विस्थापन, विषाद और मछलियाँ

श्वेत रव ::

कविता : अपर्णा अनेकवर्णा

वरिष्ठ चित्रकार अखिलेश जी के आदिवासी कलाकार जनगढ़ पर लिखे आलेख को पढ़ने के बाद बहुत बेचैनी रही. उसी बेचैनी में यह सब लिखा :
मछलियाँ अपनी अन्धी आँखों से ताकती हैं
रहस्य नीले से हरा हुआ जाता है
एक कैनवास में बंध गए हैं
तृप्ति कलाकार की और उसी कलाकार का निर्वासित विषाद
शैवाल मुँह बाए ताकते हैं
अन्धी हैं हरी मछलियाँ नीले जल वाले एक फ्रेम में
उस फ्रेम के बाहर एक कमरा है
उस कमरे के बाहर एक हाता
और हाते से लगा हुआ है

एक बर्फ की पपड़ी वाला तालाब

चुप बैठे मछुआरे अपनी निर्लिप्त ऊँघ लिए
पकड़ते हैं बड़ी मुश्किल से मछलियाँ
और उन्हें पकड़ते ही वापस छोड़ देते हैं
मछुआरे जानते हैं नहीं मरेगी एक भी मछली
कल फिर आ फँसेगी उसी विवशता में
पर मछलियाँ ये कहाँ जानती हैं
हर बार का ये लगभग मर जाना
उन्हें भर देता होगा विषाद से
जो उनके विस्फारित नेत्रों में देख पाने की रौशनी
उगने ही नहीं देता

भय की नस्ल इसी तरह अन्धी पैदा होती है.

फ्रेम से बाहर वाले
और हाते के भीतर वाले उस कमरे में विषाद रहता है
रोज़ खाता है खुद को मारने वाली गोलियाँ,
एक दिन उस कलाकार को ही खा जाता है
जिसने सृष्टि के सबसे विस्थापित पलों में सबसे उदास सपने देखे थे,

जो, वो सब कहते हैं, बेहद जंगली किस्म के थे, दरअसल !

[अपर्णा अनेकवर्णा हिंदी और अंग्रेजी में लिखती हैं. उनसे aparnaanekvarna@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. फीचर में प्रयुक्त पेंटिंग गोंड कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम की हैं.]

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इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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