मेरा जादू अलिखित है

कविताएँ ::
ऑड्री लॉर्ड
अनुवाद, चयन एवं प्रस्तुति : सृष्टि

ऑड्री लॉर्ड एक अमरीकी स्त्रीवादी लेखिका, कवि और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता थीं। उन्होंने अपना जीवन और अपनी रचनात्मक प्रतिभा नस्लवाद, जातिवाद, लिंगवाद, वर्गवाद, पूंजीवाद, और होमोफोबिया जैसे अन्यायों के खिलाफ लड़ने के लिए समर्पित किया था। उनकी कविताओं में एक गुस्सा है जो कि समाज में हो रहे अन्यायों के खिलाफ़ है। वो ब्लैक महिलाओं की अस्मिता की एक अद्भुत आवाज़ हैं और लगातार प्रासंगिक बनी हुई हैं।

1.

चाँद से चिन्हित और सूरज का छुआ हुआ,
मेरा जादू अलिखित है,
पर जब समुद्र पीछे मुड़ेगा,
वो मेरा आकार छोड़ जाएगा।
मैं कोई एहसान नहीं चाहती,
ख़ून से अछूत,
प्यार के अभिशाप की तरह कठोर,
स्थायी, अपने गलती या फिर अभिमान की तरह,
मैं प्यार और दया को नहीं मिलाती,
ना नफ़रत और गुस्से को मिलाती हूँ,
और अगर तुम मुझे जानते हो,
तो यूरेनस की आँतों की तरफ़ देखो
जहाँ बेचैन महासागर हिलोरे मारते हैं।

मैं अपने जन्म और अमरता,
के बारे में नहीं सोचती,
मैं उम्र से परे हूँ और और आधी ही खिली,
अभी भी अपनी बहनों को खोजती,
जो डाहोमी में चुड़ैलें हैं,
जो मुझे अपने लिपटे हुए कपड़ों में पहन लेती हैं,
जैसा मेरी माँ करती थी,
शोक में।

मैं बहुत लंबे समय से स्त्री हूँ,
मेरी हँसी से सावधान रहना,
मैं छलती हूँ
अपने पुराने जादू से,
और दोपहर के नए गुस्से से,
और उन सारे भविष्यों से जिनका तुम्हें वादा किया गया है।
मैं एक स्त्री हूँ,
और मैं श्वेत नहीं हूँ।

2.

क्रोध के पेड़ में इतनी सारी जड़ें होती हैं,
कि कभी कभी शाखाएं सहने से पहले बिखर जाती हैं,
नेडीक्स में बैठी हुई,
औरतें आगे जाने से पहले, इकट्टा होती हैं,
समस्याग्रस्त ल़डकियों के बारे में बात करती हैं,
जिन्हें वो किराये पर रखती हैं,
ताकि उन्हें आज़ाद कर सकें।

एक लगभग श्वेत काउन्टरमैन,
एक वेटर भाई के आगे से निकलता है
ताकि पहले कर सके उनकी मदद
पर वो औरतें ना तो गौर करती हैं,
ना ही अपनी गुलामी के हल्के आनंद को ठुकराती हैं।

पर मैं
जो अपने आईने के अंदर क़ैद हूँ,
साथ ही अपने बिस्तर से बँधी हूँ,
विमर्श देखती हूँ,
रंग में और साथ ही लिंग में।

और यहां बैठे सोचती हूँ,
कि मेरा कौन सा हिस्सा,
इतनी सारी आज़ादी में बच पाएगा।

•••
सृष्टि कवि और अनुवादक हैं और फ़िलहाल लखनऊ विश्वविद्यालय में शोधरत हैं। उनसे shristithakur94@gmail.com पर बात हो सकती है।

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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