बाजार से कविता बचा लेने भर

कविताएँ ::
सत्यम तिवारी

डंडी

तराजू-बटखारे में
उलझे हुए हैं तुम्हारे हाथ
किसी के हाथ में पतंग है
कोई एम्बुलेंस से हाथ हिलाता है
किसी का हाथ कट चुका है

तुम्हारे जीवन में से
ये किसने डंडी मार ली?

नौसिखिया

मेरा संघर्ष
आम से लदे वृक्ष का तूफान में
अपनी फूल-पत्ती बचा लेने भर का है

या एक बच्चे का
असबाब से एक खिलौना

एक युवक का
हड़ताल में अपनी नौकरी

या एक वृद्ध का
परिवार में एक बच्चा

एक हाशिए में सिमटे इंसान से
कुछ भी बचा पाने की उम्मीद नहीं मुझे

मेरा संघर्ष पेट में भूख
और बाजार से कविता
बचा लेने भर का है

लेकिन मेरी कही बातों के पीछे
मेरा अनुभव इतना कम है
कि मुझे नौसिखिया साबित करने में
लोग सारी ताकत लगा देंगे।

मैं इसके लिए शर्मिंदा हूँ

मैंने उसके रास्तों में काँटे उगाए
ताकि वह लौटते हुए मेरी तरफ़ आए
पर उसके रास्तों से हमेशा
मुझे अपने फूलों के लिए पानी मिला
उसके रास्तों में जब भी उलझे मेरे रास्ते
उसके रास्तों ने मेरे रास्तों को रास्ता दिया
पर मैंने चाहा कि उसके तमाम रास्ते बंद हो जाए
और उसकी सभी दिशाएं आकर मुझसे ही टकराएं

मैं इसके लिए शर्मिंदा हूँ।

तस्वीर

यह उसे याद रखने की कोशिश है
या भूल जाने का रोजनामचा।

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इंद्रधनुष हाल के दिनों में लगातार हिंदी के नवोदित कवियों की कविताएँ छाप रहा है। इसी कड़ी में आज सत्यम तिवारी की कविताएँ प्रस्तुत हैं। सत्यम गढ़वा, झारखंड के रहनेवाले हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक के छात्र हैं। उनसे satyamtiwarichs@gmail.com पर बात हो सकती है।

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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