कविताएँ ::
स्मिता सिन्हा

स्मिता की पहचान एक संवेदनशील कवि की है। उनकी कविताएँ अपनी संवेदनाओं के लिए पहचानी जाती हैं। यहाँ प्रकाशित कविताओं में अपने समय की सत्ता-व्यवस्था के प्रतिरोध में खींची व्यंग्य की एक लकीर के भीतर संवेदना और अवसाद की जड़ें तो हैं लेकिन वे दुनिया से जनित हैं और उनसे लड़ने की आकांक्षा भी कवि में बनी हुई है। आत्महंता कविता भले ही शोषण का एक चित्र बनाती है, साथ ही वह उन दरारों को देखने में भी सक्षम होती है जो वही तंत्र बना रहा है खुद के लिए, जो सबका शोषण कर रहा है। दर्द कविता में भी एक विस्थापित स्त्री की जदोजहद से सामना होता है— अपनी जगह खोजने का संघर्ष, भले ही एक गत्ते का डब्बा। स्मिता की कविताएँ उनसे बात करती हैं जो केंद्र में नहीं, उनके साथ यात्रा करना चाहती हैं जिन्होनें खुद को किसी खांचे में ढलने से बचाया हुआ है। बिना लेबल के देखना, इसीलिए तो सिर्फ स्त्री विमर्श की पारंपरिक दृष्टि से इन कविताओं को देखना, इनको सीमित करना है। देह तो वही है लेकिन आत्मा का विस्तार अनंत है।

—सं.

स्मिता सिन्हा

आत्महंता

वे बड़े पारंगत थे
बोलने में
चुप रहने में
हँसने में
रोने में
उन्होंने हमेशा
अपने हिस्से का
आधा सच ही कहा
और अभ्यस्त बने रहे
सिर्फ़ झूठ रचने में

अपनी इसी तल्लीनता में
वे अंत तक
इस सत्य से अनजान रहे कि
उन्हीं के प्रहारों से
धीरे-धीरे टूट रहा था
उनका दूर्भेद्य दुर्ग।

दर्द

एक सुबह जैसे ही आँखें खुलीं
बालकनी में रखे गत्ते के डब्बे पर बैठी
एक चिड़िया गा रही थी
उसके गाने में दर्द था
निर्वासन, भूख-प्यास और उसकी उड़ान थी

उसे सुनती हुई
अपने दर्द को महसूस कर रही थी
पर गा न सकी

घर का आँगन तो कब का छूट चुका था
बाग-बगीचे उजड़ चुके थे
गाँव की पगडंडियों पर चले बरसों बीत गए
बहुमंजिली इमारत में दस बाई बारह का कमरा

जिसमें रौशनी और हवा के लिए कुछ छिद्र हैं
उनसे होकर जहरीली हवा और
यूवी किरणें प्रवेश करती हैं
मैं सभी छिद्र बंद कर लेती हूँ
और यह कमरा
मेरे लिए गत्ते का डब्बा बन जाता है।

चीखो, बस चीखो

चीखो
कि हर कोई चीख रहा है
चीखो
कि मौन मर रहा है
चीखो
कि अब कोई और विकल्प नहीं
चीखो
कि अब चीख ही मुखरित है यहाँ
चीखो
कि सब बहरे हैं
चीखो
कि चीखना ही सही है
चीखो
लेकिन कुछ ऐसे
कि तुम्हारी चीख ही
हो अंतिम
इतने शोर में।

शतावरी

उसने प्रेम चुना और प्रतिकार भी
मौन सदैव उसके अनुराग की अभ्यर्थना रहा
और हृदय का स्पंदन
मानो बाँसुरी से निकलने वाली स्वरलहरियां
उस प्रगल्भ रात्रि में
जब उसकी आंखों में बहती रही शतावरी
और दूर सुमेरु पर चमकता रहा एक पूरा चाँद
वह बेतहाशा चूमती रही पारिजात के पुष्पों को
और स्वतः आलोकित होती रही
अपनी देह के विदेह होने तक
वह नमक की लड़की थी
अपने देह के नमक में घुलती रही
एकसार होने तक।

•••

स्मिता सिन्हा की कविताएँ तमाम पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। हाल ही सेतु प्रकाशन से उनका नया संग्रह ‘बोलो ना दरवेश’ प्रकाशित हुआ है। उनसे smitaminni3012@gmail.com पर बात हो सकती है।

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