लिए एक सुरक्षाप्राय घटना
जहाँ संभवतः सुस्ताया जा सके।

मैं त्रस्त हूँ
उन व्यस्तताओं में
जो खुद में खाली कर चुकी एक
शैवालों सी हरी उम्मीद।

मैं भर गया उस ऊब से
जहाँ लाठी बूढ़े से आगे निकल जाती
जहाँ सड़क दुघर्टना इश्तहारों में जरूरत है
कि घायल की मदद के लिए ‘आदमियत’ बेताब है
दीवारों पर आईने लाद दिए गए
कि भ्रम भी भ्रमित हो जाए
पहचानते-पहचानते हुए से लोग छूट जाएँ।

मुझे चुभ रही है अलार्म घड़ी
यह नहीं कि मुझे सुबह से उससे डर लगता
डर लगता है— कभी-कभी मुझे जगाने से पहले
मुझे मुझमें जगा देती है अलार्म घड़ी
और मैं हादसे की तरह अपने अंदर एक हत्या
खर्च कर चुका होता हूँ
जब तक मैं समेटता अपने टूटतेपन को
हर चौथी चीज टूटती जाती है
हर तीसरी चीज बचाते हुए
यह नहीं कि चीजें एक पहचाना हुआ काँच हैं।

नहीं चीजें चटकी हुई छाती में धँसा साहस हैं
जो बचाते हुए टूट जाता है
कि फिर सुबह होती है फिर अलार्म छूटता है
याकि आदमी टूटता है तिल-तिल फूटता है!

सिर्फ प्रार्थनाएँ

एक चीज
घमासान पत्थर पर चटकती है
जब घण्टाघरों का शोर शांत वीभत्सता से जल रहा
जेठ के कीड़े पेड़ों पर गूँज रहे
और पृथ्वी मौन आलस से लती पड़ी है

एक आँख उठती है
जब दुनिया तमाम तरहों से थक चुकी
पेड़ों की अस्थियों में अटे उन कीड़ों की गूँज
पत्तों पर हरी प्रार्थनाओं की तरह छप रही है।

एक आँख उठती है
उस जिरह में जंग को धोने के लिए
नेपत्थ में सटे भेड़ियों की भुखमरी हालात से
और जंगल के उन पहाड़ों से टकराती है आवाज
भेड़ियों की प्रार्थनाएँ!

जब पेड़ आग से पिघल रहे
अमलतास गुलमोहर खुले जल रहे

तब वे माँगते है सिर्फ हमारा साथ
तब तिल-तिल चटकती हैं पेड़ों की प्रार्थनाएँ

सिर्फ प्रार्थनाएँ!

***
सत्यव्रत रजक जिस उम्र में जिस संवेदना और भाषा में कविताएँ लिख रहे हैं, उनको अलग से रेखांकित करने की आवश्यकता है। न सिर्फ़ उनकी कविताओं में समसामयिक सभी विमर्श आते हैं, दुनिया से जुड़ने का एक गम्भीर और निजी आग्रह वाक्य दर वाक्य उनकी कविताओं में खुलता है। उनसे contactsatyavratrajak@gmail.com पर बात हो सकती है।