ढूंढ लाओ एक बूंद कहीं से

कविताएँ ::
सत्यम तिवारी

1. आँसू

जितनी रात है
जलने पर ही ख़त्म होगी
जितनी बात है
कहने पर ही खत्म होगी

दीया जलेगा
बातों का कुँआ चुक जाएगा

नमी ही जन्म देगी नमी को भागीरथ
ढूंढ लाओ एक बूंद कहीं से।

2. इति

यहाँ पहुँचकर भी तो
पूरा होता है यात्रा का एक पड़ाव
खुलता है तिलिस्म का प्रवेशद्वार

पहुँचते ही पकड़ता है कोई
अप्रत्याशित अशक्त
खिंचता है बहुप्रतीक्षित भवित्यक्त

यहीं जकड़ती है हमें अधीरता
स्पर्श चिंगारी को ईंधन देता है
यहीं टूटता है सदियों पुराना श्राप
राख के पुतले जलते हैं
और भाप की रेलगाड़ियाँ चलती हैं

यहीं हैं वक़्त काटने की सबसे ऐच्छिक जगहें
सभी विकल्पों में सबसे वैकल्पिक
दैनिक सहनशीलता पर टिका है इनका अस्तित्व

जाने-अनजाने कितनी अनहोनियाँ
यहाँ टलतीं हैं एक साथ
कोई निरखेगा तो बिलखेगा
कोई सोचेगा तो सिहरेगा।*

(*श्रीकांत वर्मा की एक पंक्ति)

3. एक बुरी फ़िल्म का निर्देशन

मृत्यु देखती है पहले रंग, बाद में इंसान
या इसका यत्न तो करती ही है कमोबेश

मृत्यु के वक़्त आकाश का रंग क्या होगा?
वह जब मेरा हाथ अपने हाथ में लेगी
कौन सा राग झरेगा भीतर से?
कौन सा गीत चलेगा नेपथ्य में?
रूकिए जरा पूछ लूँ
कि फूल-पत्ती का इंतज़ाम तो बराबर है
यह किसी अंत्येष्टि की बात है आख़िरकार

मृत्यु, दरअसल बहुत ही बुरी निर्देशिका है
उसकी फ़िल्मों में गीत नहीं होते
किसी डरावनी फ़िल्म के इंटरवल की तरह आती है वह
आपकी फ़िल्मों से अंत-आरंभ नदारद करते

जबकि वह बेहद बोझिल अदाकारा है
उसे पसंद है नायिका का किरदार
वह अपना आधिपत्य जमाने वाली शै है
जीवन में एक बार आ जाने के बाद
आपको साथ लिए बगैर वह नहीं लौटती

वह जब सुना रही हो कोई कहानी
चुपचाप सुनने का और कोई विकल्प नहीं।

4. अलविदा

मैं रात में बिल्ली की आँखों-सा चमकता हूँ
दिन को अजगर-सा निगलता हूँ
शाम की सूनी देहरी पर राह तकता हूँ
मेरे लिए तुम्हारा प्रेम औपचारिकता बन कर रह गया है

मैं तुम्हारी अधूरी इच्छाएँ पकड़ने दौड़ता हूँ
तो तितर-बितर होने लगते हैं दोनों हाथ
ऐसे तुझ तक पहुँचने का क्या मतलब
गलत ट्रेन से उतरना जैसे सही जगह

इस ख़राबे में जीने का संघर्ष इतना बड़ा है कि
खराब होकर ही बचा जा सकता है खराब होने से
तेरा दिया हुआ खोटा सिक्का हूँ
बाजार में चलते रहने के सिवा
मेरे पास कोई विकल्प भी कहाँ है

मेरा एक हिस्सा अपने साथ ले जा
लेते जाने से ही नष्ट होऊँगा मैं
छूट जाने पर जमता रहूँगा परत दर परत
अलसाए मौसम में अधखिले फूल-सा मुरझाऊँगा
घेरता रहूँगा बेमतलब की जगह
समय की उम्र ही न लग जाए मुझ को

मैं पेड़ से असमय टूटी डाली हूँ
जलावन की लकड़ी ढूँढते
एक दिन वह आएगी मेरे पास

उम्मीद एक बदहवास भागती गाड़ी है
विदा के मोड़ पर
जिसका दुर्घटनाग्रस्त होना तय है।

•••

सत्यम तिवारी कवि हैं। उनकी कविताएँ पूर्व में भी इंद्रधनुष पर प्रकाशित हैं। उनसे और परिचय, संपर्क और इंद्रधनुष पर पूर्व प्रकाशित कार्य के लिए यहाँ देखें : बाजार से कविता बचा लेने भर 

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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