चैत का पुराना उदास गीत

श्री विलास सिंह की कविताएँ ::

1. एक उदास गीत 

कई बार
मन होता है कि
किसी मुलायम हरे पत्ते पर
लिख दिया जाय
तुम्हारा नाम,
जो मुलायम है
उस पत्ते की ही तरह।
नदी के किनारे बैठ
देर तक गाया जाए
चैत का पुराना उदास गीत,
पानी की सतह को
छू कर उड़ गई चिड़िया
हो जाये मेरा उदास मन,
चैत के उस गीत जैसा ही।
मन करता है कि
बदरंग धरती पर
भर दिए जाएं रंग
तमाम बनफूलों के
और बादलों को
टांक दिया जाए
मौसमों की चौखट पर।
प्रेम ऐसे किया जाय कि
किसी बूढ़े पहाड़ की चोटी से
सीने भर सांस के साथ

जोर से पुकारा जाए
तुम्हारा नाम
और तुम बिखर जाओ
पूरी घाटी में
सतरंगी तितलियों की तरह।

2. सलीबों पर

मुझे पता है
अपने विश्वासों के लिए
व्यवस्था की निर्मम कीलें ठोक कर
सूली पर टांग दिए जाने से पूर्व-
यह सलीब मुझे ही ढोनी है
अपने कंधों पर।
कोई दूसरा अगर कभी आता भी है
सहारा देने
अपना कंधा लगाने
ताकि कुछ कम हो सके पीड़ा का बोझ,
धीरे धीरे बदल जाता है
एक नुकीली कील में
जो मेरे सिद्धांतों की हथेली को
धीरे धीरे छेदती
हथौड़े की हर चोट के साथ
ठहर जाती है मेरी सलीब के सिरहाने
और मेरा आक्रोश देर तक निथरता रहता है
लाल गाढ़े द्रव के रूप में।
वे कंधे
कंधे जो सहारा दे कर मेरा बोझ कम करने चलते हैं
बदल जाते हैं
हथौड़ों की शक्ल में
और बन जाते हैं औजार
उसी व्यवस्था का

जिसके खिलाफ होना ही
कारण है
मेरे विश्वासों के
सलीब में बदल जाने का।
मेरे इस सफर के रास्ते
भरे पड़े है
तमाम बदरंग इस्तिहारों से झांकती
बेनूर आंखों से।
हर मोड़ पर उग आए हैं
ढेर सारे हांथ
हजारों या फिर लाखों,
आंखे जिनमें बुझ चुके सपनों की राख
उड़ रही है दूर तक,
हांथ जो सहारे की तलाश में
चटपटा रहे हैं
डूब जाने से पूर्व।
मेरा सफर जारी है
मेरे कंधों पर लदी सलीब के साथ,
मेरे सामने की सड़क पर दूर तक
लगे हैं काट दी गयी जबानों के ढेर,
तमाम दिमाग लटके हैं
दिन के उजाले में

रोशनी देने की नाकाम कोशिश में व्यस्त
लैम्पपोस्टों की ऊँचाइयों पर।
जबानें जिन पर यूं ही सवार था
सच बोलने का जुनून
और दिमाग जिनमे भरा था
स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व का
खतरनाक कचरा।
रास्ते के दोनों तरफ
तालियाँ बजा रहे हैं
लाखों सिर विहीन, रीढ़ विहीन लोग,
सच यहीं कहीं कुचला पड़ा है
इसी भीड़ के पैरों तले।
रास्ता हरा भरा दिखने के बावजूद
भरा है मरे हुए सपनों के शवों से,
मेरे दाएं बाएं लहलहा रहे हैं
कर्ज की फसलों के
खेत के खेत
जिसके बीच बीच में
दिख जाते है कुछ कंकाल
बिजूकों की तरह
जो बचे हुए हैं अभी तक
आत्महत्या करने से।
उन में से कुछ निश्चित ही

टांगे जाएंगे मेरी सलीब की बगल में
क्यों कि उन्होंने भी जुर्रत की थी
जीवन को बेहतर बनाने की
अपनी मेहनत से
और तोड़ा था
व्यवस्था का सदियों पुराना कानून-
की नहीं है अधिकार
बेहतर जीवन का
मेहनतकशों को।
दूर पहाड़ की चोटी से
जहां से उतरते हैं
ढेर सारे सूरज के रथ
और सोख कर हमारे जीवन की
सारी रोशनी
हर सांझ गुम हो जाते हैं
किसी अंतहीन गहरी गुफा मे,
क्रूर कहकहों की आवाजें
तब भी आ रहीं होती हैं,
बचे खुचे प्रकाश को डराती।
एक दिया अब भी जल रहा है
सिरहाने के ताक पर,
रात अपने बिस्तर पर कराहती
सुबह तक जिंदा बची रहती है

अंधेरों के अत्याचार की
कहानियों की तरह।
याद रखना
एक दिन धू धू जलने लगेगा
यह राजपथ
मेरी सलीब की रगड़ से उठ रही
चिंगारियों से
और मेरी सलीब में ठुकी
इन्ही निर्मम कीलों पर
लटके मिलेंगे
तमाम तनाशाहों के सिर
जबानें जो काट दी गयीं थी
बदल जायेगी
तलवारों में और
कटे हुए मेहनतकश हाथ
लिखेंगे उजालों की नई गाथा
इसी राजपथ पर
इन्ही तलवारों की धार से।
मेरी हथेलियों से
बहता मेरा लाल गाढ़ा रक्त
एक दिन खिल उठेगा
मेरे देश की उसी मिट्टी में

जो आज अभिशप्त है
आत्महत्या को मजबूर
अपने ही बेटों को
अपनी गोंद में
दफन करने को।
हम एक दिन
पहुचेंगे जरूर
रोशनी के मुहाने तक
अपनी अपनी सलीबें
अपने कंधों पर लिए हुए।

3. लक्ष्यभेद 

मैं अपने सपनों में
पाता हूँ स्वयं को
पीड़ा के तने हुए
धनुष पर संधानित
तीर की जगह,
जो छूटते ही बींध देगा
सारे अस्तित्व को
स्तब्ध करती
सनसनाहट के साथ।
और घूमते चक्र के
ऊपर लटकी मछली
टप से गिर पड़ेगी नीचे
खौलते तेल के
कड़ाहे में।
इस एक निशाने के साथ
जीवन
बंट जाएगा
पाँच पाँच टुकड़ों में।
भिक्षा के अन्न की तरह।

●●●

श्री विलास सिंह काफी समय से कविता-लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं. प्रकाशन से बचते रहते हैं, फिर भी इनकी कुछ कविताएँ प्रकाशित हैं. एक काव्य-संकलन ‘कविता के बहाने’ शीर्षक से शीघ्र प्रकाश्य है. सम्प्रति भारतीय राजस्व सेवा में कार्यरत श्री विलास सिंह से singhsbirs@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

Add comment