पितृसत्ता का विपरीत मातृसत्ता नहीं बंधुत्व है

न से नारी ::
उद्धरण : जर्मेन ग्रियर
अनुवाद एवं प्रस्तुति :  प्रकृति पार्थ

जर्मेन ग्रियर (जन्म 1939) का जन्म ऑस्ट्रेलिया में हुआ था और अब वे इंग्लैंड में रहती हैं. उनकी पुस्तक फीमेल यूनक(1970) के प्रकाशन ने उन्हें एक लेखिका के रूप में और महिलाओं की मुक्ति और लैंगिकता पर एक आधिकारिक टिप्पणीकार के रूप में स्थापित किया. किताब के शीर्ष के अनुसार महिलाओं की लैंगिकता में निष्क्रियता नपुंसकता से जुड़ी एक विशेषता है, और यह इतिहास और स्वयं महिलाओं द्वारा उन पर थोपी गई है.  

— प्रकृति पार्थ 

जर्मेन ग्रियर


समाज द्वारा दान में दी जाने वाली छवि के बजाय अपनी खुद की छवि बनाने का निर्णय लेने के लिए बहुत साहस और स्वतंत्रता की आवश्यकता होती है,
लेकिन जैसे-जैसे आप आगे बढ़ते हैं, यह आसान होता जाता है.

अगर एक महिला खुद को कभी मुक्त नहीं करेगी, तो उसे कैसे पता चलेगा कि वह कितनी दूरी तय कर चुकी है? यदि वह अपने ऊँची हील वाली चप्पलें कभी नहीं उतारती, तो उसे कैसे पता चलेगा कि वह कितनी दूर चल सकती है या कितनी तेजी से दौड़ सकती है?

पितृसत्ता का विपरीत मातृसत्ता नहीं बंधुत्व है,
फिर भी मुझे लगता है कि यह महिलायें ही हैं
जिन्हें सत्ता के इस चक्र को तोड़ना होगा और सहयोग का रास्ता ढूंढना होगा.

अपने पति के अखबार के पीछे से ताकने वाली, या बिस्तर पर उनकी साँसे सुनने वाली कई गृहिणियां,
किसी किराए के कमरे में रह रही किसी कुँवारी स्त्री से ज़्यादा अकेली होती हैं.

वे दयनीय महिलायें जो पुरुषों को अपने दुख और अलगाव के लिए ज़िम्मेदार ठहराती हैं,
वे हर दिन खुद के लिए अपनी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी का त्याग करने की प्रारंभिक गलती करती हैं.

यह आम बात है कि महिलायें हमेशा अपने घुंघराले बालों को सीधा करने की कोशिश करती हैं और अगर वे सीधे हैं तो उन्हें घुंघराले, यदि स्तन बड़े हैं तो उन्हें बांधने और यदि वे छोटे हैं तो उन्हें बड़ा करने की, यदि बाल हल्के रंग के हैं तो काला करने और अगर गहरे हैं तो उन्हें हल्का करने की. ये सभी उपाय फैशन की कल्पना से तय नहीं होते हैं. ये सभी शरीर के साथ असंतोष को दर्शाते हैं, और एक आग्रहपूर्ण इच्छा कि यह अन्यथा हो, प्राकृतिक नहीं बल्कि नियंत्रित, गढ़ा हुआ हो. महिलाओं द्वारा अपनाए गए कई उपकरण कॉस्मेटिक या सजावटी नहीं हैं, बल्कि असल की नक़ल होते हैं और भय और अरुचि से उत्पन्न होते हैं.

प्रकृति पार्थ कवि और अनुवादक हैं और पटना विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं. उनसे prakritiparth04@gmail.com पर बात हो सकती है.
इन्द्रधनुष के साप्ताहिक स्तम्भ ‘न से नारी’ के अंतर्गत स्त्री-विमर्श के प्रमुख हस्ताक्षरों के रचना-संसार से हम आपका निरन्तर साक्षात्कार करवा रहे हैं.  इस स्तम्भ की अन्य प्रस्तुतियों के लिए यहाँ देखें : न से नारी

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इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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