कविताएँ ::
कैलाश मनहर

धतूरे का फूल

धतूरे के फूल को निहार रहा हूँ बहुत देर से
छोटी-सी सफेद दुंदुभि खुल-खिल रही है

पँखुड़ियाँ दमक रही हैं पूरी श्वेताभा के साथ
मैं स्वयं को रोक पाने में असमर्थ हूँ अभी

छू लिया है मैंने लरजती अंगुलियों से वह फूल
मैं अपनी तर्जनी और अँगूठे को सूंघता हूँ
अहा!कैसी तो मादक गंध भर गई है नथुनों में

अभिसारोपरांत थकी किसी स्त्री की काँख में
छलछलाते पसीने की मृदु-तिक्त महक सौंधी

शिव को इसीलिये पसंद है धतूरे का फूल
कि पार्वती की स्वेद-गंध पर वे मोहित रहते हैं।

रात भर

रात भर महकती रही होगी चमेली
कुछ नव पल्लव फूटे होंगे नीम की टहनियों पर
पीपल से बहती रही होंगी शीतल हवायें रातभर
शहतूत में भरती रही होगी मिठास

याद करती रही होगी कोई विरहिन अपने प्रियतम को
रात भर दमकता रहा होगा कनेर
गूँजता होगा कोई लोकगीत ढोलक की थापों के साथ

रात भर चहकता रहा होगा कोई पक्षी
आज़ादी के सपने देखता रहा होगा रात भर कोई बच्चा
भटकता रहा होगा रात भर एक आवारा प्रेमी प्रतीक्षा में
रात भर जागता रहा होगा बेचैन कवि

रात भर उमगता रहा होगा प्रेम प्रपात
पतझड़ के बाद वसंत के आगमन की उम्मीद में
रात भर खिलती रही होगी ज्योत्सना।

तितली और फूल

पीले छींटो वाली वह भूरी तितली
हमेशा सदाबहार के फूलों पर मंडराती है

और सफ़ेद धारियों वाली वह गुलाबी तितली
अक्सर कनेर के फूलों के पास आती है

जबकि काले रंग पर लाल बिन्दुओं वाली तितली
हर शाम गुलाब के फूल पर आ बैठती है

मैं बहुत दिनों से देखता रहा हूँ उनका
अपने निश्चित फूलों की ओर उड़ कर आना

मुझे अपने लिये पक्के तौर से नहीं पता
लेकिन तुम शायद इन सभी रंगों वाली तितली हो

क्या मुझ में भी तुम्हें अहसास होता है
इन सभी फूलों की खुश्बू और रंगों का

क्या इसीलिये हम भरपूर प्रेम करते हैं हमेशा
कि छूट न जाये कोई रंग या खुश्बू

ख़्यालों में

बूँदाबांदी शुरु होते ही
आँखों में झिलमिलाने लगते हैं ख़्याल
जब नदी किनारे वाले
टीले पर से लौट आई थी वह छोड़ कर
कितनी ही अधूरी बातें

क्या वह अब भी उस ओर जाता होगा
छत पर खड़ी सोच रही है वह
नीम में फूट रहीं होंगी कोंपले वसंत में
कि टोहता तो होगा ही उसको
लाता होगा शायद कच्ची इमलियाँ भी

ओह! याद ही नहीं रहा
कि सूखते कपड़े समेटने आई थी वह
छत पर और ऐसे खोई
ख़्यालों में कि फिर गीले हो गये सभी
और नैन भी तनिक-से

यह समय

कुछ घुट रहा है भीतर ही भीतर
पता नहीं क्या है
जिसे कह सकना मुमकिन नहीं

जिनसे अबोला है उनसे
बात करने के लिये तरस रहा हूँ
और वे दम्भ में हैं ज़िद्दी

बोलना-बतियाना सिर्फ़
मेरी ही ज़रूरत बनी हो जैसे
अन्यों की स्वेच्छा मात्र

आख़िर यह कौनसी जगह है कि
जहाँ आवाज़ें नहीं हैं किन्तु
सन्नाटा बहुत कोलाहल करता है

जो सुन सकते हैं वे सुनना नहीं चाहते
और जो बोलते हैं मुझसे
वे इतना कठोर बोलते हैं
कि दिल जैसे हलक़ में आने लगता है

सीने में सुलगती आग का धुआँ
मेरी आँखों से निकल रहा है
लगता है कि जैसे काला रक्त है

रोना चाहता हूँ कि घुटते रहना
मुझे पक्का पता नहीं
लेकिन निश्चित है कि
यह समय हँसने का तो नहीं है

•••

कैलाश मनहर सुपरिचित कवि हैं। कविता की सहयात्रा में, सूखी नदी, उदास आँखों में उम्मीद, अवसाद पक्ष, हर्फ़ दर हर्फ़, अरे भानगढ़़ तथा अन्य कवितायें, मुरारी माहात्म्य एवं मध्यरात्रि प्रलाप उनके कविता संग्रह हैं। मेरे सहचर : मेरे मित्र  नाम से एक संस्मरणात्मक रेखाचित्र भी प्रकाशित है। उनसे manhar.kailash@gmail.com पर बात हो सकती है।

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