कविताएँ ::
दीपांकर दीप

दीपांकर दीप

मुट्ठी भर गाँव 

आज फुरसत में था
तो यूँ ही खोलकर बैठ गया
पापा की पुरानी अटैची।

पड़ी थी उसमें कितनी ही
ब्लैक एंड व्हाइट पुरानी तस्वीरें
जिनके बैकग्राउंड में थी
कहीं दादी माँ की एक साड़ी
कहीं हमारा आमों का बगीचा
और कहीं कहीं तो फूस के छप्पड़ के नीचे
मिट्टी का पुराना घर जिसके ओसारे पर रखी है
मिट्टी तेल की एक डिबिया!

और, मुझे मिलीं उस अटैची में
अनगिनत चिट्ठियाँ जिन्हें माँ ने रखा है
वर्षों से सहेजकर
माँ बताती हैं कि दादी माँ लिखीं थीं ये चिट्ठियाँ
नौकरी की तलाश में शहर गये
मेरे पिता को।

मेरी दादी! तुमने अपनी चिट्ठियों में
लिख दिया है पूरा का पूरा गाँव।

और ये भी कि कैसे समय ने उखाड़ डाला
हमारा आमों का बगीचा
कैसे लुप्त हो गईं गाँव तक जाने वाली सारी पगडंडियां,
ट्रैक्टर के आ जाने से लोगों ने कैसे बेच दिया
अपने हीरा-मोती को कसाई खाने में,
धीरे-धीरे कैसे ख़त्म हो गया
चिट्ठियों का सिलसिला!

और ये भी कि कैसे बँट गए लोग धर्मों के नाम पर
मैं चाहता हूँ बचाकर रखना मुट्ठी भर भी गाँव!
ताकि आने वाली माएँ जब लिखें अपने बेटे को चिट्ठियाँ
उसमें गाँव उजड़ने की न हों एक भी बात।

हमारी चुप्पी

ये चुप होना ही एक दिन उजाड़ डालेगा उपवन
खत्म कर देगा सब कुछ
हमेशा के लिए!

खुद की आँखों के सामने घट रहे
दुर्घटनाओं को देखकर
हमने भी जिस तरह साध ली चुप्पी,
देखकर तमाशा खुद को दर्ज़ कर लिया
‘सभ्य इंसानों’ के रजिस्टर में

यकीन मानो,
एक रोज
इस धरा से मिट जाएंगे इंसान
यूँही रहे मौन तो प्रेम पढ़ेंगे बस किताबों में!

एक दिन सबका अलग देश होगा जहाँ
हम नितांत अकेले करेंगे आख़िरी सत्य का इंतज़ार!

•••

दीपांकर दीप आते हुए कवियों में से हैं। वे अररिया, बिहार के रहनेवाले हैं और पटना विश्वविद्यालय में पत्रकारिता (स्नातकोत्तर) के छात्र हैं। उनसे indiandeepankargupta@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

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