‘बहुत-सी छायाएँ’ और ‘संकोच’

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कविताएँ ::
कुशाग्र अद्वैत

बहुत-सी छायाएँ

अपनी एड़ियों की
सूखती चमड़ी नोचता
बैठा हुआ हूँ
तुम्हारी बातें सुनता
बैठा हुआ हूँ

बहुत-सी छायाएँ
छितरा गईं हैं बाहर
दुपहरी बीत चुकी है
अभी तुम मेरी गोद से
अपने आल्ता लगे पैर
हटाते हुए उठोगी,
पानी पियोगी आहिस्ता,
गुड़गुड़ की आवाज़ करते

जाने का कहोगी
चली ही जाओगी

तुम्हारे जाने के बाद
मैं क्या करूँगा
अख़बार पढूँगा
या कोई किताब
कुछ लिखने लगूँगा
टीवी चला लूँगा

शायद बियर लेने
बाहर चला जाऊँ
और लौटानी
बगल वाली बुढ़िया से
कुछ कुछ बतियाऊँ

या फिर
यूँ ही बैठा रहूँगा
थोड़ी देर और
एड़ियों की सूखती चमड़ी नोचता।

संकोच

कैसे हमारे ही यहाँ जब देखो
कुछ न कुछ चुका रहता है

जब आएगा कोई बिजली बनाने
तब टेस्टर गायब रहता है
कोल्डड्रिंक लाऊँगा कभी
ओपनर नहीं मिलेगा बहुत ढूँढ़े

माह में कभी एकाध बार खाते बखत
मिर्चे का अचार ढूँढ़ता हूँ
तो पाता हूँ कि अभी पिछली ही शब
खाली हुई सब बरनियाँ

किसी के दाँतों में दर्द उठेगा
तो लौंग का तेल पड़ोस से लाना है
और अभी जब अंग अंग,
पोर पोर पिराता है
लगती है
चाय की शदीद तलब
तो बताओ शक्कर ख़तम है

ख़ैर, जो भी हो
उनकी तरफ़ शक्कर माँगने
किसी सूरत नहीं जाता
तुम गुड़ की चाय बना लो
या मत बनाओ, रहने दो
तुमको तो वैसे भी पीनी नहीं है

नुक्कड़ पर जाता हूँ
पी आता हूँ
काली वाली बुश्शर्ट लेती आओ
उसमें कुछ चिल्लर पड़े होंगे
दो दिनों से पहनता हूँ
कॉलर गंदा हो गया है
आकर पछीटूँगा

संझा बेरी निकलूँगा सौदा सुलुफ़ लेने
तब सुध कराना जो कुछ लाना हो
किसी पर्ची पर लिखकर रख लो
भूलना मत कुछ भी अब देखो

जब तितली का ब्याह नहीं हुआ था
वो आई रहती थी कनसुइयाँ लेने,
खटाई अचार माँगने
तब मैं भी झिझकते ही सही
चला जाता था मुँह उठाए
प्यालियाँ, कटोरियाँ लिए
कुछ भी माँगने हाथ फैलाए
पर इधर अब मन नहीं होता

दीवाली पर जब घर पुतता था
गया था बाल्टी वगैरह लेने
तो बस इद्दत से निकली ही थी
मीरा-सी, जोगन-सी
बहुत दुबली, बहुत पीली-सी
ग़म की मारी हुई बिल्ली-सी
चादर ओढ़े सुबकती थी
मोहल्ले की औरतों संग बैठी थी
वे जो उससे दूसरी शादी का कहती थीं
या कहो उसकी आँखों में ढेला भर नमक रखती थीं

वहाँ से लौटने पर
कहा भी था तुमसे
“तितली उस चारदिवारी के भीतर
बस अपना सोग़ समेटे रहने ख़ातिर
जाने क्या कुछ सहती है
चच्ची से साज़-ओ-सामान-सामान पर जम आई
धूल-सी बनकर रहने का कहती है।”

और यह मत समझना कि
नहीं जाता हूँ तो बस उसके लिए
और भी मसाइल हैं
जैसे कि
उनकी रसोई तक जाना कहाँ पड़ता था
वो हमारे बासन चीन्हती थी बक़ायदा
मेरी आमद से ही जान जाती हमेशा
इस दफ़ा क्या चुका होगा हमारे यहाँ

मगर अब
उस घर में
किसी और से
कैसे माँगूँगा
एक बार की चाय बराबर शक्कर!

•••

कुशाग्र अद्वैत युवा कवि हैं। उनसे mkushagra660@gmail.com पर बात हो सकती है।

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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