परमाणु बमों की होड़ के बरक्स मनुष्यता को बचाने का आह्वान

समीक्षा::
सुशील कुमार भारद्वाज

       संदर्भ:: अवधेश प्रीत का उपन्यास ‘रुई लपेटी आग’

फिलवक्त जब एक तरफ रूस-यूक्रेन के बीच लम्बे अरसे से युद्ध चल रहा है तो दूसरी तरफ चीन-ताइवान आमने–सामने की स्थिति में हैं और इस युद्धोन्माद में सम्पूर्ण विश्व गोलबंद हो रहा है. ऐसी स्थिति में कब तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ जाए या किसी सनक के पल में कोई सत्ताकांक्षी राष्ट्राध्यक्ष परमाणु शक्ति का प्रयोग कर बैठे, इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता. इससे पूर्व हम हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु शक्ति के प्रयोग से पैदा हुई भीषण मानवीय तबाही को देख चुके हैं. इस परिप्रेक्ष्य में अवधेश प्रीत का नया उपन्यास “रुई लपेटी आग” परमाणु परीक्षणों की होड़, उनसे उपजी त्रासदी और मनुष्यता के सामने उपस्थित संकट को सम्बोधित करता हुआ कहीं ज़्यादा प्रासंगिक है और विनाश बनाम सृजन के विमर्श पर ज़ोर देता है.

पोखरण की पृष्ठभूमि में परमाणु परीक्षण के जरिये मानवता के सबसे बड़े दुश्मन, परमाणु हथियारों की संहारक शक्ति की याद दिलाते हुए उपन्यास पोखरण रेंज के निकटवर्ती गांवों में उत्पन्न मानवीय संकट का जो वीभत्स चित्र प्रस्तुत करता है, वह ऐसे विस्फोटों और कथित उपलब्धियों पर प्रश्नचिन्ह लगाता है. परमाणु-परीक्षण के समय निकले विकिरण की वजह से आसपास के कई गांव गंभीर बीमारियों का शिकार हो गये हैं. इन ग्रामीणों की स्थिति यह है कि दुश्मन तो बाद में मारेगा, पहले स्वयं के परीक्षण से मर रहे हैं. पोखरण के आस-पास के इलाके के समर्थ लोग अपने गांवों से पलायन कर चुके हैं .लेकिन नि:सहाय लोग उसी अभिशप्त भूमि में अपना घर-बार, खेत-खलिहान और बची-खुची सम्पत्ति के साथ रहने को मजबूर हैं, जिनकी आँखों में न तो सुकून की नींद है, न सुकून की ज़िन्दगी.

उपन्यास परमाणु परीक्षण की डरावनी फैंटेसी से शुरू होता है और अंत एक खुशनुमा पखावज वादन के कार्यक्रम से होता है. इसी ओर छोर में बुनी उपन्यास की कथा वैज्ञानिक कल्लू उर्फ़ कलीमुद्दीन अंसारी, पखावज की विदुषी अरुंधती उर्फ़ अरु, उसकी शोध छात्रा बया और उसके दोस्त दीप के माध्यम से विस्तार पाती है. कलीमुद्दीन अंसारी के नेतृत्व में देश सफल परमाणु परीक्षण को अंज़ाम देता है, लेकिन उसके नेपथ्य में जो मानवीय संकट पैदा होता है, उसे सभी नज़रअंदाज़ करते हैं. यह उपन्यास उसी  संकट को सामने लाता है और परमाणु बमों के औचित्य को कठघरे में खड़ा करता है. इस प्रश्न के इर्द गिर्द वे बुनियादी प्रश्न भी उजागर होते हैं, जो एक गरीब मुल्क, उसकी बुनियादी ज़रूरतों और उसके हासिल-ज़मा पर सोचने को विवश करते हैं. यह उपन्यास न्यूक्लियर बमों के औचित्य और उसके बरक्स मनुष्य समाज के विनाश के ख़तरे पर विमर्श के लिए आधार प्रस्तुत करता है.

लेकिन यह उपन्यास का अगर केंद्रीय भाव है, तो कल्लू और अरु का मौन प्रेम तथा बया और दीप का अनकहा प्रेम उपन्यास के पात्रों के संबंधों को मज़बूती देता है,उदात्तता प्रदान करता है. बाबा रामरतन पखावजी और अंसारी चा के रिश्तों के माध्यम से लेखक ने समाज की बुनावट पर गहन और अंतरंग दृष्टि डाली है, जो ख़ालिस और पुरखुलूस हुआ करता था.

यह भारतीयता के उदार चरित्र का खूबसूरत चित्र है. अरुंधती पखावज की विदुषी है, परमाणु वैज्ञानिक कलीमुद्दीन अंसारी की बचपन की दोस्त है और ऐसे विस्फोटों के विरुद्ध है. यह खूबसूरत कंट्रास्ट इस उपन्यास को गति देता है और कथा में अनेक शेड्स रचता है.परमाणु के बरक्स पखावज के महत्व को उपन्यास की कथा में एक किंवदंती के ज़रिये प्रतीकित किया गया है, शिव के तांडव को लयबद्ध करने के लिए ब्रह्मा ने इसकी रचना की थी ताकि सृष्टि को विनाश से रोका जा सके.

अरुंधति के शब्दों में कहें तो, “यह एक विचित्र संयोग है कि इसी राजस्थान में नाथद्वारा है, जहाँ पखावजवादन की परम्परा समृद्ध हुई. जहाँ सृजन की जड़ें मजबूत हुई. उसी राजस्थान के इस पोखरण क्षेत्र में विनाश की व्यवस्था की गई है. परमाणु बमों का परीक्षण किया गया. जहाँ से भगवान श्रीनाथजी के मंदिर में वात्सल्य, शांति, और भक्ति की रसधार बही, उसी धरती के इस छोर पर जिन्दा लोगों को जिन्दा-जी मार देने का उपक्रम किया जाना एक भयावह विडम्बना है.” (पृष्ठ -273, अवधेश प्रीत, रुई लपेटी आग)

“रुई लपेटी आग” सामाजिक सरोकारों के बड़े सवालों के साथ-साथ शेरों, कविताओं से अनेक अनकहे को संजीदगी से व्यक्त करता है, तो पूर्वकथा,अंतर्कथा, कथान्तर, परिकथा, उपकथा, अनुकथा, एवं इतिकथा शीर्षकों के अंतर्गत पूरे वितान को खड़ा करता है. उपन्यास बया, अरुंधती, कल्लू, चन्दन, गुनी, दीप, पंडितजी, और अंसारी चा के सहारे ही मुख्य रूप से खुलता है और देश-समाज के विभन्न जनसरोकारों के मुद्दों के साथ-साथ भारतीय जीवन शैली का प्रमाणिकता पक्ष प्रस्तुत करता है.

उपन्यास 1974 के पहले परमाणु परीक्षण की याद दिलाता हुआ 1998 में हुए परमाणु परीक्षण के समानांतर उस समय की राजनीतिक, सामाजिक, सामरिक एवं वैज्ञानिक तर्क-वितर्क के बीच राष्ट्रवादी सरकार की परमाणु नीति का विहंगावलोकन के साथ-साथ परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों की सीटीबीटी पर हस्ताक्षर सम्बन्धी नीति की भी  ख़बर लेता है.

लेखक ने बया और दीप के नाथद्वारा परम्परा पर शोध के बहाने पखावज की उत्पत्ति एवं विकास के विविध आयामों को लौकिक एवं मिथकीय उदाहरणों के साथ, उसके तकनीकी पक्ष को इस तरह गूंथा है कि वह कहीं से बोझिल नहीं हुआ. इसी के पार्श्व में बया और दीप का प्रेम पनपता है, जो कारगिल युद्ध की भेंट चढ़ जाता है. उपन्यास में कलीमुद्दीन उर्फ़ कल्लू और अरुंधती उर्फ़ अरु का ख़ामोश प्रेम पाठकों के मन प्राण को बांधता है, हरदेव प्रताप बच्चू और मोनीषा चटर्जी का प्रेम जाति और झूठी सामंती शानो-शौकत को ठुकरा कर अपनी उच्च गरिमा के साथ स्थापित होता है. उपन्यास में जो एक चरित्र अपनी उपस्थिति से पाठकों की स्मृति को आंदोलित करता है वह है गुनी. सामाजिक रूप से उपेक्षित, आर्थिक रूप से कमज़ोर गुनी सामंती शोषण, अत्याचार और उठकर खड़ी हो जाने वाली यह स्त्री भारतीय समाज के वीभत्स चेहरे को उसकी पूरी विद्रुपता के साथ निर्वसन करती है और पूछती है, बम फोड़े से पेट भर जात हौ का!

अवधेश प्रीत एक सिद्धहस्त कथाकार हैं, उनकी भाषा देशकाल के अनुरूप पात्रानुकूल हिंदी, उर्दू,अवधी और अन्य स्थानीय भाषाओं, बोलियों के प्रयोग से समृद्ध होती है. इस उपन्यास में भी हिंदी, उर्दू के अलावा उन्होंने अवधी एवं राजस्थानी आदि का बखूबी इस्तेमाल किया है, जो स्थानीयता और पात्रों की बनावट को विश्वसनीयता प्रदान करती है. उपन्यास के कवर पृष्ठ पर जो पंचलाइन है, वह घोषणा करती है, “परमाणु हथियारों की संहार-शक्ति बनाम संगीत की सृजन-शक्ति एक विचारोत्तेजक उपन्यास”. यह पंक्ति इस उपन्यास के केंद्रीय भाव को रेखांकित करती है और यह विमर्श आमंत्रित करती है कि बतौर नागरिक हम किस ओर खड़े हैं? संगीत के बहाने जीवन की रचनात्मकता के पक्ष में हैं या राष्ट्रवाद के उन्माद में अपने विनाश का चयन करते हैं.

उपन्यास : रुई लपेटी आग
उपन्यासकार: अवधेश प्रीत
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली
पृष्ठ: 280
मूल्य: ₹ 299/-

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सुशील कुमार भारद्वाज कहानीकार-समीक्षक हैं. उनसे sushilkumarbhardwaj8 पर बात हो सकती है.

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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