कविताएँ ::
स्वप्निल श्रीवास्तव

प्रस्तुत कविताएँ इन्द्रधनुष को कवि सतीश नूतन की मार्फत प्राप्त हुई हैं। कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने उन्हें खत में लिखा है—
“कभी–कभी कविता की एकरसता को भंग करने लिये इस तरह के प्रयोग की इच्छा होती है। गांव का आदमी होने के नाते अभी जीवन में तुक बचा हुआ है— यह मेरे लिये गम्भीर काव्य–रंजन है जिससे तृप्ति मिलती है। मैं अयोध्या और मगहर के बीच का रहवासी हूँ—
मैंनें अपने गांव के जोगियों से बचपन में ही कबीर के पद सुने थे। अवध कथायें और बोली-बानी हमारे रक्त में है— उन्ही के बीच आँख खुली हैं।” 

स्वप्निल श्रीवास्तव

1.

हम सब मगहर के हैं वासी
हम हैं ताना हम हैं बाना
करघे के रंग में रंग रासी।
कपास में सूत, सूत में कपास है
जैसे गंगा के बीच है काशी।
बुनते रहे उमर भर चादर
फिर भी नहीं हुये विश्वाशी।
जब से पूंजी ब्रह्म हुई है
तब से रूह हुई है प्यासी।
यह दुनिया है भरम का खेला
कहीं नहीं कोई अविनाशी।
रंगमहल में पहुंच गये हम
लेकिन वहां पर अज़ब उदासी।

2.

अभी चिलम में आग बची है
जितना चाहो उतना खींचों
कंठ – कंठ में, राग बची हैं।
उड़ जायेगें ताल के बगुलें
इस पानी में झांग बची है।
दाग – दाग है उनकी चादर
ये चादर बेदाग बची है।
चले गये हैं बड़े गवैया
अभी गांव में फाग बची है।
सोनेवालों यह तो जानों
सघन रात में जाग बची है।

3.

चारों ओर हैं अत्याचारी
मजहब के ठेकेदार हैं
और सियासत के व्यापारी।
इनके बींच फंसी है जनता
लूट रहे हैं बारी – बारी।
बेच रहे सतरंगी सपने
वैश्विक गांव के अधिकारी।
महाराज की बात न पूंछो
वे तो झूठ के है अवतारी।
रोज प्रहसन और तकरीरे
सुनकर थक गये गगन बिहारी।
ठाट–बाट, पुष्पक विमान हैं
आसमान की सैर है न्यारी।
बाढ़ और सूखे जब आयें
चले वसूलने त्योहारी।

4.

मन चिरई तन है आकाश
दोनों हाथ पंख बने हैं
और जंगल है पास।
साधे तीर-कमान बहेलिये
उन्हें शिकार की है आस।
एक नदी है मेरे भीतर
बहती है ले करके सांस।
रेत हो गयी है दुनिया
मृगतृष्णा है हर मास।
मैं पहाड़ का पत्थर हूं
कहां है मेरा संगतराश।
चारों तरफ काठ के उल्लू
दिखते हैं वे बहुत उदास।
हंसना भूल गये विदूषक
रंगमंच में है अवकाश।
राज –पाठ उनके हिस्से में
और हमे मिला वनवास।

5.

सतगुरू निकले परम हरामी
कम्बल ओढ़कर सामिष जीमै
फिर अंगूर कय पानी।
खंडित लंगोट के साधु है
बोले वेद की बानी।
भंडारा-भंडारा डोलय
जिभचटोर हैं स्वामी।
मूर्ख भगत उनको समझे है
हैं कोई अंतरयामी।
तिरिया को छुप-छुप कर देखय
नयन किये तूफानी।
दाढ़ी पीछे शक्ल छिपाये
घूम रहे जजमानी।

6.

याद आ रही है अमराई
वे आम के गाछ रसीले
बहती मंद- मंद पुरवाई।
रिमझिम- रिमझिम बादर बरसे
भीग रही मेरी कविताई।
लड़का लड़की से पूछे है
कब हुई तेरी कुड़माई।
ताल भर गये हैं पानी से
देखो मछरी है उपराई।
हरे- भरे हैं बांस के जंगल
फुनगी- फुनगी है हरियाई।
चलो नदी के लिये नांव बनायें
उससे मांगे पार उतराई।
कोई दूर से बुला रहा है
मन आकुल है मेरे भाई।
भूले- बिसरे कितने मंजर
सोच- सोच के आंख भर आई।

7.

बना- ठना है दरबार
राजा जी सिंहासन पर हैं
दरबारी करते हुंकार।
जै- जै कार की बाणी गूंजे
युग – युग जिये बचावनहार।
चषक चषक से भिड़े हुये हैं
मुख से निकले उच्च विचार।
स्त्री विमर्श की छिड़ी रागिनी
अंग – अंग पर रस शृंगार।
अंत:पुर तो परम लोक है
रास – रंग की चले बयार।
नाभि- नाभि ढ़ूंढ़े कस्तूरी
प्रभु जी कामदेव अवतार।

8.

इस हमाम में सब हैं नंगे
हर हर गंगे , हर हर गंगे।
इधर शांति पड़ी है मुर्दा
उधर हो रहे हैं दंगे।
मानुष दिखे अमानुष जैसे
जैसे सियार हो बहुरंगे।
नजर बचा कर अमृत घूंट लो
हो जावोगे पल में चंगे।
बड़े अराजक आततायी
उनसे भारी पड़ेगे पंगे।
निकल पड़े हैं जुलूस में
देखो भाति–भाति के झंडे।

9.

जहां–जहां पर पहुंचा घोड़ा
घुड़्सवार का बजा हथौड़ा।
चरागाह पर पाया कब्जा
चरवाहो को नाथा, जोड़ा।
जिसने कभी नानुकुर की
उसको तो जीभर कर तोड़ा।
जिसने उसकी बात न मानी
उसका वंश हुआ निगोड़ा।
पांव जमें हैं रकाब पर और
हाथ में चमके कोड़ा।
बड़े-बड़ों को डंस जायेगा
विषधर है यह सांप का जोड़ा।
किसी किसी की मूंड़ी दाबी
और किसी की बाह को मोड़ा।
बटवृक्ष गमले में आये
पर्वत–पर्वत हो गये लोढ़ा ।
बड़े सूरमा हो गये पतई
कालनेमि ने किसको छोड़ा।

10.

काठ के उल्लू काठ पर बैठे
कुर्सी पर वे ठाट से बैठे।
चारों ओर घुमाते मूंड़ी
जंगल में या हाट पे बैठे।
दिन भर सोये रात में जागे
कर्मकांड के पाठ पर बैठे।
सुना रहे हैं अहम फैसला
वे पत्थर की लाट बैठे।
भक्तजनों की भीड़ लगी है
प्रवचन दे रहे खाट पर बैठे।
जगा रहे अपनी कुंडलियां
प्रभु जी है उचाट पर बैठे।

•••

स्वप्निल श्रीवास्तव जाने माने कवि हैं। उनसे 09415332326 पर संपर्क किया जा सकता है।

Categorized in:

Tagged in: