मनोहर श्याम जोशी के कुछ उद्धरण ::

  • ‘असम्भव’ के आयाम में ही होता है प्रेम-रूपी व्यायाम। जो एक-दूसरे से प्यार करते हैं वे लौकिक अर्थ में एक-दूजे के लिए बने हुए होते नहीं।
  • …गाँठ पर लगी गाँठ के लिए हिंदी में कोई शब्द नहीं।
  • प्रेम होता ही अतिवादी है।
  • सयाना-समझदार होकर प्यार, प्यार कहाँ रह पाता है!
  • प्यार एक उदास-सी चीज़ है और बहुत प्यारी-सी चीज़ है उदासी..।
  • …अकेलेपन में भी कुछ है जो नितान्त आकर्षक है, सर्वथा सुखकर है लेकिन अफसोस कि उसे पा सकना अकेले के बस का नहीं।
  • प्यार के कैमरे के दो ही फोकस हैं— प्रिय का चेहरा, और वह न हो तो ऐसा कुछ जो अनन्त दूरी पर स्थित हो।
  • जो पहला और प्रायः असम्भव सा हम करते हैं प्यार, वही मर्मान्तक रूप से अन्तिम भी होता है ?
    खतरनाक है यह विचारधारा। इससे हम एक विचित्र निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि अपना बचपन और अपनी किशोरावस्था बिता लेने तथा यौवन की पहली उठान में पहला प्यार कर लेने के बाद हम चुक जाते हैं। तबसे लेकर, चार स्वजनों द्वारा विधिवत अर्थी उठाये जाने तक, हम स्वयं अपनी लाश कन्धे पर उठाये घूमते हैं।
  • नियति लिखती है हमारी पहली कविता और जीवन-भर हम उसका ही संशोधन किये जाते हैं। और जिस बेला सदा के लिए बन्द करते हैं आँखें, उस बेला परिशोधित नहीं, वही अनगढ़ कविता नाच रही होती है हमारे स्नायुपथों पर।
  • चेहरे क्या नहीं हो सकते रे? क्या नहीं कर सकते? हजार पोत उतरवा देते हैं चेहरे लालसा के अशांत आग्नेय संसार में! किसी छोटे-से स्टेशन से किसी अंधेरी रात बैलगाड़ी पर बिठवा देते हैं वे घर से बेघर मरणासन्न मुसाफिर को। जिनके घर होते हैं उन्हें भी बेघर कर देते हैं चेहरे, उनसे भी कहते हैं मैं ही तेरा घर हूँ।
  • जीवन में क्या-क्या नहीं होता, यह जानते-समझते जिज्ञासुओं का पूरा जीवन बीत जाता है। विविध है, विचित्र है, मायावी है जीवन।
  • …प्रेम में जो भी तुम उसे लिखते हो, खुद अपने को लिखते हो।
  • सर्वत्र, सर्वदा उपस्थित लोग आवश्यकता से अधिक होते हैं। कोण बन जाते हैं। कोने चुभते हैं। दो ही रह जायें तो भी कुल उपस्थिति में एक व्यक्ति फालतू प्रतीत होता है। जब वे सोचते हैं कि हम एक क्यों नहीं हो जाते या जब उनमें से एक सोचता है कि मैं इस दूसरे में खो क्यों नहीं जाता, या मैं इस दूसरे के हित मिट क्यों नहीं जाता, तब उनमें प्रेम हो जाने की बात कही जाती है। लेकिन जब प्रेम नहीं होता तब यह दूसरा इतना चुभता है आत्मा में कि हम कहते हैं वही साक्षात नरक है।
  • प्रेम हो सकने के लिए एक स्तर पर क्षण के सहस्त्रांश की अवधि पर्याप्त है और दूसरे स्तर पर अनेकानेक कल्पों की भी अपर्याप्त।
  • व्यंग्य और ईर्ष्या का पात्र समझा जाना इस समाज में महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में मान्य हो जाने की निशानी है।
  • भक्षण प्रेम का अंतिम चरण है।
  • हृदय सबके होता है और औसत हृदय, स्वार्थ का निलय है। स्वार्थ सदा परमार्थ बोलता है। जो कहते हैं कि हम यह सब तुम्हारी भलाई के लिए कह रहे हैं, वह यह भी कह रहे होते हैं कि तुम्हारी भलाई में ही हमारी भलाई है।
  • विफल दाम्पत्य संवादहीनता को जन्म देता है। सफल दाम्पत्य संवाद की अनावश्यकता को। क्या मौन ही विवाह की चरम परिणति है?
  • मर्दाना निर्णयों पर औरतें रोती ही आयी हैं।
  • …मानवीय प्यार और मानवीय जीवन में आधारभूत बैर है।

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मनोहर श्याम जोशी (9 अगस्त 1933 – 30 मार्च 2006) हिंदी के श्रेष्ठ गद्यकार-उपन्यासकर हैं। ‘कुरु-कुरु स्वाहा…’, ‘कसप’, ‘हरिया हरक्यूलीज़ की हैरानी’, ‘क्याप’ आदि उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। उपन्यास ‘क्याप’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार (2005) से सम्मानित। यहाँ प्रस्तुत उद्धरण उपन्यास ‘कसप’ से उद्धृत हैं और यहाँ साभार प्रस्तुत हैं।

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