तुमसे दूर जाकर भी कितना दूर जा सकूँगा

कविताएँ ::
सुमित झा

सुमित झा

तुम्हारे शहर में  

1.
लौट कर आने के बाद
चीजें वैसी नहीं मिलती
पटना घूमते हुए पाया कि
यहाँ की भागती दौड़ती सड़कों पर
लोगों की भीड़ में
मैं अब अकेला हूँ.

मेरी हथेलियाँ ढूंढती हैं तुम्हारी हथेलियाँ
गाँधी मैदान के पास
सीसीडी में बैठे हुए पाया कि
मेरे टेबल की एक कुर्सी खाली है.

कभी बोरिंग रोड में
घंटों तुम्हारे कोचिंग के बाहर खड़ा होता था
आज यहाँ घंटों खड़े होने के बाद
याद आया कि तुमने शहर छोड़ दिया है.

चलते चलते आज थक गया हूँ
रुकने के बाद सोच रहा हूँ कि
मैंने क्या खोया क्या पाया
तुम्हें खो दिया या तुम्हारा दुःख पा लिया.

तुम्हारे जाने के बाद भी
मैंने तुम्हारे हिस्से की चीजें सहेज कर रखी हैं
सीसीडी में मिली टिशू पेपर
सड़क किनारे बच्चों के हाथ से
बाँटे जाने वाले पंप्लेट
ट्रैफिक सिग्नल्स पर मिलते लाल गुब्बारे
रेस्तरां में बैठे तुम्हारे हिस्से की सौंफ़ और मिश्री
प्यार भरे अल्फाज जो शाम को पार्क में बैठे
तुमसे कहने थे
हॉस्टल की बगल वाली गली का चुंबन
जो जाते हुए तुम्हारे माथे पर करना था

और कल शहर छोड़ते हुए
आँखों  के आँसुओं को सहेज लूँगा
जो तुमसे विदा लेते हुए सहसा निकल आते थे

तुम्हारे हिस्से का बाक़ी प्यार
जो तुम्हारे जाने के बाद से मेरे दिल में है
क्योंकि जाते हुए तुमने ही कहा था न
“मैं तुमसे विदा ले रही हूँ कि वापस लौट सकूँ!”

2.
पटना की सुबहों में
अब कोहरा ज्यादा होने लगा है
मैं उनमें अब भी तलाशता हूँ
तुम्हारे मौजूदगी के निशान

इन उजली चादरों के बीच
गुजरते हुए पाता हूँ कि
जीवन कितना नीरस हो गया है
एक तुम्हारा साथ छूट जाने से

एनआईटी से गुजरते हुए
जब मेरे पैर थक जाते हैं
मैं बैठ जाता हूँ गंगा घाट पर
यह जानते हुए कि चलना कितना पीड़ादायी है

यहाँ घंटों अकेले बैठे
निहारता हूँ  रेत को
जो दूर कहीं गंगा पार नजर आती है
जो तुम्हारे ना होने का सबूत है.

क्यूँकि तुम्हारे साथ बैठने पर
तुम्हारे चेहरे से फ़ुर्सत कहाँ मिलती थी
तुम्हारी आँखों में ही मुझे दिख जातीं थीं
चमकती हुईं असंख्य आकाशगंगाएँ

जबकि आज तुम मेरे साथ नहीं हो
फिर भी मैंने दो कप चाय ले ली है
इसीलिए नहीं कि तुम्हारा जाना मैंने स्वीकारा नहीं,
शायद इसलिए कि तुम्हें चाय बेहद पसंद थी

तुम्हारे जाने के बाद से
सब कितना स्थिर हो गया है
दिन पहाड़ लगते हैं तुम बिन
पटना शायद रुक गया है कहीं
तुम्हारे लौट आने के इंतजार में!

3.
यह कह देना कितना मुश्किल है कि
मेरी यात्रा शुरू हो चुकी है
यह ट्रेन तुमसे दूर जाते हुए
इतनी तेज क्यूँ भागती है

कल शाम तक मेरे पास पूरा पटना शहर था
आज मैं, तुम्हारी याद और मेरे सहयात्री
मेरी यह यात्रा कोई पहली यात्रा नहीं है
लेकिन इस बार तुम थी, तुम्हारा प्रेम था

धरती पर घटित हर क्रिया
कभी ना कभी पहली बार हुई होगी
तुमसे मिले बग़ैर जाने का दुःख
तुमसे दूर जाने के दुःख से कहीं अधिक है

जब तुम वापस लौटोगी पटना
देखोगी तो उतना ही पास दिखूँगा
जितनी पास होती है एक आँख दूसरे आँख से

तुमसे दूर जाकर भी कितना दूर जा सकूँगा
दो बाहों को कितना भी अलग किया जाए
एक हाथ की दूरी बची होती है दोनों के मध्य
जितनी वास्तविक यह घटना है
उतना ही सच मेरा प्रेम

एक दिन जब वापस लौटूँगा पटना
तो ठीक उसी तरह मिलूँगा
जैसे सोन नदी मिलती है गंगा से.

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पटना को केंद्र में रख कर बहुत थोड़ी कविताएँ लिखीं गयीं हैं. उन थोड़ी कविताओं में से अधिकांश में शहर स्वत: नहीं, स्थूलता के साथ गली-मोहल्ले से परिभाषित हुआ/किया गया है . बिलकुल अगली पीढ़ी ने पटना में रहते हुए और पटना पर  ना लिखने की क़समें खाते हुए जो कविताएँ लिखीं हैं वही शहर की असल-बयानी हैं. सुमित उसी पीढ़ी से सम्बंध रखते हैं जो ना चाहते हुए भी पटना के अपनी कविताओं में आ जाने को रोक नहीं पाते. इसीलिए भी ये कविताएँ पाठ की माँग रखती हैं. जो छूट जाता है, उसी से प्रेम किया जा सकता है— इसी के आसपास कुछ. सुमित से madhepur.sumitjha@gmail.com पर बात हो सकती है . 

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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